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‘इंसानियत की तालीम देता इसलाम’
Hardoi
Updated Sun, 05 Jan 2014 05:46 AM IST
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पिहानी (हरदोई)। देहलिया गांव में चेहल्लुम जुलूस से पहले बरपा हुई मजलिसे अजा में उलमा ने कहा कि दुनिया को अमन और शांति की स्थापना को इस्लामी तालीमात की जरूरत है। इसलाम इंसानियत की तालीम देता है। दुनिया में अमन-शांति को इसलामी कानून को लागू किया जाना जरूरी है।
देहलिया गांव के इमामबाड़ा गरीबुल गुरबा पर बरपा मजलिस को संबोधित करते हुए बिजनौर के मौलाना शमशाद ने कहा कि रसूल जिहालत के उस दौर में तशरीफ लाए थे, जब लोग बेटियों को जिंदा दफना दिया करते थे। मामूली बात पर इंसानों को खून बहा देना आम बात थी। ऐसे में रसूल ने इसलाम को पेश किया। तमाम गैर इंसानी रस्में मिटाईं। रसूल के नवासे इमाम हुसैन ने करबला की जंग में अपना सर कटा कर इसलाम के रूप में इंसानियत की हिफाजत की थी। आप के सामने हुकूमत का सवाल न था। सवाल था हक और नाहक का। जुल्म के आगे सब्र के इम्तहान का। इमाम हुसैन अपने इम्तहान मेें पूरे उतरे और जुल्म के आगे झुकाने की बजाय सर कटा लेना गवारा किया। इमाम ने शहीद होकर नाना के दीन को सरबुलंदी दी।
कहा कि आज यह जिम्मेदारी हम सब पर है कि एक होकर जालिम और इसलाम दुश्मन ताकतों का मुकाबला करें। उधर, देहलिया गांव में नवासा-ए-रसूल की मजलिसे चेहल्लुम में क्षेत्र भर से बड़ी संख्या में अजादारों ने शिरकत की। इस दौरान नन्हेें अजादार मुजतबा हुसैन के नौहों पर मातम किया गया। इमामबाड़े पर मजलिस के बाद आयोजक अंजुमन शमशीरे हैदरी ने ताजिये और अलम का जुलूस बरामद किया। जुलूस परंपरागत रास्ता तय करता हुआ मसजिद के पास इमाम चौक पर पहुंचा। यहां सात वर्ष के अजादार मुजतबा हुसैन ने नौहे पढ़कर शोहदा-ए-करबला की याद ताजा की। प्रसिद्ध नौहाख्वां शहजाद गोपालपुरी ने कई नौहे पढ़कर मातम किया। इमाम चौक पर भीड़ होने के बाद महिलाओं ने आसपास के घरों की छत से जुलूस की जियारत की।
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यहां बाहर से आई अंजुमनों शमशीरे हैदरी (नगपुर), दस्ता-ए-मासूमिया, घासीपुर (मऊ) और अंजुमन अब्बासिया मंगलोर (मध्य प्रदेश) के सदस्यों ने नौहे पढ़ मातम किया। इसके बाद जुलूस गांव के प्रमुख मार्गों से होकर करबला पहुंचा। देर शाम को करबला में अलविदाई नौहे के साथ कार्यक्रम का समापन हो गया। इस दौरान अंजुमन शमशीरे हैदरी देहलिया के मौलाना मौलाना मुजम्मिल हुसैन, मौलाना मुनव्वर हुसैन, अम्मार हुसैन, आसिफ अली, दावर अली, अरशद हुसैन व शादाब हुसै फाजू आदि ने व्यवस्थाएं देखीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं और पुरुषों ने भागीदारी की। इमाम चौक पर रखे गए ताजियों को बोसे देने को भीड़ जमा रही। कार्यक्रम में पिहानी, पियाबाग, महमूदपुर, सरैयां, बढ़ैया, शाहपुर, बिलग्राम तथा हरदोई आदि से भी लोगों ने शिरकत की।
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देहलिया गांव के इमामबाड़ा गरीबुल गुरबा पर बरपा मजलिस को संबोधित करते हुए बिजनौर के मौलाना शमशाद ने कहा कि रसूल जिहालत के उस दौर में तशरीफ लाए थे, जब लोग बेटियों को जिंदा दफना दिया करते थे। मामूली बात पर इंसानों को खून बहा देना आम बात थी। ऐसे में रसूल ने इसलाम को पेश किया। तमाम गैर इंसानी रस्में मिटाईं। रसूल के नवासे इमाम हुसैन ने करबला की जंग में अपना सर कटा कर इसलाम के रूप में इंसानियत की हिफाजत की थी। आप के सामने हुकूमत का सवाल न था। सवाल था हक और नाहक का। जुल्म के आगे सब्र के इम्तहान का। इमाम हुसैन अपने इम्तहान मेें पूरे उतरे और जुल्म के आगे झुकाने की बजाय सर कटा लेना गवारा किया। इमाम ने शहीद होकर नाना के दीन को सरबुलंदी दी।
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कहा कि आज यह जिम्मेदारी हम सब पर है कि एक होकर जालिम और इसलाम दुश्मन ताकतों का मुकाबला करें। उधर, देहलिया गांव में नवासा-ए-रसूल की मजलिसे चेहल्लुम में क्षेत्र भर से बड़ी संख्या में अजादारों ने शिरकत की। इस दौरान नन्हेें अजादार मुजतबा हुसैन के नौहों पर मातम किया गया। इमामबाड़े पर मजलिस के बाद आयोजक अंजुमन शमशीरे हैदरी ने ताजिये और अलम का जुलूस बरामद किया। जुलूस परंपरागत रास्ता तय करता हुआ मसजिद के पास इमाम चौक पर पहुंचा। यहां सात वर्ष के अजादार मुजतबा हुसैन ने नौहे पढ़कर शोहदा-ए-करबला की याद ताजा की। प्रसिद्ध नौहाख्वां शहजाद गोपालपुरी ने कई नौहे पढ़कर मातम किया। इमाम चौक पर भीड़ होने के बाद महिलाओं ने आसपास के घरों की छत से जुलूस की जियारत की।
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यहां बाहर से आई अंजुमनों शमशीरे हैदरी (नगपुर), दस्ता-ए-मासूमिया, घासीपुर (मऊ) और अंजुमन अब्बासिया मंगलोर (मध्य प्रदेश) के सदस्यों ने नौहे पढ़ मातम किया। इसके बाद जुलूस गांव के प्रमुख मार्गों से होकर करबला पहुंचा। देर शाम को करबला में अलविदाई नौहे के साथ कार्यक्रम का समापन हो गया। इस दौरान अंजुमन शमशीरे हैदरी देहलिया के मौलाना मौलाना मुजम्मिल हुसैन, मौलाना मुनव्वर हुसैन, अम्मार हुसैन, आसिफ अली, दावर अली, अरशद हुसैन व शादाब हुसै फाजू आदि ने व्यवस्थाएं देखीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं और पुरुषों ने भागीदारी की। इमाम चौक पर रखे गए ताजियों को बोसे देने को भीड़ जमा रही। कार्यक्रम में पिहानी, पियाबाग, महमूदपुर, सरैयां, बढ़ैया, शाहपुर, बिलग्राम तथा हरदोई आदि से भी लोगों ने शिरकत की।