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Hapur News: वित्त मंत्रालय तक जाएगा हापुड़ का नलकूप बिल घोटाला
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हापुड़। नलकूप बिलों में 220 करोड़ (अब करीब 1200 करोड़) के घोटाले का मामला अब वित्त मंत्रालय जाएगा। इसके लिए सभी रिपोर्ट तैयार कर ली गई हैं। क्योंकि किसानों के खातों में जुड़कर आ रही यह देनदारी मंत्रालय से ही हटना संभव है। इसके अलावा अन्य कोई राहत मिलती फिलहाल नजर नहीं आ रही है।
वर्ष 2000 से पहले से ही नलकूप बिलों में घपला शुरू हो गया था। जिस समय प्रकरण खुला तो यह घोटाला 220 करोड़ का बताया जाता था, जो चक्रवर्ती ब्याज के साथ हर तीन साल में दोगुना हो रहा है। आलम यह है कि 20 साल से जिले के किसानों के खातों में गलत तरीके से लाखों की देनदारी जोड़कर भेजी जा रही है।
पिछले दिनों भाकियू ने जिला मुख्यालय पर हंगामा किया था। सात दिन तक धरना चला, जिसमें किसानों को राहत दिलाने का आश्वासन दिया गया। अधिकारियों ने किसानों से जमा बिलों की छायाप्रति जमा करानी शुरू कर दीं। लेकिन पहले की तरह इस तरह की रसीदें एकत्र कर, ठंडे बस्ते में डाल दी गई। ओटीएस के तीनों चरण बीतने को हैं, लेकिन अभी तक किसानों को राहत नहीं मिली।
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अब हापुड़ के इस प्रकरण को वित्त मंत्रालय में उठाने की तैयारी है। स्थानीय अधिकारियों ने बताया है कि रिपोर्ट और ब्योरा उच्चस्तरीय टीमों ने जुटाया है। नलकूप के लेजरों में अब रकम बहुत अधिक हो गई है, जिसे मंत्रालय स्तर से ही खत्म किया जा सकता है। हालांकि उच्चस्तर पर कुछ सॉफ्टवेयर भी विकसित किए जा रहे हैं, जिनके जरिए नलकूप किसानों को बिल जमा करने की सुविधा दिलाने की तैयारी है।
वर्ष 2004 में सिर्फ 120 करोड़ थी घोटाले की राशि-
ऊर्जा निगम के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004 में जब इस घपले की परतें खुली थी तब घोटाला महज 120 करोड़ का था। इसमें 85 लाख रुपये मूल था और 35 लाख रुपये ब्याज बन रहा था। उस समय सकारात्मक जांच कर कार्रवाई होती तो किसानों को अब तक राहत मिल चुकी होती।
-वर्ष 2006 में बिलों को संशोधित करने का हुआ था प्रयास
वर्ष 2006 में ऐसे बिलों को संशोधित करने का प्रयास हुआ था। उस समय ओटीएस योजना लागू थी, बहुत से किसानों की पेनाल्टी और जुड़कर आ रही बकायेदारी को खातों से हटाया गया लेकिन, मामला बढ़ा तो फिर से अधिकारियों ने हटाई गई राशि को खातों में जोड़ दिया।
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नालों में बहा दी गई थी रसीदें और लेजर-
नलकूप बिल घोटाले का पर्दाफाश होते ही संबंधित कर्मचारियों ने घपले संबंधी रसीद और लेजर नाले में बहा दिए थे, कुछ जला भी दिए थे। नाले से बहुत से रसीद बुक निकाली भी गई थी। जांच टीमों को काफी रिकॉर्ड गायब मिला, जिस कारण 20 साल बाद भी इस प्रकरण का खुलासा नहीं हो सका है।
उच्चस्तर पर चल रही मामले की जांच-
नलकूप बिलों का मामला उच्चस्तर पर चल रहा है। बिलों में देनदारी अत्यधिक होने के कारण इसका निस्तारण मंत्रालय से होना ही संभव है। इस संबंध में रिपोर्ट तैयार की जा रही है। शासन से जिस तरह आदेश मिलेंगे, उसके अनुरूप कार्य किया जाएगा। - आरपी वर्मा, अधिशासी अभियंता।
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वर्ष 2000 से पहले से ही नलकूप बिलों में घपला शुरू हो गया था। जिस समय प्रकरण खुला तो यह घोटाला 220 करोड़ का बताया जाता था, जो चक्रवर्ती ब्याज के साथ हर तीन साल में दोगुना हो रहा है। आलम यह है कि 20 साल से जिले के किसानों के खातों में गलत तरीके से लाखों की देनदारी जोड़कर भेजी जा रही है।
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पिछले दिनों भाकियू ने जिला मुख्यालय पर हंगामा किया था। सात दिन तक धरना चला, जिसमें किसानों को राहत दिलाने का आश्वासन दिया गया। अधिकारियों ने किसानों से जमा बिलों की छायाप्रति जमा करानी शुरू कर दीं। लेकिन पहले की तरह इस तरह की रसीदें एकत्र कर, ठंडे बस्ते में डाल दी गई। ओटीएस के तीनों चरण बीतने को हैं, लेकिन अभी तक किसानों को राहत नहीं मिली।
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अब हापुड़ के इस प्रकरण को वित्त मंत्रालय में उठाने की तैयारी है। स्थानीय अधिकारियों ने बताया है कि रिपोर्ट और ब्योरा उच्चस्तरीय टीमों ने जुटाया है। नलकूप के लेजरों में अब रकम बहुत अधिक हो गई है, जिसे मंत्रालय स्तर से ही खत्म किया जा सकता है। हालांकि उच्चस्तर पर कुछ सॉफ्टवेयर भी विकसित किए जा रहे हैं, जिनके जरिए नलकूप किसानों को बिल जमा करने की सुविधा दिलाने की तैयारी है।
वर्ष 2004 में सिर्फ 120 करोड़ थी घोटाले की राशि-
ऊर्जा निगम के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004 में जब इस घपले की परतें खुली थी तब घोटाला महज 120 करोड़ का था। इसमें 85 लाख रुपये मूल था और 35 लाख रुपये ब्याज बन रहा था। उस समय सकारात्मक जांच कर कार्रवाई होती तो किसानों को अब तक राहत मिल चुकी होती।
-वर्ष 2006 में बिलों को संशोधित करने का हुआ था प्रयास
वर्ष 2006 में ऐसे बिलों को संशोधित करने का प्रयास हुआ था। उस समय ओटीएस योजना लागू थी, बहुत से किसानों की पेनाल्टी और जुड़कर आ रही बकायेदारी को खातों से हटाया गया लेकिन, मामला बढ़ा तो फिर से अधिकारियों ने हटाई गई राशि को खातों में जोड़ दिया।
नालों में बहा दी गई थी रसीदें और लेजर-
नलकूप बिल घोटाले का पर्दाफाश होते ही संबंधित कर्मचारियों ने घपले संबंधी रसीद और लेजर नाले में बहा दिए थे, कुछ जला भी दिए थे। नाले से बहुत से रसीद बुक निकाली भी गई थी। जांच टीमों को काफी रिकॉर्ड गायब मिला, जिस कारण 20 साल बाद भी इस प्रकरण का खुलासा नहीं हो सका है।
उच्चस्तर पर चल रही मामले की जांच-
नलकूप बिलों का मामला उच्चस्तर पर चल रहा है। बिलों में देनदारी अत्यधिक होने के कारण इसका निस्तारण मंत्रालय से होना ही संभव है। इस संबंध में रिपोर्ट तैयार की जा रही है। शासन से जिस तरह आदेश मिलेंगे, उसके अनुरूप कार्य किया जाएगा। - आरपी वर्मा, अधिशासी अभियंता।