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सरकार के ‘पंच’ की दरकार
ब्यूरो/अमर उजाला,हरदोई
Updated Sat, 08 Aug 2015 12:08 AM IST
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जिले में दुग्ध व्यवसाय की अलख जगाकर प्रतिदिन 40
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हजार लीटर तक दूध की खरीद कर पराग डेरी को आपूर्ति करने वाला दुग्ध संघ अब
बंदी की कगार पर है। पिछले 10 सालों में भ्रष्टाचार के सींगों ने अपनी
कारगुजारियों से निगल लिया और दुग्ध संघ अब गुजरे जमाने की बात होने की ओर
बढ़ गया है।
अनुकंपा पैकेज के रूप में 4 करोड़ 62 लाख रुपये की डिमांड कर चुके दुग्ध संघ को अब बस अनुकंपा की आस है। अब अनुकंपा की धनराशि ही इसे वापस विकास की मुख्यधारा में ला सकती है वो भी तब जब इस राशि पर भ्रष्टाचार की छाया न पड़े। ग्रामीण अंचलों से किसानों से दूध की खरीद कर पराग डेरी को बेंचकर मुनाफा कमाने वाला दुग्ध संघ लगातार घाटे में है।
आलम यह है कि किसानों और कर्मियों का ही चार करोड़ रुपये से अधिक बकाया है, जबकि दुग्ध ट्रांसपोर्ट व्यय आदि समेत अन्य देनदारियों को मिलाकर यूनिट सेटअप के लिए करीब पांच करोड़ रुपये की दरकार है। सूत्रों की माने तो 1980 के दशक में जिले में स्थापित हुए दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ ने किसानों को दुग्ध उत्पादन व्यवसाय के प्रेरित करने वाली समिति का गांवों में गठन कर दूध की खरीद शुरू की थी।
करीब 10 वर्षों से दुग्ध संघ पर भ्रष्टाचार के सींगों की ऐसी छाया पड़ी कि मुनाफा होने की बजाय दुग्ध संघ भ्रष्टाचार की वजह से घाटे में आ गया। कर्मचारियों का वेतन निकलना मुश्किल हुआ, तो किसानों के दुग्ध भुगतान में खेल शुरू हो गया। कहीं समितियों का जाल तो कहीं भ्रष्टाचार की चाल ने किसानों का दुग्ध संघ से मोह भंग करना शुरू किया और हालत यह हुए कि जिसको जहां जो मौका मिला वह दूध में खेल कर अपने हित साधता रहा।
लिहाजा किसानों की देनदारियों के लिए आया पैसा भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। लगातार हो रहे इस खेल से दुग्ध संघ पर करीब चार करोड़ रुपये से अधिक किसानों और कर्मचारियों के वेतन आदि समेत कुल साढ़े चार करोड़ रुपये से ज्यादा की देनदारियां चढ़ी हुई हैं।
अफसर और कर्मचारी अब सिर्फ अनुकंपा पैकेज की आस में तालाबंदी को बचाने का प्रयास कर रहे है। उधर, दो हजार लीटर दूध से 40 हजार लीटर दूध प्रतिदिन खरीदने तक का सफर तय कर चुके दुग्ध संघ ने गांवों में किसानों के लिए दुग्ध उत्पादन व्यवसाय को आय का प्रमुख जरिया बनाने का काम किया था।
खरीद सेंटरों पर पारदर्शिता रखने एवं किसानों को समुचित मूल्य मुहैया कराने को 98 स्थानों पर आटोमैटिक मिल्क कलेक्शन सेेंटर स्थापित करने के साथ ही 18 स्थानों पर बल्क मिल्क कूलिंग यूनिटें लगाई थी, जिसके चलते करीब 40 हजार किसानों के लिए रोजी रोटी का जरिया दुग्ध संघ किसानों के लिए आय का प्रमुख जरिया रह चुका है और अब 5 सौ लीटर दूध की खरीद तक सिमट चुका है।
उधर, दुग्ध संघ को पुनर्जीवित करने के लिए जिला योजना से करीब 4 करोड़ 62 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृति हुई है, पर कब मिलेगी इसको लेकर कुछ पता नहीं है। इस बाबत प्रबंधक गुरुशरण सिंह कहते हैं कि बस उम्मीद ही की जा सकती है।
अनुकंपा पैकेज के रूप में 4 करोड़ 62 लाख रुपये की डिमांड कर चुके दुग्ध संघ को अब बस अनुकंपा की आस है। अब अनुकंपा की धनराशि ही इसे वापस विकास की मुख्यधारा में ला सकती है वो भी तब जब इस राशि पर भ्रष्टाचार की छाया न पड़े। ग्रामीण अंचलों से किसानों से दूध की खरीद कर पराग डेरी को बेंचकर मुनाफा कमाने वाला दुग्ध संघ लगातार घाटे में है।
आलम यह है कि किसानों और कर्मियों का ही चार करोड़ रुपये से अधिक बकाया है, जबकि दुग्ध ट्रांसपोर्ट व्यय आदि समेत अन्य देनदारियों को मिलाकर यूनिट सेटअप के लिए करीब पांच करोड़ रुपये की दरकार है। सूत्रों की माने तो 1980 के दशक में जिले में स्थापित हुए दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ ने किसानों को दुग्ध उत्पादन व्यवसाय के प्रेरित करने वाली समिति का गांवों में गठन कर दूध की खरीद शुरू की थी।
करीब 10 वर्षों से दुग्ध संघ पर भ्रष्टाचार के सींगों की ऐसी छाया पड़ी कि मुनाफा होने की बजाय दुग्ध संघ भ्रष्टाचार की वजह से घाटे में आ गया। कर्मचारियों का वेतन निकलना मुश्किल हुआ, तो किसानों के दुग्ध भुगतान में खेल शुरू हो गया। कहीं समितियों का जाल तो कहीं भ्रष्टाचार की चाल ने किसानों का दुग्ध संघ से मोह भंग करना शुरू किया और हालत यह हुए कि जिसको जहां जो मौका मिला वह दूध में खेल कर अपने हित साधता रहा।
लिहाजा किसानों की देनदारियों के लिए आया पैसा भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। लगातार हो रहे इस खेल से दुग्ध संघ पर करीब चार करोड़ रुपये से अधिक किसानों और कर्मचारियों के वेतन आदि समेत कुल साढ़े चार करोड़ रुपये से ज्यादा की देनदारियां चढ़ी हुई हैं।
अफसर और कर्मचारी अब सिर्फ अनुकंपा पैकेज की आस में तालाबंदी को बचाने का प्रयास कर रहे है। उधर, दो हजार लीटर दूध से 40 हजार लीटर दूध प्रतिदिन खरीदने तक का सफर तय कर चुके दुग्ध संघ ने गांवों में किसानों के लिए दुग्ध उत्पादन व्यवसाय को आय का प्रमुख जरिया बनाने का काम किया था।
खरीद सेंटरों पर पारदर्शिता रखने एवं किसानों को समुचित मूल्य मुहैया कराने को 98 स्थानों पर आटोमैटिक मिल्क कलेक्शन सेेंटर स्थापित करने के साथ ही 18 स्थानों पर बल्क मिल्क कूलिंग यूनिटें लगाई थी, जिसके चलते करीब 40 हजार किसानों के लिए रोजी रोटी का जरिया दुग्ध संघ किसानों के लिए आय का प्रमुख जरिया रह चुका है और अब 5 सौ लीटर दूध की खरीद तक सिमट चुका है।
उधर, दुग्ध संघ को पुनर्जीवित करने के लिए जिला योजना से करीब 4 करोड़ 62 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृति हुई है, पर कब मिलेगी इसको लेकर कुछ पता नहीं है। इस बाबत प्रबंधक गुरुशरण सिंह कहते हैं कि बस उम्मीद ही की जा सकती है।