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Hamirpur News: खून की कमी बीमारी नहीं, बीमारियों की जड़
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हमीरपुर। खून की कमी (एनीमिया) कोई बीमारी नहीं लेकिन कई बीमारियों की वजह बन सकती है। समय रहते खानपान को व्यवस्थित करना और कुछ बुरी आदतों को छोड़कर इस समस्या से बचा जा सकता है। राहत की बात है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 के अनुसार जनपद में इसमें तेजी से सुधार हुआ है। गर्भवती महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया की समस्या ज्यादा होती है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव काल के दौरान खानपान का विशेष ख्याल रखना चाहिए। नियमित रूप से जांच कराते रहना चाहिए ताकि एनीमिया बचाव हो सके। एनीमिया कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक ऐसी अवस्था है जो शारीरिक रूप से व्यक्ति की क्षमता को प्रदर्शित करती है। अगर समय रहते निदान नहीं किया गया तो कई बीमारियों की वजह बन जाती है।
वर्ष 2015-16 में हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 में 15 से 19 साल की 55.7 प्रतिशत किशोरियां एनीमिया से ग्रसित थी। वर्ष 2019-21 में हुए पांचवें सर्वे में यह आंकड़ा घटकर 49.7 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसी सर्वे में 15 से 49 वर्ष की 50.9 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित मिली थी। पांचवें सर्वे में इसी कमी में आई और प्रतिशत घटकर 34.5 पर पहुंच गया। इसी आयुवर्ग की गैर-गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत 51.8 से घटकर 46.4 प्रतिशत पर पहुंच चुका है।
आरबीएसके के नोडल अधिकारी डॉ. एलबी गुप्ता ने बताया कि वर्ष 2022-23 में टीमों ने स्कूल-कॉलेज में 18 साल तक के किशोर-किशोरियों की स्क्रीनिंग कर एनीमिया से संबंधित 9105 मामलों को रेफर किया गया। 398 किशोर-किशोरियां गंभीर मिले। खास बात यह है कि इनमें 213 किशोर और 185 किशोरियां थी। आरबीएसके के नोडल अधिकारी ने बताया कि एनीमिया के तीन प्रकार हैं, अल्प, मध्यम और गंभीर। आरबीएसके आठवीं तक के बच्चों की दवा बीआरसी और इंटर के बच्चों की दवा कॉलेज को उपलब्ध कराती है। स्कूल न जाने वाले किशोरियों की दवा सीडीपीओ कार्यालय के माध्यम से आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचती है। प्रत्येक आंगनबाड़ी और स्कूल से एक शिक्षक को प्रशिक्षित किया जाता है।
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वर्ष 2015-16 में हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 में 15 से 19 साल की 55.7 प्रतिशत किशोरियां एनीमिया से ग्रसित थी। वर्ष 2019-21 में हुए पांचवें सर्वे में यह आंकड़ा घटकर 49.7 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसी सर्वे में 15 से 49 वर्ष की 50.9 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित मिली थी। पांचवें सर्वे में इसी कमी में आई और प्रतिशत घटकर 34.5 पर पहुंच गया। इसी आयुवर्ग की गैर-गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत 51.8 से घटकर 46.4 प्रतिशत पर पहुंच चुका है।
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आरबीएसके के नोडल अधिकारी डॉ. एलबी गुप्ता ने बताया कि वर्ष 2022-23 में टीमों ने स्कूल-कॉलेज में 18 साल तक के किशोर-किशोरियों की स्क्रीनिंग कर एनीमिया से संबंधित 9105 मामलों को रेफर किया गया। 398 किशोर-किशोरियां गंभीर मिले। खास बात यह है कि इनमें 213 किशोर और 185 किशोरियां थी। आरबीएसके के नोडल अधिकारी ने बताया कि एनीमिया के तीन प्रकार हैं, अल्प, मध्यम और गंभीर। आरबीएसके आठवीं तक के बच्चों की दवा बीआरसी और इंटर के बच्चों की दवा कॉलेज को उपलब्ध कराती है। स्कूल न जाने वाले किशोरियों की दवा सीडीपीओ कार्यालय के माध्यम से आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचती है। प्रत्येक आंगनबाड़ी और स्कूल से एक शिक्षक को प्रशिक्षित किया जाता है।
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