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उपेक्षित ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षा की दरकार
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
Updated Sun, 09 Aug 2015 11:59 PM IST
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आजादी की लड़ाई में जिले के कई स्थलों व इमारतों का इस्तेमाल हुआ, पर
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इन्हें सहेजने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। पुरातत्व विभाग का जिले में
कोई दफ्तर नहीं है और न ही कोई अधिकारी/कर्मचारी यहां आता है। वहीं प्रशासन
की भी नजरें इन ऐतिहासिक धरोहरों की तरफ इनायत नहीं हो रही हैं।
मुख्यालय में लगभग 736 वर्ष पूर्व यमुना तट स्थित हाथी दरवाजा राजस्थान के अलवर जिले से आए हम्मीरदेव/हम्मीर वर्मन (कल्चुरी राजपूत) ने निर्मित कराया था।
1857 की क्रांति के समय मराठों नेे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की, वीर गति को प्राप्त इन मराठों की स्मृतियां मठों, मजारों तथा मंदिरों तक सीमित रह गई हैं। लेकिन इन पुरानी धरोहरों की मरम्मत नहीं कराई जा रही है।
जिससे यह इमारतें खंडहर में तब्दील होती जा रही है। मिसाल के तौर पर महिला थाने के पीछे खड़ा एक मठ खंडहर में तब्दील हो रहा है। गहरौली गांव का बांके बिहारी जू मंदिर आंदोलन का मुख्य केंद्र रहा।
ब्रिटिश हुकूमत में इसी मंदिर से बुंदेलखंड केसरी अखबार का प्रकाशन हुआ। 1936 में हुए जनपदीय अधिवेशन में पंड़ित जवाहर लाल नेहरू शामिल हुए।
आंदोलन का मुख्य केंद्र बांके बिहारी जू मंदिर
आजादी दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले गहरौली गांव के एक दर्जन से अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांव के मंदिर में एकत्र होते थे। मंदिर लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुराना है। 1936 में कांग्रेस का पहला जनपदीय अधिवेशन हुआ था। तब पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए थे। आजादी की याद ताजा करने वाले इस मंदिर की दशा बेहद जर्जर है। मंदिर में बैठकर योजनाओं का ताना-बाना बुनने के साथ बुंदेलखंड केसरी अखबार छापकर भोर होने से पहले लोगों तक पहुंचाकर अपनी भावनाएं जागृत करते थे। प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष विमल गुरूदेव कहते हैं कि मंदिर विशाल है और कमेटी में इतना धन नहीं है कि एक साथ मरम्मत और पुताई करा सके। पुरातत्व में शामिल कराने की कई बार प्रशासन से फरियाद लगा चुके हैं पर उनकी आवाज किसी ने सुनी नहीं।
अतिक्रमण का शिकार हाथी दरवाजा
राजस्थान के अलवर से 1180 ईसवी में दिल्ली सल्तनत के दबाव से मुख्यालय आ बसे कल्चुरी राजपूत हम्मीरदेव ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया। चूंकि यह क्षेत्र तीन दिशाओं से यमुना बेतवा नदी के जलप्रवाह से घिरा था। सिलिए कोई भी आक्रमणकारी इन जलधाराओं को पार करने का साहस नहीं जुटा पाता था या फिर सुरक्षा प्रहरियों के नजरों में आ जाता था। हम्मीरदेव ने हाथी दरवाजे के महराब के दोनों ओर शुभ संकेत सूचक दो मछलियों को एक दूसरे को निहारते दर्शाया है। इसी द्वार से नरेश का हाथी यमुना तट स्थित किले में आया जाया करता था। इस गेट पर अतिक्रमण हो जाने से दरारें पड़ गई हैं।
जर्जर हो चला मराठों का मठ
1857 ईसवी में अंग्रेजों के खिलाफ जंग करने वाले मराठों के कालखंड में अनेकों मठ मंदिरों व इमारतों का निर्माण हुआ। जिनमें अधिकांश जमींदोज हो चुके हैं। इन्हीं में से एक महिला थाने के पीछे एक मठ स्थित है। भवनों के भित्त-चित्र बेल-बूटे मराठा व मुगल कालीन वास्तुकला के बेजोड़ नमूने खंडित होते जा रहे हैं। परंतु इतिहास के जानकार आज भी इन इमारतों के बोलते पत्थरों में गुजरे कालखंड की कला व संस्कृति को अपनी पारखी नजर से पढ़ व समझ लेते हैं। यह ऐतिहासिक धरोहर यमुना नदी में पाए जाने वाले ककरीले पत्थरों को ईंटों का आकार देकर बनाई गई है। जो अब किसी भी समय इतिहास के गर्त में समाने का इंतजार में है।
युवा पीढ़ी को इतिहास बताने की जरूरत
प्राचीन धरोहरों को संवारने के साथ देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गहरौली, मगरौठ, पिपरौधा जैसे गांवों का इतिहास आज युवा पीढ़ी को जानने की जरूरत है। इसके लिए छोटे छोटे वर्कशाप कराने की जरूरत है। गहरौली गांव में जहां 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के सानिध्य में अधिवेशन हुआ था मौजूदा समय में वहां मवेशियों को बांधा जा रहा है। हमें इतिहास को संजोकर रखने की जरूरत है।
डा.भवानीदीन, रीडर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
मुख्यालय में लगभग 736 वर्ष पूर्व यमुना तट स्थित हाथी दरवाजा राजस्थान के अलवर जिले से आए हम्मीरदेव/हम्मीर वर्मन (कल्चुरी राजपूत) ने निर्मित कराया था।
1857 की क्रांति के समय मराठों नेे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की, वीर गति को प्राप्त इन मराठों की स्मृतियां मठों, मजारों तथा मंदिरों तक सीमित रह गई हैं। लेकिन इन पुरानी धरोहरों की मरम्मत नहीं कराई जा रही है।
जिससे यह इमारतें खंडहर में तब्दील होती जा रही है। मिसाल के तौर पर महिला थाने के पीछे खड़ा एक मठ खंडहर में तब्दील हो रहा है। गहरौली गांव का बांके बिहारी जू मंदिर आंदोलन का मुख्य केंद्र रहा।
ब्रिटिश हुकूमत में इसी मंदिर से बुंदेलखंड केसरी अखबार का प्रकाशन हुआ। 1936 में हुए जनपदीय अधिवेशन में पंड़ित जवाहर लाल नेहरू शामिल हुए।
आंदोलन का मुख्य केंद्र बांके बिहारी जू मंदिर
आजादी दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले गहरौली गांव के एक दर्जन से अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांव के मंदिर में एकत्र होते थे। मंदिर लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुराना है। 1936 में कांग्रेस का पहला जनपदीय अधिवेशन हुआ था। तब पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए थे। आजादी की याद ताजा करने वाले इस मंदिर की दशा बेहद जर्जर है। मंदिर में बैठकर योजनाओं का ताना-बाना बुनने के साथ बुंदेलखंड केसरी अखबार छापकर भोर होने से पहले लोगों तक पहुंचाकर अपनी भावनाएं जागृत करते थे। प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष विमल गुरूदेव कहते हैं कि मंदिर विशाल है और कमेटी में इतना धन नहीं है कि एक साथ मरम्मत और पुताई करा सके। पुरातत्व में शामिल कराने की कई बार प्रशासन से फरियाद लगा चुके हैं पर उनकी आवाज किसी ने सुनी नहीं।
अतिक्रमण का शिकार हाथी दरवाजा
राजस्थान के अलवर से 1180 ईसवी में दिल्ली सल्तनत के दबाव से मुख्यालय आ बसे कल्चुरी राजपूत हम्मीरदेव ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया। चूंकि यह क्षेत्र तीन दिशाओं से यमुना बेतवा नदी के जलप्रवाह से घिरा था। सिलिए कोई भी आक्रमणकारी इन जलधाराओं को पार करने का साहस नहीं जुटा पाता था या फिर सुरक्षा प्रहरियों के नजरों में आ जाता था। हम्मीरदेव ने हाथी दरवाजे के महराब के दोनों ओर शुभ संकेत सूचक दो मछलियों को एक दूसरे को निहारते दर्शाया है। इसी द्वार से नरेश का हाथी यमुना तट स्थित किले में आया जाया करता था। इस गेट पर अतिक्रमण हो जाने से दरारें पड़ गई हैं।
जर्जर हो चला मराठों का मठ
1857 ईसवी में अंग्रेजों के खिलाफ जंग करने वाले मराठों के कालखंड में अनेकों मठ मंदिरों व इमारतों का निर्माण हुआ। जिनमें अधिकांश जमींदोज हो चुके हैं। इन्हीं में से एक महिला थाने के पीछे एक मठ स्थित है। भवनों के भित्त-चित्र बेल-बूटे मराठा व मुगल कालीन वास्तुकला के बेजोड़ नमूने खंडित होते जा रहे हैं। परंतु इतिहास के जानकार आज भी इन इमारतों के बोलते पत्थरों में गुजरे कालखंड की कला व संस्कृति को अपनी पारखी नजर से पढ़ व समझ लेते हैं। यह ऐतिहासिक धरोहर यमुना नदी में पाए जाने वाले ककरीले पत्थरों को ईंटों का आकार देकर बनाई गई है। जो अब किसी भी समय इतिहास के गर्त में समाने का इंतजार में है।
युवा पीढ़ी को इतिहास बताने की जरूरत
प्राचीन धरोहरों को संवारने के साथ देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गहरौली, मगरौठ, पिपरौधा जैसे गांवों का इतिहास आज युवा पीढ़ी को जानने की जरूरत है। इसके लिए छोटे छोटे वर्कशाप कराने की जरूरत है। गहरौली गांव में जहां 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के सानिध्य में अधिवेशन हुआ था मौजूदा समय में वहां मवेशियों को बांधा जा रहा है। हमें इतिहास को संजोकर रखने की जरूरत है।
डा.भवानीदीन, रीडर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय