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ऊसर हो रही भूमि को सुधारने में जैविक खाद कारगर
Hamirpur
Updated Wed, 26 Nov 2014 05:30 AM IST
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सरीला (हमीरपुर)। रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग खेती के लिए घातक साबित हो रहा है। भूमि की खराब होती उर्वरा शक्ति की चिंता अब किसानों को सताने लगी है। रासायनिक खाद व कीटनाशक से उपजाऊ जमीनों पर परती के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि सरकार से लेकर किसान भी जैविक खेती की तरफ रुख करने लगे हैं। जैविक का खाद का इस्तेमाल कर फसल में अधिक पैदावार करने वाले किसान भूमि में हो रहे सुधार की बात कर रहे हैं। वहीं मृदा विशेषज्ञ भी जैविक खेती को मृदा सुधार का आधार बताते हैं। जैविक खेती को अपना चुके ऐसे किसान जिन्होंने पैदावार को बढ़ाकर खुशहाली की ओर अग्रसर हुए हैं। किसानों से की गई बातचीत पर पेश है मनोज द्विवेदी की रिपोर्ट-
दीमक से मिला छुटकारा
रिगवारा गांव के किसान भान मुखिया कहते हैं कि हाड़-तोड़ मेहनत और कीमती रासायनिक खादों के बावजूद फसलों में उत्पादन गिर रहा है। इसी को देखते उसने जैविक खेती अपनाई। कहते हैं कि उसके एक खेत में दीमक का प्रकोप था। इस खाद के अपनाने से दीमक का असर खत्म हो चुका है। कहते हैं कि इस बार उसने इस बार 9 बीघे में गेहूं व आठ बीघे खेत में मसूर की फसल बोई है। पिछले वर्ष वह जैविक खाद का प्रयोग कर चुका है। फसल में अच्छा उत्पादन मिलने का ही परिणाम है इस बार क्षेत्रफल बढ़ा दिया है। कहा कि इस बार तो उसने डीएपी व यूरिया खाद ही नहीं डाली है।
ऊसर हो रहे खेत
सरीला के किसान रामगोपाल विश्वकर्मा ने रासायनिक खाद से तौबा कर ली है। बताते हैं कि इसके छिड़काव से उसके दो खेतों में ऊसर के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। इस पर उसने कृषि विशेषज्ञों से राय ली, तो बताया गया कि जैविक खाद का प्रयोग करने से ऊसर खत्म होगा। पिछले वर्ष तीन बीघे में मसूर की फसल बोई और जैविक खाद डाली। इसका रिजल्ट अच्छा रहा। इस पर उसने इस बार पांच बीघे में मटर, मसूर व गन्ना की फसल में किया है। कहता है कि अन्य किसानों के खेतों को देखने से लगता है कि उसका प्रयोग सफल है। कहा कि खेत की मिट्टी भी बदली सी नजर आने लगी है।
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जैविक खाद से बढ़ी पैदावार
किसान सुधीर कुमार ने कहा कि बुंदेलखंड के किसानों को जैविक खेती करनी चाहिए। यहां के किसानों के लिए बरदान साबित होगी। पिछले साल इसे आजमाने के बाद इस बार 80 फीसदी खेती में जैविक खाद का प्रयोग किया है। फसल का जमाव अच्छा दिखाई दे रहा है। जमीन की गुणवत्ता भी ठीक समझ में आ रही है। कहते हैं कि जैविक खेती तो पुराना तरीका है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में रासायनिक खाद के जगह ले लेने से मिट्टी की उत्पादन क्षमता को कमजोर हो चुकी है।
जैविक खाद से मिलने वाला लाभ
एक एकड़ जमीन पर गेहूं की बुआई में एक बोरी डीएपी डाले जाने से 1140 रुपये का खर्च आता है। जबकि इतने ही खेत में 10 किलो जैविक खाद डाली जाती है। जिसका खर्च सिर्फ 310 रुपये ही आ रहा है। वहीं गेहूं की फसल में यूरिया की भी जरूरत नहीं पड़ती है।
कोट्स...
रासायनिक खाद के डाले जाने से खेत में बैक्टीरिया मर जाते हैं। जिससे घास फूस नहीं सड़ती है। भूमि में 16 तत्व होते हैं। जो रासायनिक खादों के प्रयोग से घटते जा रहे हैं। इससे खेतों की मिट्टी प्रभावित हो रही है। वहीं पैदा होने वाले अनाज के प्रयोग के मानव व पशुओं पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। -----डा.वीके सचान, जैविक खेती विशेषज्ञ
कोट्स...
सरीला क्षेत्र के बरगढ़ गांव में 12 मिट्टी के नमूने लेकर मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में जांच की गई। जिसमें कई तत्वों की भारी कमी मिली है। मिट्टी में पाए गए दुष्परिणाम रासायनिक खादों के प्रयोग से सामने आए हैं। भू्मि की जलधारण क्षमता भी घटी है। कहते है कि मृदा सुधार का एकमात्र आधार जैविक खेती हैं। किसानों को जैविक खाद की ओर मुड़ना पड़ेगा। -----एम हबीब, अध्यक्ष जनपदीय मृदा परीक्षण प्रयोगशाला
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दीमक से मिला छुटकारा
रिगवारा गांव के किसान भान मुखिया कहते हैं कि हाड़-तोड़ मेहनत और कीमती रासायनिक खादों के बावजूद फसलों में उत्पादन गिर रहा है। इसी को देखते उसने जैविक खेती अपनाई। कहते हैं कि उसके एक खेत में दीमक का प्रकोप था। इस खाद के अपनाने से दीमक का असर खत्म हो चुका है। कहते हैं कि इस बार उसने इस बार 9 बीघे में गेहूं व आठ बीघे खेत में मसूर की फसल बोई है। पिछले वर्ष वह जैविक खाद का प्रयोग कर चुका है। फसल में अच्छा उत्पादन मिलने का ही परिणाम है इस बार क्षेत्रफल बढ़ा दिया है। कहा कि इस बार तो उसने डीएपी व यूरिया खाद ही नहीं डाली है।
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ऊसर हो रहे खेत
सरीला के किसान रामगोपाल विश्वकर्मा ने रासायनिक खाद से तौबा कर ली है। बताते हैं कि इसके छिड़काव से उसके दो खेतों में ऊसर के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। इस पर उसने कृषि विशेषज्ञों से राय ली, तो बताया गया कि जैविक खाद का प्रयोग करने से ऊसर खत्म होगा। पिछले वर्ष तीन बीघे में मसूर की फसल बोई और जैविक खाद डाली। इसका रिजल्ट अच्छा रहा। इस पर उसने इस बार पांच बीघे में मटर, मसूर व गन्ना की फसल में किया है। कहता है कि अन्य किसानों के खेतों को देखने से लगता है कि उसका प्रयोग सफल है। कहा कि खेत की मिट्टी भी बदली सी नजर आने लगी है।
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जैविक खाद से बढ़ी पैदावार
किसान सुधीर कुमार ने कहा कि बुंदेलखंड के किसानों को जैविक खेती करनी चाहिए। यहां के किसानों के लिए बरदान साबित होगी। पिछले साल इसे आजमाने के बाद इस बार 80 फीसदी खेती में जैविक खाद का प्रयोग किया है। फसल का जमाव अच्छा दिखाई दे रहा है। जमीन की गुणवत्ता भी ठीक समझ में आ रही है। कहते हैं कि जैविक खेती तो पुराना तरीका है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में रासायनिक खाद के जगह ले लेने से मिट्टी की उत्पादन क्षमता को कमजोर हो चुकी है।
जैविक खाद से मिलने वाला लाभ
एक एकड़ जमीन पर गेहूं की बुआई में एक बोरी डीएपी डाले जाने से 1140 रुपये का खर्च आता है। जबकि इतने ही खेत में 10 किलो जैविक खाद डाली जाती है। जिसका खर्च सिर्फ 310 रुपये ही आ रहा है। वहीं गेहूं की फसल में यूरिया की भी जरूरत नहीं पड़ती है।
कोट्स...
रासायनिक खाद के डाले जाने से खेत में बैक्टीरिया मर जाते हैं। जिससे घास फूस नहीं सड़ती है। भूमि में 16 तत्व होते हैं। जो रासायनिक खादों के प्रयोग से घटते जा रहे हैं। इससे खेतों की मिट्टी प्रभावित हो रही है। वहीं पैदा होने वाले अनाज के प्रयोग के मानव व पशुओं पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। -----डा.वीके सचान, जैविक खेती विशेषज्ञ
कोट्स...
सरीला क्षेत्र के बरगढ़ गांव में 12 मिट्टी के नमूने लेकर मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में जांच की गई। जिसमें कई तत्वों की भारी कमी मिली है। मिट्टी में पाए गए दुष्परिणाम रासायनिक खादों के प्रयोग से सामने आए हैं। भू्मि की जलधारण क्षमता भी घटी है। कहते है कि मृदा सुधार का एकमात्र आधार जैविक खेती हैं। किसानों को जैविक खाद की ओर मुड़ना पड़ेगा। -----एम हबीब, अध्यक्ष जनपदीय मृदा परीक्षण प्रयोगशाला