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Hamirpur News: अपनाें का नहीं मिला सहारा तो वृद्धाश्रम बना ठिकाना
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हमीरपुर। बच्चों को इस उम्मीद में पाल-पोसकर बड़ा किया कि बुढ़ापे में उनका सहारा बनेंगे, लेकिन उनके अपने बच्चे हुए तो बूढ़े मां-बाप को ही भूल गए। उनको दो वक्त की रोटी भी नहीं दे रहे। अपनों से उपेक्षित ये बुजुर्ग अब वृद्धाश्रम में आश्रय लिए हैं।
शहर में कानपुर-सागर हाईवे किनारे बने वृद्धाश्रम में 80 बुजुर्गों ने शरण ले रखी है। इनमें 50 पुरुष और 30 महिलाएं हैं। रविवार की दोपहर करीब दो बजे टीवी पर धारावाहिक श्रवण कुमार देख रहे थे। इनसे घर परिवार के बारे में पूछा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। बोले-यदि बहू-बेटे साथ रखते और दो वक्त की रोटी देते तो यहां आने की नौबत क्यों आती।
आश्रम संचालक जितेंद्र सिंह परमार ने बताया कि यहां रहने वाले बुजुर्गों की अच्छे से देखभाल की जाती है। समय-समय पर इनका स्वास्थ्य परीक्षण भी कराया जाता है।
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घर में नहीं रहने देतीं बहुए
शहर के भिलावां निवासी बुजुर्ग रामनारायण और उनकी पत्नी मुलिया करीब पांच साल से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। परिवार के बारे में पूछने पर दोनों फफक-फफक रो पड़े। बताया कि दो बेटे और तीन बेटियां हैं। बहुएं घर में नहीं रहने देतीं। हमारे पास जो भी था, सब छीन लिया। अगर यहां न आते तो जिंदा भी नहीं रहते।
हाल-चाल भी नहीं लेते भतीजे
सुमेरपुर क्षेत्र के उजनेड़ी गांव निवासी दिव्यांग बुजुर्ग रामसिंह अविवाहित हैं। पांच भाइयों में वह ही जिंदा हैं। बताया कि कोरोना काल में आंखों की रोशनी चली गई। दो साल से वृद्धाश्रम में हैं। बताया कि कभी-कभार भतीजी आ जाती है। भतीजे हाल-चाल भी लेने नहीं आए।
शुगर की बीमारी हुई तो पत्नी ने बना लीं दूरिया
कुडौरा दरियापुर निवासी बरदानी (80) बताते हैं कि करीब 30 साल से पत्नी से बोलचाल नहीं है। बताया कि उन्हें शुगर की बीमारी है। गांव की महिलाओं ने इसे छुआछूत की बीमारी बताकर पत्नी को भड़का दिया। तब से उसने दूरियां बना ली। बताया कि करीब 10 साल से वृद्धाश्रम में हैं।
बहू के उत्पीड़न से छोड़ दिया घर
सुमेरपुर के पारा गांव निवासी रनिया (70) दो साल से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। बताती हैं कि एक ही पुत्र है। पति की 30 साल पहले मौत हो गई थी। बहू लड़ती है और मारती है। परेशान होकर यहां रह रही है। कभी-कभी बेटा मिलने आ जाता है।
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शहर में कानपुर-सागर हाईवे किनारे बने वृद्धाश्रम में 80 बुजुर्गों ने शरण ले रखी है। इनमें 50 पुरुष और 30 महिलाएं हैं। रविवार की दोपहर करीब दो बजे टीवी पर धारावाहिक श्रवण कुमार देख रहे थे। इनसे घर परिवार के बारे में पूछा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। बोले-यदि बहू-बेटे साथ रखते और दो वक्त की रोटी देते तो यहां आने की नौबत क्यों आती।
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आश्रम संचालक जितेंद्र सिंह परमार ने बताया कि यहां रहने वाले बुजुर्गों की अच्छे से देखभाल की जाती है। समय-समय पर इनका स्वास्थ्य परीक्षण भी कराया जाता है।
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घर में नहीं रहने देतीं बहुए
शहर के भिलावां निवासी बुजुर्ग रामनारायण और उनकी पत्नी मुलिया करीब पांच साल से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। परिवार के बारे में पूछने पर दोनों फफक-फफक रो पड़े। बताया कि दो बेटे और तीन बेटियां हैं। बहुएं घर में नहीं रहने देतीं। हमारे पास जो भी था, सब छीन लिया। अगर यहां न आते तो जिंदा भी नहीं रहते।
हाल-चाल भी नहीं लेते भतीजे
सुमेरपुर क्षेत्र के उजनेड़ी गांव निवासी दिव्यांग बुजुर्ग रामसिंह अविवाहित हैं। पांच भाइयों में वह ही जिंदा हैं। बताया कि कोरोना काल में आंखों की रोशनी चली गई। दो साल से वृद्धाश्रम में हैं। बताया कि कभी-कभार भतीजी आ जाती है। भतीजे हाल-चाल भी लेने नहीं आए।
शुगर की बीमारी हुई तो पत्नी ने बना लीं दूरिया
कुडौरा दरियापुर निवासी बरदानी (80) बताते हैं कि करीब 30 साल से पत्नी से बोलचाल नहीं है। बताया कि उन्हें शुगर की बीमारी है। गांव की महिलाओं ने इसे छुआछूत की बीमारी बताकर पत्नी को भड़का दिया। तब से उसने दूरियां बना ली। बताया कि करीब 10 साल से वृद्धाश्रम में हैं।
बहू के उत्पीड़न से छोड़ दिया घर
सुमेरपुर के पारा गांव निवासी रनिया (70) दो साल से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। बताती हैं कि एक ही पुत्र है। पति की 30 साल पहले मौत हो गई थी। बहू लड़ती है और मारती है। परेशान होकर यहां रह रही है। कभी-कभी बेटा मिलने आ जाता है।