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घंटाघर: करार में ही विज्ञापन नहीं लगाने की शर्त

Sat, 31 Oct 2015 01:31 AM IST
गोरखपुर।
गोरखपुर। Updated Sat, 31 Oct 2015 01:31 AM IST
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घंटाघर: करार में ही विज्ञापन नहीं लगाने की शर्त
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राजीव रंजन
गोरखपुर। घंटाघर पर विज्ञापन लगाने के लिए जिस शख्स ने घंटाघर (चीगान टावर) पर फ्लैक्स लगाकर लोगों को आमंत्रित किया है, वह खुद घंटाघर बनवाने वाले खानदान से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि घंटाघर बनवाने वाले चीगान साहू के पुत्रों ने म्युनिसिपल बोर्ड के अध्यक्ष से इस बात का करार किया था कि घंटाघर पर किसी भी तरह नोटिस, पोस्टर या विज्ञापन नहीं लगाया जा सकता है।
शहर की ऐतिहासिक इमारत घंटाघर पर इन दिनों राधा कृष्ण नाम के शख्स ने फ्लैक्स टांगकर वहां विज्ञापन लगाने के इच्छुक लोगों को न्योता दिया है। ‘अमर उजाला’ में यह रिपोर्ट छपने के बाद नगर निगम के उप नगर आयुक्त ने घंटाघर चौकी के प्रभारी और राजघाट थाना प्रभारी को पत्र लिखकर घंटाघर पर प्रचार करने वालों के खिलाफ वैधानिक और सुसंगत धाराओं में कार्रवाई करने को कहा है। हालांकि इस ऐतिहासिक इमारत को बनवाने वाले माताप्रसाद साहू उर्फ चीगान सेठ के बेटों रामखेलावन साहू और ठाकुर प्रसाद साहू के गोरखपुर म्युनिसिपल बोर्ड के अध्यक्ष के साथ किए गए करार के अनुसार भी यह पूरी तरह से गलत है।
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इन शर्तों पर हुआ था करार
1- घंटाघर हमेशा चीगान टावर के नाम से जाना जाएगा।
2- टावर पर लगा शिलालेख हमेशा बना रहेगा और टावर की मरम्मत और सफाई का काम बोर्ड के खर्च पर होगा।
3- जरूरत होने पर टावर और घड़ी की मरम्मत बोर्ड अपने खर्चे पर कराएगा और अगर बोर्ड ऐसा नहीं करता है तो दानदाता बोर्ड को इसकी मरम्मत के लिए कह सकता है।
4- बोर्ड की लिखित अनुमति से दानदाता या उनके वारिस या उनके द्वारा अधिकृत अपने खर्च पर टावर को बेहतर बनाने का काम कर सकते हैं।
5- म्युनिसिपल बोर्ड के नियमों के मुताबिक इस टावर पर कोई भी नोटिस, पोस्टर, या किसी भी प्रकार का विज्ञापन न तो चिपकाया जा सकता है और न ही डिस्प्ले किया जा सकता है।
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6- शहर के किसी भी व्यक्ति से पहले दानदाता या उनके परिवार के किसी उत्तराधिकारी का टावर परिसर के इस्तेमाल पर पहला अधिकार होगा।

चीगान टावर बनाने के लिए 1936 में दिए थे तीन हजार रुपये
गोरखपुर। रामखेलावन साहू और ठाकुर प्रसाद साहू ने अपने पिता की स्मृति में चीगान टावर बनाने के लिए म्युनिसिपल बोर्ड के अध्यक्ष विंध्यवासिनी प्रसाद को सन् 1936 में तीन हजार रुपये नकद दिए थे। साथ ही बोर्ड के अध्यक्ष को पत्र देकर कहा था कि न सिर्फ इस टावर का नाम चीगान टावर रखा जाए बल्कि इसे टावर पर अंकित भी किया जाए।
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