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शबे बराअत अर्थात मुक्ति दिलाने वाली रात आज
Updated Mon, 30 Apr 2018 11:53 PM IST
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शब-ए- बरआत अर्थात मुक्ति दिलाने वाली रात आज
- रातभर जागकर इबादत करने वालों को गुनाहों से मुक्ति मिलती है
अमर उजाला ब्यरो
गढ़मुक्तेश्वर। शब-ए- बरआत गुनाहों से निजात अर्थात मुक्ति वाली रात है, जिसमें आतिशबाजी करना शरई लिहाज से पूरी तरह हराम है। इस रात में इबादत करने और दिवंगतों को सवाब बख्शने का विशेष मजहबी महत्व है।
शब-ए- बरआत को मजहबे इस्लाम में निजात अर्थात गुनाहों से मुक्ति मिलने वाली रात कहा जाता है, क्योंकि इस रात को फरिश्ते साल भर में दिवंगत होने वालों की फेहरिस्त तैयार करते हैं। इसलिए इस रात को जागकर अल्लाह की इबादत करने का एक खास मुकाम है, लेकिन नासमझी और रूढ़िवादी परंपराओं के चलते रातभर जागने की बजाए घरों में हलवा बनवाने और आतिशबाजी करने की तरफ तवज्जोह देने लगे हैं। जिसे मजहबी उलेमाओं ने पूरी तरह हराम और नाजायज करार दिया है। मौलाना अमीरुल हक ने बताया कि कि शब-ए- बरआत निजात अर्थात गुनाहों से मुक्ति वाली रात है। जिसमें जागकर इबादत करने वालों पर अल्लाह की खास रहमत नाजिल होती है, लेकिन जो लोग इस रात को आतिशबाजी करते हैं। उन पर अल्लाह की लानत होती है, क्योंकि आतिशबाजी करना मजहबे इस्लाम में पूरी तरह गैर शरअई और हराम है। मुफ्ती मोहम्मद अनस का कहना है कि शब-ए-बरआत की रात में नफिल नमाज, कुरान पाक की तिलावत और अल्लाह का जिक्र करने की खास अहमियत है, इसलिए किसी भी हालत में आतिशबाजी न करें और बच्चों को भी सख्ती के साथ इससे रोकें। उन्होंने बताया कि शब-ए- बरआत वाली रात में एक साल के भीतर दिवंगत होने वालों की फरिश्ते फेहरिस्त तैयार करते हैं, इसलिए इस रात में हर मुमकिन स्तर पर इबादत करनी चाहिए ताकि अगर दिवंगत वाली फेहरिस्त में नाम आए तो फिर इबादत करने वालों में शुमार हो सकें। शहर काजी सैयद हाजी कसीमुद्दीन का कहना है कि शब-ए- बरआत वाली रात में अल्लाह की इबादत कर अपने दिवंगत परिजनों को सवाब बख्शने की भी खास अहमियत मानी गई है।
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- रातभर जागकर इबादत करने वालों को गुनाहों से मुक्ति मिलती है
अमर उजाला ब्यरो
गढ़मुक्तेश्वर। शब-ए- बरआत गुनाहों से निजात अर्थात मुक्ति वाली रात है, जिसमें आतिशबाजी करना शरई लिहाज से पूरी तरह हराम है। इस रात में इबादत करने और दिवंगतों को सवाब बख्शने का विशेष मजहबी महत्व है।
शब-ए- बरआत को मजहबे इस्लाम में निजात अर्थात गुनाहों से मुक्ति मिलने वाली रात कहा जाता है, क्योंकि इस रात को फरिश्ते साल भर में दिवंगत होने वालों की फेहरिस्त तैयार करते हैं। इसलिए इस रात को जागकर अल्लाह की इबादत करने का एक खास मुकाम है, लेकिन नासमझी और रूढ़िवादी परंपराओं के चलते रातभर जागने की बजाए घरों में हलवा बनवाने और आतिशबाजी करने की तरफ तवज्जोह देने लगे हैं। जिसे मजहबी उलेमाओं ने पूरी तरह हराम और नाजायज करार दिया है। मौलाना अमीरुल हक ने बताया कि कि शब-ए- बरआत निजात अर्थात गुनाहों से मुक्ति वाली रात है। जिसमें जागकर इबादत करने वालों पर अल्लाह की खास रहमत नाजिल होती है, लेकिन जो लोग इस रात को आतिशबाजी करते हैं। उन पर अल्लाह की लानत होती है, क्योंकि आतिशबाजी करना मजहबे इस्लाम में पूरी तरह गैर शरअई और हराम है। मुफ्ती मोहम्मद अनस का कहना है कि शब-ए-बरआत की रात में नफिल नमाज, कुरान पाक की तिलावत और अल्लाह का जिक्र करने की खास अहमियत है, इसलिए किसी भी हालत में आतिशबाजी न करें और बच्चों को भी सख्ती के साथ इससे रोकें। उन्होंने बताया कि शब-ए- बरआत वाली रात में एक साल के भीतर दिवंगत होने वालों की फरिश्ते फेहरिस्त तैयार करते हैं, इसलिए इस रात में हर मुमकिन स्तर पर इबादत करनी चाहिए ताकि अगर दिवंगत वाली फेहरिस्त में नाम आए तो फिर इबादत करने वालों में शुमार हो सकें। शहर काजी सैयद हाजी कसीमुद्दीन का कहना है कि शब-ए- बरआत वाली रात में अल्लाह की इबादत कर अपने दिवंगत परिजनों को सवाब बख्शने की भी खास अहमियत मानी गई है।
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