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Hardoi News: बच्चों के बेहतर इलाज का दावा.... दवाएं मेडिकल स्टोर से लें
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हरदोई। मेडिकल कॉलेज में अव्यवस्थाओं की बीमारी खत्म नहीं हो पा रही है। कॉलेज की फार्मेसी में मुफ्त दवाओं का दावा तो हो रहा है लेकिन दवाएं नहीं हैं। फार्मेसी में पेरासिटामोल के अलावा कोई दूसरी दवा नहीं है। बच्चों का इलाज करने वाले चिकित्सक जो दवा लिखते हैं उनमें पेरासिटामोल के अलावा सारी दवाएं खुले बाजार के मेडिकल स्टोर से ही खरीदनी पड़ रही हैं।
मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी में दवाओं की किल्लत इस कदर है कि बच्चों के लिए जरूरी एंटीबायोटिक्स, सिरप और ड्रॉप्स नदारद हैं। अस्पताल के सरकारी काउंटर से केवल पेरासिटामोल (पीसीएम) की सिरप थमा दी जाती है जबकि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को आवश्यक दवाएं नहीं मिल रही हैं। इतना ही नहीं, बाल रोग विभाग के चिकित्सक भी बच्चों को परामर्श देने के बाद अधिकांश दवाएं मेडिकल स्टोर की लिखकर देते हैं। मेडिकल स्टोर पर एक पर्चे की दवा साढ़े तीन सौ से पांच सौ रुपये की बनती है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर तीमारदारों को मेडिकल कॉलेज में भी इलाज करा पाना मुश्किल होता जा रहा है।
केस-1-
शहर के बड़ा चौराहा निवासी पूजा अपनी बेटी श्रष्टिका के पेट में दर्द होने पर परामर्श लेने पहुंचीं। चिकित्सक ने जांच के बाद चार दवाएं लिखीं। फार्मेसी से सिर्फ पेरासिटामोल का सिरप मिला। अन्य दवाएं मेडिकल स्टोर से लेनी पड़ीं। यह दवाएं लगभग 350 रुपये की आईं।
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केस-2-
सेमरा गांव निवासी अशोक अपनी दो साल की बेटी सोनाक्षी का इलाज कराने आए थे। बताया कि डॉक्टर ने पांच दवाएं लिखीं। इनमें से अस्पताल में एक भी नहीं मिली। यह दवाएं मेडिकल स्टोर से 450 रुपये में खरीदीं।
दवा कोई भी हो मिलेगी एक ही मेडिकल स्टोर पर
यूं तो शहर में बड़ी संख्या में मेडिकल स्टोर हैं लेकिन बाल रोग विभाग के चिकित्सकों की लिखी हुई दवाएं सिर्फ एक ही मेडिकल स्टोर से मिलती हैं। मेडिकल कॉलेज के बाहर स्थित एक मेडिकल स्टोर पर ज्यादातर मरीज और तीमारदार बाल रोग विभाग के चिकित्सकों का पर्चा लेकर पहुंचते हैं। शहर के ज्यादातर मेडिकल स्टोर यह दवाएं प्रिंट मूल्य से 10 फीसदी कम पर देते हैं लेकिन यहां यह दवाएं प्रिंट मूल्य पर ही मिलती हैं।
दावा है... पर दवाओं का क्या
मेडिकल कॉलेज प्रशासन का दावा है कि फार्मेसी में दवाएं कम होते ही पोर्टल पर डिमांड अपलोड कर दी जाती है। बताया कि 15 अप्रैल को भी डिमांड भेजी गई थी। बावजूद इसके दवाओं की कमी अब भी पूरी नहीं हो पाई। यह हालत तब है जब अनटाइड फंड से भी 32 लाख रुपये की दवाइयां खरीदी जा चुकी हैं।
फार्मेंसी में कुछ दवाइयां नहीं हैं। शासन स्तर से सूचीबद्ध दवाओं के लिए समय-समय पर शासन को जानकारी दी जाती है। जो दवाइयां नहीं हैं उनकी कमी को भी जल्द ही पूरा कर दिया जाएगा। चिकित्सकों को भी निर्देश है कि मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी में उपलब्ध दवाइयों की सलाह मरीजों को दें। -डॉ. जेबी गोगोई, प्रधानाचार्य
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मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी में दवाओं की किल्लत इस कदर है कि बच्चों के लिए जरूरी एंटीबायोटिक्स, सिरप और ड्रॉप्स नदारद हैं। अस्पताल के सरकारी काउंटर से केवल पेरासिटामोल (पीसीएम) की सिरप थमा दी जाती है जबकि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को आवश्यक दवाएं नहीं मिल रही हैं। इतना ही नहीं, बाल रोग विभाग के चिकित्सक भी बच्चों को परामर्श देने के बाद अधिकांश दवाएं मेडिकल स्टोर की लिखकर देते हैं। मेडिकल स्टोर पर एक पर्चे की दवा साढ़े तीन सौ से पांच सौ रुपये की बनती है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर तीमारदारों को मेडिकल कॉलेज में भी इलाज करा पाना मुश्किल होता जा रहा है।
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केस-1-
शहर के बड़ा चौराहा निवासी पूजा अपनी बेटी श्रष्टिका के पेट में दर्द होने पर परामर्श लेने पहुंचीं। चिकित्सक ने जांच के बाद चार दवाएं लिखीं। फार्मेसी से सिर्फ पेरासिटामोल का सिरप मिला। अन्य दवाएं मेडिकल स्टोर से लेनी पड़ीं। यह दवाएं लगभग 350 रुपये की आईं।
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केस-2-
सेमरा गांव निवासी अशोक अपनी दो साल की बेटी सोनाक्षी का इलाज कराने आए थे। बताया कि डॉक्टर ने पांच दवाएं लिखीं। इनमें से अस्पताल में एक भी नहीं मिली। यह दवाएं मेडिकल स्टोर से 450 रुपये में खरीदीं।
दवा कोई भी हो मिलेगी एक ही मेडिकल स्टोर पर
यूं तो शहर में बड़ी संख्या में मेडिकल स्टोर हैं लेकिन बाल रोग विभाग के चिकित्सकों की लिखी हुई दवाएं सिर्फ एक ही मेडिकल स्टोर से मिलती हैं। मेडिकल कॉलेज के बाहर स्थित एक मेडिकल स्टोर पर ज्यादातर मरीज और तीमारदार बाल रोग विभाग के चिकित्सकों का पर्चा लेकर पहुंचते हैं। शहर के ज्यादातर मेडिकल स्टोर यह दवाएं प्रिंट मूल्य से 10 फीसदी कम पर देते हैं लेकिन यहां यह दवाएं प्रिंट मूल्य पर ही मिलती हैं।
दावा है... पर दवाओं का क्या
मेडिकल कॉलेज प्रशासन का दावा है कि फार्मेसी में दवाएं कम होते ही पोर्टल पर डिमांड अपलोड कर दी जाती है। बताया कि 15 अप्रैल को भी डिमांड भेजी गई थी। बावजूद इसके दवाओं की कमी अब भी पूरी नहीं हो पाई। यह हालत तब है जब अनटाइड फंड से भी 32 लाख रुपये की दवाइयां खरीदी जा चुकी हैं।
फार्मेंसी में कुछ दवाइयां नहीं हैं। शासन स्तर से सूचीबद्ध दवाओं के लिए समय-समय पर शासन को जानकारी दी जाती है। जो दवाइयां नहीं हैं उनकी कमी को भी जल्द ही पूरा कर दिया जाएगा। चिकित्सकों को भी निर्देश है कि मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी में उपलब्ध दवाइयों की सलाह मरीजों को दें। -डॉ. जेबी गोगोई, प्रधानाचार्य