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फसल बीमा के नाम पर ठगे गए किसान
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
Updated Mon, 13 Apr 2015 12:07 AM IST
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फसल बीमा के नाम पर किसानों का करोड़ो रूपये प्रीमियम के नाम पर बीमा
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कंपनियां डकार रहीं है। लेकिन किसानों को फसलों की क्षति का बीमा नहीं दे
रहीं हैं। किसान संगठनों के साथ ही आम किसान अपनी फसलों के नुकसान पर बीमा
क्लेम पाने के लिए बैंको के चक्कर लगा रहा है। सबसे खराब स्थिति कसबा स्थित
भारतीय स्टेट बैंक की है। जहां वर्ष 2009 के बाद से फसलों की क्षति का
बीमा क्लेम के नाम पर एक धेला भी नहीं दिया गया है।
कृषि ऋणों में फसलों का बीमा अनिवार्य रूप से किया जाता है और कर्ज देने के साथ ही बीमा की धनराशि काटकर संबंधित कंपनियाें को भेज दी जाती है। देखा जाए तो राजस्व विभाग देर सबेर क्षतिग्रस्त फसलों का मुआवजा किसानों को दे रहा है। लेकिन संबंधित बीमा कंपनी फसल बीमा देने के नाम पर खामोश है।
बतौर बानगी कसबा स्थित स्टेट बैंक को ले रहें हैं। बैंक शाखा में पड़ताल करने पर पाया कि रबी 2014 में 117 किसानों से प्रीमियम राशि 1,74,600 रूपये काटी गई और फसल बीमा कंपनी को गई। इसी के बाद बीते अक्तूबर से दिसंबर तक 108 केसीसी धारक किसानों का प्रीमियम 2,57,427 रूपये भेजा गया।
एक अप्रैल से जुलाई 2014 तक 143 किसानों का 2,56,547 रूपये भेजा जा चुका है। लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है कि फसली ऋण पर प्रीमियम कटवा चुके इन अभागे किसानों को क्लेम नहीं दिया गया है। जबकि यह किसान भी फसल बर्बादी का शिकार हैं। बैंक अधिकारियों की मानें तो किसान केसीसी बनवाते समय जो खसरा लगाता है।
इसके बाद फसल चक्र बदलने के साथ ही दूसरा खसरा देना चाहिए। गेहूं की फसल में लागत अधिक होने पर कर्ज भी ज्यादा मिलता है। इसलिए ज्यादातर किसान गेहूं व दलहन का ही खसरा लगाते है। वहीं खसरा को प्रतिवर्ष नहीं बदला जाता है। यहां आई केंद्र सरकार की टीम को भी किसानों ने फसल क्षति बीमा नही दिए जाने की शिकायतें दर्ज कराई हैं।
फसलों की क्षति देखकर केंद्रीय टीम ने किसानों को सलाह दे चुकी है कि जो फसलें बचीं है उसे अगले वर्ष बीज के रूप में इस्तेमाल न करें। क्योंकि इन फसलों के दाने बेकार हो गए है। एसबीआई के फील्ड आफीसर सतीश कुमार ने कहा कि बैंक शाखाओं में रबी व खरीफ की फसलों का प्रीमियम सहित रिपोर्ट भेजी जाती है।
लेकिन वर्ष 2009 से इस बैंक में किसी भी किसान की बीमा राशि नहीं आई है। हालत यह है कि सबसे पहले न्यू इंडिया फसल बीमा कंपनी प्रीमियम लेती रही। इसके बाद आईसीआईसीआई लोम्बार्ड बीमा कंपनी आई। वह भी प्रीमियम की धनराशि ले गई। अब खरीफ और रबी अभियान का प्रीमियम इफको टोक्यो बीमा कंपनी अधिकृत होने पर बैंक से धन ले जा चुका है। इन कंपनियों को प्रदेश स्तर से जिले आवंटित कर दिए जाते हैं।
कृषि ऋणों में फसलों का बीमा अनिवार्य रूप से किया जाता है और कर्ज देने के साथ ही बीमा की धनराशि काटकर संबंधित कंपनियाें को भेज दी जाती है। देखा जाए तो राजस्व विभाग देर सबेर क्षतिग्रस्त फसलों का मुआवजा किसानों को दे रहा है। लेकिन संबंधित बीमा कंपनी फसल बीमा देने के नाम पर खामोश है।
बतौर बानगी कसबा स्थित स्टेट बैंक को ले रहें हैं। बैंक शाखा में पड़ताल करने पर पाया कि रबी 2014 में 117 किसानों से प्रीमियम राशि 1,74,600 रूपये काटी गई और फसल बीमा कंपनी को गई। इसी के बाद बीते अक्तूबर से दिसंबर तक 108 केसीसी धारक किसानों का प्रीमियम 2,57,427 रूपये भेजा गया।
एक अप्रैल से जुलाई 2014 तक 143 किसानों का 2,56,547 रूपये भेजा जा चुका है। लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है कि फसली ऋण पर प्रीमियम कटवा चुके इन अभागे किसानों को क्लेम नहीं दिया गया है। जबकि यह किसान भी फसल बर्बादी का शिकार हैं। बैंक अधिकारियों की मानें तो किसान केसीसी बनवाते समय जो खसरा लगाता है।
इसके बाद फसल चक्र बदलने के साथ ही दूसरा खसरा देना चाहिए। गेहूं की फसल में लागत अधिक होने पर कर्ज भी ज्यादा मिलता है। इसलिए ज्यादातर किसान गेहूं व दलहन का ही खसरा लगाते है। वहीं खसरा को प्रतिवर्ष नहीं बदला जाता है। यहां आई केंद्र सरकार की टीम को भी किसानों ने फसल क्षति बीमा नही दिए जाने की शिकायतें दर्ज कराई हैं।
फसलों की क्षति देखकर केंद्रीय टीम ने किसानों को सलाह दे चुकी है कि जो फसलें बचीं है उसे अगले वर्ष बीज के रूप में इस्तेमाल न करें। क्योंकि इन फसलों के दाने बेकार हो गए है। एसबीआई के फील्ड आफीसर सतीश कुमार ने कहा कि बैंक शाखाओं में रबी व खरीफ की फसलों का प्रीमियम सहित रिपोर्ट भेजी जाती है।
लेकिन वर्ष 2009 से इस बैंक में किसी भी किसान की बीमा राशि नहीं आई है। हालत यह है कि सबसे पहले न्यू इंडिया फसल बीमा कंपनी प्रीमियम लेती रही। इसके बाद आईसीआईसीआई लोम्बार्ड बीमा कंपनी आई। वह भी प्रीमियम की धनराशि ले गई। अब खरीफ और रबी अभियान का प्रीमियम इफको टोक्यो बीमा कंपनी अधिकृत होने पर बैंक से धन ले जा चुका है। इन कंपनियों को प्रदेश स्तर से जिले आवंटित कर दिए जाते हैं।