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कार्य परिषद तय करेगी खून के रिश्तेदारों का भविष्य
अमर उजाला ब्यूरो/गोरखपुर।
Updated Thu, 18 Aug 2016 08:07 PM IST
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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खून के रिश्तेदारों को प्रबंध समिति में शामिल करने के दोषी 22 कॉलेज प्रबंधन के भविष्य का फैसला अब यूनिवर्सिटी की कार्य परिषद करेगी। इसे लेकर कॉलेजों को सहूलियत देने के शासन के अनुरोध के बावजूद यूनिवर्सिटी की ओर से कार्य परिषद में लाने की वजह निर्णायक तकनीकी मुद्दों पर कार्य परिषद की सहमति की बाध्यता है।
2016-17 में संबद्धता देने के लिए चार महीने पहले तत्कालीन रजिस्ट्रार प्रभाष द्विवेदी ने कॉलेजों के दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान 22 कॉलेजों की प्रबंध समिति में खून के रिश्तेदारों का शामिल होना पाया था। रजिस्ट्रार ने इसे नियम विरुद्ध मानते हुए न केवल इन कॉलेजों की संबद्धता पर रोक लगा दी थी बल्कि प्रकरण को फर्जीवाड़ा बताते हुए शासन और राज्यपाल को इसका ब्यौरा भेज दिया था। कॉलेजों ने शासन में राहत की अपील की और बताया कि उन्हें नियम की जानकारी नहीं थी। कई कॉलेजों ने प्रबंध समिति में रिश्तेदार के शामिल न होने की बात भी कही।
पक्ष सुनने के बाद शासन ने कॉलेजों को राहत देने का फैसला किया और यूनिवर्सिटी को पत्र लिखकर तीन महीने में मामले को कॉलेजों के पक्ष में निस्तारित करने का अनुरोध किया। शासन की बात का मान रखते हुए यूनिवर्सिटी ने कॉलेजों से इस संबंध में सफाई पेश करने का अवसर दिया। यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से कॉलेजों को भेजे गए पत्र में उन्हें समिति में रिश्तेदारों के शामिल न होने का सबूत पेश करने को कहा गया। तय मियाद यानी आठ अगस्त तक ज्यादातर कॉलेजों ने अपनी सफाई भी दे दी।
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चूंकि मामला पेचीदा है, इसलिए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रकरण को कार्य परिषद की मुहर लगाने का फैसला किया है। ऐसे मेें अब कॉलेजों की निगाहें कार्य परिषद की आगामी बैठक पर टिकी है। हालांकि इसे लेकर कार्य परिषद की बैठक की तारीख यूनिवर्सिटी प्रशासन अभी तक तय नहीं कर सका है।
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2016-17 में संबद्धता देने के लिए चार महीने पहले तत्कालीन रजिस्ट्रार प्रभाष द्विवेदी ने कॉलेजों के दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान 22 कॉलेजों की प्रबंध समिति में खून के रिश्तेदारों का शामिल होना पाया था। रजिस्ट्रार ने इसे नियम विरुद्ध मानते हुए न केवल इन कॉलेजों की संबद्धता पर रोक लगा दी थी बल्कि प्रकरण को फर्जीवाड़ा बताते हुए शासन और राज्यपाल को इसका ब्यौरा भेज दिया था। कॉलेजों ने शासन में राहत की अपील की और बताया कि उन्हें नियम की जानकारी नहीं थी। कई कॉलेजों ने प्रबंध समिति में रिश्तेदार के शामिल न होने की बात भी कही।
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पक्ष सुनने के बाद शासन ने कॉलेजों को राहत देने का फैसला किया और यूनिवर्सिटी को पत्र लिखकर तीन महीने में मामले को कॉलेजों के पक्ष में निस्तारित करने का अनुरोध किया। शासन की बात का मान रखते हुए यूनिवर्सिटी ने कॉलेजों से इस संबंध में सफाई पेश करने का अवसर दिया। यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से कॉलेजों को भेजे गए पत्र में उन्हें समिति में रिश्तेदारों के शामिल न होने का सबूत पेश करने को कहा गया। तय मियाद यानी आठ अगस्त तक ज्यादातर कॉलेजों ने अपनी सफाई भी दे दी।
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चूंकि मामला पेचीदा है, इसलिए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रकरण को कार्य परिषद की मुहर लगाने का फैसला किया है। ऐसे मेें अब कॉलेजों की निगाहें कार्य परिषद की आगामी बैठक पर टिकी है। हालांकि इसे लेकर कार्य परिषद की बैठक की तारीख यूनिवर्सिटी प्रशासन अभी तक तय नहीं कर सका है।