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ट्रेन गुजरेगी तो लोग मेरी कोठी में झांकेंगे....
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फोटो- 48 संडीला रेलवे स्टेशन
- फोटो : HARDOI
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संडीला। संडीला नवाब की बेगम पूर्व विधायक कुदेशिया अड़ंगा न लगातीं तो बालामऊ की जगह आज संडीला रेलवे का जंक्शन स्टेशन होता। इसका लाभ संडीला के लोगों को मिल रहा होता।
बेगम कुदेशिया संडीला के नवाब सैय्यद एजाज रसूल की बेगम थीं। उस समय उनके चर्चे भी खूब होते थे। बेगम कुदेशिया 1969, 1977 से 1985 तक विधायक और संविधान पीठ की सदस्य रहीं।
संडीला के मोहल्ला मंडई निवासी मोहम्मद सलीम (70), अब्दुल रहमान (75) बताते हैं कि उस दौरान मुरादाबाद लखनऊ के बीच रेल लाइन बन रही थी। सीतापुर और कानपुर जाने के लिए एक जंक्शन स्टेशन बनना था।
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संडीला पुरानी तहसील थी। यहां से सीधा रास्ता कानपुर व सीतापुर को जाता था। इसलिए संडीला को रेलवे जंक्शन बनाने का निर्णय लिया गया। इसमें बेगम कुदेशिया से भी राय ली गई। रेलवे लाइन बनने के लिए सर्वे भी हो गया था।
बेगम साहिबा की उमरहरा कोठी रेलवे लाइन के किनारे पड़ रही थी। इसलिए उन्होंने यह कहकर विरोध कर दिया कि उनकी कोठी के बगल से ट्रेन गुजरेगी तो लोग उनकी कोठी में झांकेंगे।
जबकि नवाब एजाज रसूल व अन्य लोग उन्हें समझाते रहे कि हमारे यहां से लोग सीतापुर व कानपुर जाएंगे और हमें याद करेंगे, लेकिन बेगम ने किसी की बात नहीं मानी।
आखिर में अधिकारियों को बालामऊ को जंक्शन बनाना पड़ा। इससे यहां के लोगों के हाथ से यह सौगात निकल गई। बताया जा रहा है कि जिस कोठी को लेकर उन्होंने इतना विरोध किया था वह आज वीरान पड़ी है। जो लाभ यहां के लोगों को चुटकी बजाते मिल जाता आज लोग उसके लिए तरस रहे हैं।
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बेगम कुदेशिया संडीला के नवाब सैय्यद एजाज रसूल की बेगम थीं। उस समय उनके चर्चे भी खूब होते थे। बेगम कुदेशिया 1969, 1977 से 1985 तक विधायक और संविधान पीठ की सदस्य रहीं।
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संडीला के मोहल्ला मंडई निवासी मोहम्मद सलीम (70), अब्दुल रहमान (75) बताते हैं कि उस दौरान मुरादाबाद लखनऊ के बीच रेल लाइन बन रही थी। सीतापुर और कानपुर जाने के लिए एक जंक्शन स्टेशन बनना था।
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संडीला पुरानी तहसील थी। यहां से सीधा रास्ता कानपुर व सीतापुर को जाता था। इसलिए संडीला को रेलवे जंक्शन बनाने का निर्णय लिया गया। इसमें बेगम कुदेशिया से भी राय ली गई। रेलवे लाइन बनने के लिए सर्वे भी हो गया था।
बेगम साहिबा की उमरहरा कोठी रेलवे लाइन के किनारे पड़ रही थी। इसलिए उन्होंने यह कहकर विरोध कर दिया कि उनकी कोठी के बगल से ट्रेन गुजरेगी तो लोग उनकी कोठी में झांकेंगे।
जबकि नवाब एजाज रसूल व अन्य लोग उन्हें समझाते रहे कि हमारे यहां से लोग सीतापुर व कानपुर जाएंगे और हमें याद करेंगे, लेकिन बेगम ने किसी की बात नहीं मानी।
आखिर में अधिकारियों को बालामऊ को जंक्शन बनाना पड़ा। इससे यहां के लोगों के हाथ से यह सौगात निकल गई। बताया जा रहा है कि जिस कोठी को लेकर उन्होंने इतना विरोध किया था वह आज वीरान पड़ी है। जो लाभ यहां के लोगों को चुटकी बजाते मिल जाता आज लोग उसके लिए तरस रहे हैं।