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नौ मार्च को बनाई योजना, तीन दिन बाद मार डाला
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भरुआसुमेरपुर। बर्रा कानपुर निवासी मामा और भांजे की हत्या की योजना नौ मार्च को बनाई गई थी। तीन दिन बाद हत्या को अंजाम दिया गया। हत्या के मकसद से ही दोनों को यहां बुलाया गया था। एनजीओ के लाखों रुपये हड़पने के लिए दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया।
बर्रा निवासी दयाराम जन कल्याण बाल उत्थान सेवा संस्थान नाम से एनजीओ चलाते थे। पत्योरा निवासी संतराम, उसके पिता शंकरी निषाद और उसके मामा राम स्वरूप इसमें काम करते थे। दयाराम की मौत के बाद संतराम ने अपने मामा रामस्वरूप के साथ मिलकर एनजीओ पर कब्जा कर खाते में आई लाखों रुपये की धनराशि डकार ली। दयाराम के पुत्र मयंक ने जब संतराम से हिसाब किताब का दबाव बनाया तो यह उसे टरकाता रहा। 9 मार्च को मयंक शर्मा हिसाब के साथ तगादे के लिए पत्योरा आया और संतराम पर रुपये देने का दबाव बनाया। संतराम ने एक-दो दिन में इंतजाम कर बुलाने का वायदा कर मयंक को वापस कर दिया। उसी दिन उसने मामा व पिता शंकरी निषाद के साथ मिलकर मयंक को ठिकाने लगाने की पटकथा लिख डाली। सोची समझी रणनीति के तहत 12 मार्च को सुबह संतराम ने मयंक को गांव आने के लिए कहा। मयंक कानपुर से भांजे विपुल को लेकर पहुंचा तो दोनों की हत्या कर शव कुएं में फेंक दिए गए।
गांव आने पर जब मयंक की बात परिजनों से नहीं हुई, तब 13 मार्च को मयंक की बहन प्रिया शर्मा पुलिस के साथ मयंक की खोज करने पहुंची, लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। इसके बाद 14 मार्च को पुलिस अधीक्षक कमलेश दीक्षित से मिलकर भाई व भांजे को खोजने की गुहार लगाई। पुलिस ने संतराम व पिता शंकरी से कड़ाई से पूछताछ की। वह पुलिस को गुमराह कर अपने को निर्दोष बताता रहा, लेकिन 16 मार्च को रामस्वरूप को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की गई तो उसने हत्या की घटना कबूल कर ली।
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बर्रा निवासी दयाराम जन कल्याण बाल उत्थान सेवा संस्थान नाम से एनजीओ चलाते थे। पत्योरा निवासी संतराम, उसके पिता शंकरी निषाद और उसके मामा राम स्वरूप इसमें काम करते थे। दयाराम की मौत के बाद संतराम ने अपने मामा रामस्वरूप के साथ मिलकर एनजीओ पर कब्जा कर खाते में आई लाखों रुपये की धनराशि डकार ली। दयाराम के पुत्र मयंक ने जब संतराम से हिसाब किताब का दबाव बनाया तो यह उसे टरकाता रहा। 9 मार्च को मयंक शर्मा हिसाब के साथ तगादे के लिए पत्योरा आया और संतराम पर रुपये देने का दबाव बनाया। संतराम ने एक-दो दिन में इंतजाम कर बुलाने का वायदा कर मयंक को वापस कर दिया। उसी दिन उसने मामा व पिता शंकरी निषाद के साथ मिलकर मयंक को ठिकाने लगाने की पटकथा लिख डाली। सोची समझी रणनीति के तहत 12 मार्च को सुबह संतराम ने मयंक को गांव आने के लिए कहा। मयंक कानपुर से भांजे विपुल को लेकर पहुंचा तो दोनों की हत्या कर शव कुएं में फेंक दिए गए।
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गांव आने पर जब मयंक की बात परिजनों से नहीं हुई, तब 13 मार्च को मयंक की बहन प्रिया शर्मा पुलिस के साथ मयंक की खोज करने पहुंची, लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। इसके बाद 14 मार्च को पुलिस अधीक्षक कमलेश दीक्षित से मिलकर भाई व भांजे को खोजने की गुहार लगाई। पुलिस ने संतराम व पिता शंकरी से कड़ाई से पूछताछ की। वह पुलिस को गुमराह कर अपने को निर्दोष बताता रहा, लेकिन 16 मार्च को रामस्वरूप को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की गई तो उसने हत्या की घटना कबूल कर ली।
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