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महोबा : नर्सिंगहोमों में प्रसव कराने पर नहीं मिलेगा ‘आयुष्मान’ का लाभ
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हमीरपुर। निजी अस्पतालों में प्रसव कराने पर अब गोल्डन कार्ड के जरिये भुगतान नहीं हो पाएगा। सरकारी अस्पतालों में ही प्रसव कराने पर लाभ मिलेगा। दरअसल शासन की जांच में कुछ निजी अस्पताल ऐसे भी मिले हैं, जो अधिक कमाई के चक्कर में सामान्य की जगह सिजेरियन डिलीवरी कर रहे थे। इस रिपोर्ट के आधार पर शासन ने नया आदेश जारी किया है।
आयुष्मान भारत योजना के नोडल अधिकारी डॉ. महेश चंद्रा ने बताया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में आयुष्मान भारत योजना की शुरूआत की थी। इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पांच लाख रुपये तक का बीमा कवर दिया जा रहा है। लाभार्थी को गोल्डन कार्ड दिया जाता है।
गोल्डन कार्ड की मदद से लाभार्थी और उनके परिवार के सदस्य संबद्ध अस्पतालों में साल में पांच लाख रुपये तक का इलाज करा सकते हैं। जिले में तीन निजी और 14 सरकारी अस्पताल संबद्ध हैं।
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शासन द्वारा नामित एक एजेंसी ने पाया कि नर्सिंगहोम मुनाफा कमाने के लिए सामान्य प्रसव की बजाए ऑपरेशन कर रहे हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में ही लाभार्थियों को प्रसव कराने पर योजना का लाभ मिलने का आदेश जारी हो गया है।
इनसेट
चार साल में 5.96 करोड़ हुआ इलाज पर खर्च
जिले में 5,55,599 गोल्डन कार्ड के लाभार्थी हैं। इनमें से 1,65,000 के कार्ड बन चुके हैं। चार सालों में 5242 लाभार्थियों ने सरकारी और निजी अस्पतालों में इलाज कराया। इनके इलाज पर शासन ने 5.96 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।
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आयुष्मान भारत योजना के नोडल अधिकारी डॉ. महेश चंद्रा ने बताया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में आयुष्मान भारत योजना की शुरूआत की थी। इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पांच लाख रुपये तक का बीमा कवर दिया जा रहा है। लाभार्थी को गोल्डन कार्ड दिया जाता है।
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गोल्डन कार्ड की मदद से लाभार्थी और उनके परिवार के सदस्य संबद्ध अस्पतालों में साल में पांच लाख रुपये तक का इलाज करा सकते हैं। जिले में तीन निजी और 14 सरकारी अस्पताल संबद्ध हैं।
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शासन द्वारा नामित एक एजेंसी ने पाया कि नर्सिंगहोम मुनाफा कमाने के लिए सामान्य प्रसव की बजाए ऑपरेशन कर रहे हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में ही लाभार्थियों को प्रसव कराने पर योजना का लाभ मिलने का आदेश जारी हो गया है।
इनसेट
चार साल में 5.96 करोड़ हुआ इलाज पर खर्च
जिले में 5,55,599 गोल्डन कार्ड के लाभार्थी हैं। इनमें से 1,65,000 के कार्ड बन चुके हैं। चार सालों में 5242 लाभार्थियों ने सरकारी और निजी अस्पतालों में इलाज कराया। इनके इलाज पर शासन ने 5.96 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।