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कारगिल में दुश्मनों के दांत खट्टे कर शहीद हो गया था चमन सिंह
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कारगिल में दुश्मनों के दांत खट्टे कर शहीद हो गया था चमन सिंह
हापुड़। कारगिल युद्ध में हापुड़ के गांव उदयपुर के लायंस नायक शहीद चमन सिंह ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये थे। गोली और बम के धमाकों के बीच भारत मां का यह वीर सपूत दुश्मनों पर टूटते हुए आगे बढ़ता चला गया और कई दुश्मनों को मौत के घाट उतार कर खुद देश के लिए वीरगति को प्राप्त हो गया। भारत मां के इस जाबाज सपूत को आज भी जिलेवासियों के साथ साथ देशवासी याद करते हैं।
कागरिल में जब दुश्मन कब्जा करने के लिए पहुंचे तो उदयपुर गांव के लायंस नायक चमन सिंह भी दुश्मनों से लोहा लेने के लिए अपनी बटालियन के साथ वहां पहुंच गए थे। दुश्मनों को गोली का जवाब गोली से देते हुए यह वीर सपूत 13 जून 1999 को वीरगति को प्राप्त हो गया था।
करीब चार दिन बाद शहीद चमन सिंह का पार्थिक शरीर जब गांव उदयपुर जाने के लिए हापुड़ शहर में पहुंचा था तो हजारों की संख्या में शहरवासियों ने नम आंखों के बीच इस वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी थी। चमन सिंह अमर रहे, भारत माता की जय के नारों से हापुड़ गूंज गया था।
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चमन सिंह का पार्थिक शरीर जब उनके घर पहुंचा था तो उनके पिता दलपत सिंह ने पुत्र का स्वागत करते हुए उसकी वीरता पर गर्व किया था।
जतिन त्यागी 25एचपीआर35
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हापुड़। कारगिल युद्ध में हापुड़ के गांव उदयपुर के लायंस नायक शहीद चमन सिंह ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये थे। गोली और बम के धमाकों के बीच भारत मां का यह वीर सपूत दुश्मनों पर टूटते हुए आगे बढ़ता चला गया और कई दुश्मनों को मौत के घाट उतार कर खुद देश के लिए वीरगति को प्राप्त हो गया। भारत मां के इस जाबाज सपूत को आज भी जिलेवासियों के साथ साथ देशवासी याद करते हैं।
कागरिल में जब दुश्मन कब्जा करने के लिए पहुंचे तो उदयपुर गांव के लायंस नायक चमन सिंह भी दुश्मनों से लोहा लेने के लिए अपनी बटालियन के साथ वहां पहुंच गए थे। दुश्मनों को गोली का जवाब गोली से देते हुए यह वीर सपूत 13 जून 1999 को वीरगति को प्राप्त हो गया था।
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करीब चार दिन बाद शहीद चमन सिंह का पार्थिक शरीर जब गांव उदयपुर जाने के लिए हापुड़ शहर में पहुंचा था तो हजारों की संख्या में शहरवासियों ने नम आंखों के बीच इस वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी थी। चमन सिंह अमर रहे, भारत माता की जय के नारों से हापुड़ गूंज गया था।
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चमन सिंह का पार्थिक शरीर जब उनके घर पहुंचा था तो उनके पिता दलपत सिंह ने पुत्र का स्वागत करते हुए उसकी वीरता पर गर्व किया था।
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