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Hardoi News: सीताराम जयघोष के साथ हर्रैया पहुंचा आस्था का सैलाब
Tue, 12 Mar 2024 11:38 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हरदोई
संवाद न्यूज एजेंसी, हरदोई
Updated Tue, 12 Mar 2024 11:38 PM IST
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भरावन (हरदोई)। सीतापुर जनपद के पौराणिक तीर्थस्थल नैमिषारण्य से सोमवार को शुरू हुई 84 कोसी परिक्रमा में शामिल साधु-संतों, गृहस्थों की आस्था का सैलाब मंगलवार को परिक्रमा मार्ग के हरदोई के हर्रैया पड़ाव पहुंचा। बोल, कड़ाकड़ सीताराम के जयघोष के साथ रामादल ने यहां गोमती नदी में डुबकी लगाई।
84 कोसी परिक्रमा में गृहस्थों, साधु-संतों के साथ ही दिव्यांगजन और बच्चों समेत करीब ढाई लाख लोग अलग-अलग जत्थों में शामिल हैं। साधु-संतों में विक्की बाबा, जटाधारी बाबा, बंदूक धारी बाबा, नागा बाबा, गोल्डन बाबा और गृहस्थों के साथ बच्चे भी परिक्रमा में आए हैं। परिक्रमा के दूसरे पड़ाव हर्रैया में सुबह चार बजे से ही साधु-संत व श्रद्धालुओं का आना शुरू हुआ और देर तक जारी रहा।
अपराह्न दो बजे मेला कमेटी के अध्यक्ष पहला आश्रम के संत नारायण दास सिल्वर रंग और बनगढ़ के महंत संतोष दास खाकी लाल रंग के रथ से पड़ाव पर पहुंचे। बड़ी संख्या में भक्तों ने गोमती नदी में डुबकी लगाई और श्रीहरि का जप किया।
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परिक्रमा मार्ग पर जगह-जगह श्रीमद्भागवत कथाएं भी हो रही हैं। परिक्रमा में प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार समेत कई प्रांतों और नेपाल से भी साधु-संत आए हैं। हर्रैया गांव के ग्रामीणों ने परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुओं का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। श्रद्धालुओं ने चार किलोमीटर की परिधि में फैले बाग व खुले मैदान और सड़क किनारे एक रात के लिए कुटिया बना ली हैं।
गोमती नदी के पुल के पास स्वागत द्वार पर संत-महात्माओं का एसडीएम तान्या सिंह, सीओ शिल्पा कुमारी, एसएचओ दिलेश कुमार सिंह, संडीला ईओ विजेता गुप्ता ने माला पहनाकर स्वागत किया।
स्कंद पुराण में है परिक्रमा का महत्व
स्कंद पुराण में 84 कोसी परिक्रमा का उल्लेख मिलता है। परिक्रमा यात्रा मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर उसे 84 लाख योनियों के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है। पुराण के अनुसार यह यात्रा सबसे पहले भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने की थी। भगवान श्रीराम ने भी ब्रह्मदोष से मुक्ति के लिए अयोध्यावासियों के साथ परिक्रमा की थी। इसी वजह से परिक्रमा को रामादल भी कहा जाता है। पूरी परिक्रमा में जो श्रद्धालु भाग नहीं ले पाते हैं वो परिक्रमा के आखिरी पांच दिन मिश्रिख तीर्थ में परिक्रमा में भागीदार बनकर पुण्य अर्जित करते हैं।
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84 कोसी परिक्रमा में गृहस्थों, साधु-संतों के साथ ही दिव्यांगजन और बच्चों समेत करीब ढाई लाख लोग अलग-अलग जत्थों में शामिल हैं। साधु-संतों में विक्की बाबा, जटाधारी बाबा, बंदूक धारी बाबा, नागा बाबा, गोल्डन बाबा और गृहस्थों के साथ बच्चे भी परिक्रमा में आए हैं। परिक्रमा के दूसरे पड़ाव हर्रैया में सुबह चार बजे से ही साधु-संत व श्रद्धालुओं का आना शुरू हुआ और देर तक जारी रहा।
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अपराह्न दो बजे मेला कमेटी के अध्यक्ष पहला आश्रम के संत नारायण दास सिल्वर रंग और बनगढ़ के महंत संतोष दास खाकी लाल रंग के रथ से पड़ाव पर पहुंचे। बड़ी संख्या में भक्तों ने गोमती नदी में डुबकी लगाई और श्रीहरि का जप किया।
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परिक्रमा मार्ग पर जगह-जगह श्रीमद्भागवत कथाएं भी हो रही हैं। परिक्रमा में प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार समेत कई प्रांतों और नेपाल से भी साधु-संत आए हैं। हर्रैया गांव के ग्रामीणों ने परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुओं का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। श्रद्धालुओं ने चार किलोमीटर की परिधि में फैले बाग व खुले मैदान और सड़क किनारे एक रात के लिए कुटिया बना ली हैं।
गोमती नदी के पुल के पास स्वागत द्वार पर संत-महात्माओं का एसडीएम तान्या सिंह, सीओ शिल्पा कुमारी, एसएचओ दिलेश कुमार सिंह, संडीला ईओ विजेता गुप्ता ने माला पहनाकर स्वागत किया।
स्कंद पुराण में है परिक्रमा का महत्व
स्कंद पुराण में 84 कोसी परिक्रमा का उल्लेख मिलता है। परिक्रमा यात्रा मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर उसे 84 लाख योनियों के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है। पुराण के अनुसार यह यात्रा सबसे पहले भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने की थी। भगवान श्रीराम ने भी ब्रह्मदोष से मुक्ति के लिए अयोध्यावासियों के साथ परिक्रमा की थी। इसी वजह से परिक्रमा को रामादल भी कहा जाता है। पूरी परिक्रमा में जो श्रद्धालु भाग नहीं ले पाते हैं वो परिक्रमा के आखिरी पांच दिन मिश्रिख तीर्थ में परिक्रमा में भागीदार बनकर पुण्य अर्जित करते हैं।