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Hardoi News: दुष्कर्म के आरोपी का मैच हो गया डीएनए सैंपल, पुलिस जल्द कराएगी गवाही पूरी
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फोटो-30-सूरज पाल सिंह। संवाद
हरदोई। तीन साल पहले दुष्कर्म का शिकार हुई मूकबधिर और दृष्टिहीन किशोरी को न्याय दिलाने में 164 के बयान आड़े नहीं आएंगे।
जानकारों का दावा है कि किशोरी के बयान न हो पाने पर सुनवाई की प्रक्रिया धीमी तो हो सकती है, लेकिन बाधित नहीं हो सकती। मामले में 15 गवाहों में से छह की गवाही हो चुकी है और अब पुलिस ने जल्द से जल्द सभी गवाहों की गवाही कराने की तैयारी की है। पूरे मामले पर संवाद न्यूज एजेंसी ने पुलिस अधीक्षक, जिला शासकीय अधिवक्ता और सेवानिवृत्त शासकीय अधिवक्ता से बात की।
पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार मीणा कहते हैं कि निश्चित रूप से न्यायालय के समक्ष पीड़िता के बयान महत्वपूर्ण हैं। बयान न हो पाने की स्थिति में परिस्थिति जन्य साक्ष्य, स्वास्थ्य साक्ष्य, फॉरेंसिक साक्ष्य और गवाहों के आधार पर महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाती हैं। दुष्कर्म के मामलों में डीएनए सैंपलिंग कराई जाती है। अतरौली के मामले में भी डीएनए सैंपल मैच हो गया है। यह किशोरी को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण साबित होगा।
जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) सतेंद्र सिंह का कहना है कि ऐसे मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य और गवाह बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अतरौली के मामले में बयान कराने का हर संभव प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इससे किशोरी को न्याय मिलने में कोई बाधा आएगी। आधुनिक युग में वैज्ञानिक साक्ष्य और मेडिकल एविडेंस न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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सेवानिवृत्त शासकीय अधिवक्ता सूरज पाल सिंह ने कहते हैं कि निश्चित रूप से यह मामला थोड़ा हटकर है। मूकबधिर के मामले तो आते हैं, लेकिन इसके साथ ही नेत्रहीन होने का मामला पहली बार सामने आया है। ऐसे मामलों में 164 की बाध्यता बिल्कुल नहीं है। फॉरेंसिक साक्ष्य, गवाहों के बयान और कई बार आरोपी की लोकेशन भी न्यायिक प्रक्रिया में मददगार होती है। अब तो दुष्कर्म के मामलों में डीएनए सैंपलिंग की व्यवस्था है। यह 164 के बयान से बड़ा साक्ष्य है।
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जानकारों का दावा है कि किशोरी के बयान न हो पाने पर सुनवाई की प्रक्रिया धीमी तो हो सकती है, लेकिन बाधित नहीं हो सकती। मामले में 15 गवाहों में से छह की गवाही हो चुकी है और अब पुलिस ने जल्द से जल्द सभी गवाहों की गवाही कराने की तैयारी की है। पूरे मामले पर संवाद न्यूज एजेंसी ने पुलिस अधीक्षक, जिला शासकीय अधिवक्ता और सेवानिवृत्त शासकीय अधिवक्ता से बात की।
पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार मीणा कहते हैं कि निश्चित रूप से न्यायालय के समक्ष पीड़िता के बयान महत्वपूर्ण हैं। बयान न हो पाने की स्थिति में परिस्थिति जन्य साक्ष्य, स्वास्थ्य साक्ष्य, फॉरेंसिक साक्ष्य और गवाहों के आधार पर महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाती हैं। दुष्कर्म के मामलों में डीएनए सैंपलिंग कराई जाती है। अतरौली के मामले में भी डीएनए सैंपल मैच हो गया है। यह किशोरी को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण साबित होगा।
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जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) सतेंद्र सिंह का कहना है कि ऐसे मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य और गवाह बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अतरौली के मामले में बयान कराने का हर संभव प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इससे किशोरी को न्याय मिलने में कोई बाधा आएगी। आधुनिक युग में वैज्ञानिक साक्ष्य और मेडिकल एविडेंस न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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सेवानिवृत्त शासकीय अधिवक्ता सूरज पाल सिंह ने कहते हैं कि निश्चित रूप से यह मामला थोड़ा हटकर है। मूकबधिर के मामले तो आते हैं, लेकिन इसके साथ ही नेत्रहीन होने का मामला पहली बार सामने आया है। ऐसे मामलों में 164 की बाध्यता बिल्कुल नहीं है। फॉरेंसिक साक्ष्य, गवाहों के बयान और कई बार आरोपी की लोकेशन भी न्यायिक प्रक्रिया में मददगार होती है। अब तो दुष्कर्म के मामलों में डीएनए सैंपलिंग की व्यवस्था है। यह 164 के बयान से बड़ा साक्ष्य है।

फोटो-30-सूरज पाल सिंह। संवाद

फोटो-30-सूरज पाल सिंह। संवाद