स्वतंत्रता सेनानी बाबू बैजनाथ सिंह का निधन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बाबू बैजनाथ सिंह के निधन पर नागरिकों व विभिन्न संगठनों ने शोकसभा कर शोक जताया व देश की आजादी के संघर्ष में उनके योगदान को याद किया। नेहरू अध्ययन केंद्र पर हुई शोकसभा में भौवापार महोत्सव समिति के अध्यक्ष आलोक शुक्ल ने कहा कि देश की आजादी के लिए उनके द्वारा दिया गया योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। वे भौवापार के रत्न थे, यह गांव सदैव उनके नाम से जाना जाएगा।
क्षेत्रीय संघर्ष समिति के अध्यक्ष इंद्र प्रताप सिंह व संजय शुक्ला ने कहा की वे देश के सच्चे सिपाही और धरोहर थे, उनकी कमी हमेशा खलेगी। लोकतंत्र सेनानी व वरिष्ठ हिंदू नेता लालजी सिंह ने उन्हें इस देश का गौरव बताते हुए उनके स्मृतियों को संजोने की बात कही। शोक सभा में ग्राम प्रधान प्रतिनिधि धनंजय सिंह, शिक्षक पारसनाथ चौबे, ओमप्रकाश त्रिपाठी, राजनराम त्रिपाठी, बम बहादुर सिंह, रमाशंकर चौरसिया, रजनीश त्रिपाठी, उमेश चौरसिया, प्रमोद सिंह, कन्हैया गुप्ता, रामवृक्ष गुप्ता, देवीलाल गुप्ता, सुरेंद्र नाथ चौबे आदि शामिल रहे।
इसी क्रम में भानुप्रताप सिंह, जिला पंचायत सदस्य रजनीश यादव, सेवईं के पूर्व प्रधान गिरिजेश सिंह, ककराखोर के प्रधान राही सिंह, पूर्व ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख राजकुमार शाही, महाबीर छपरा इंटर कॉलेज के प्रबंधक शिवप्रकाश शाही, सपा नेता राजन शाही आदि ने भी शोक व्यक्त किया है।
पुरस्कार में मिली थी दरोगा की नौकरी
बाबू बैजनाथ सिंह का जन्म भौवापार गांव में 1 सितंबर 1919 को हुआ था। देश की आजादी के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही था। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने पर आजाद भारत की सरकार ने पुरस्कार स्वरूप इन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा की नौकरी दी थी। भौवापार गांव सुराजियों का गढ़ था। कांग्रेस कार्यकर्ता गांव में नित्य प्रभातफेरी निकालते, सुराजगीत गाते और आजादी के नारे लगाते। यह सब देख बालक बैजनाथ के भीतर भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भावना बलवती होने लगी।
गांव में मिडिल पास कर आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1936 में उनका दाखिला शहर के महात्मा गांधी इंटर कॉलेज में हुआ। वे नजदीक के जाफरा बाजार में किराए का कमरा लेकर रहने लगे। जाफरा बाजार में क्रांतिकारियों का अक्सर आना जाना लगा रहता था। इसी दौरान ये प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचिंद्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी के संपर्क में आए। जिनकी प्रेरणा से उन्होंने वर्ष 1938 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ज्वाइन कर ली। बैजनाथ सिंह ने वर्ष 1941 में गाजीपुर में ट्रेन डकैती कर सरकारी खजाना लूट लिया। इस कांड में इन्हें और श्याम कृष्ण दुबे को मुख्य अभियुक्त बनाया गया।
24 मार्च 1942 को बैजनाथ सिंह ने अपने साथियों भगवान शुक्ला, बालरूप शर्मा और हरिप्रसाद तिवारी आदि के साथ मिलकर सहजनवां में ट्रेन से ले जाए जा रहे सरकारी खजाना को भी लूट लिया था। इस कांड के बाद तो अंग्रेज पुलिस पागल जैसी हो गई। पुलिस से बचते हुए बैजनाथ सिंह अंग्रेजों की नाक में दम करते रहे। इस बीच वह बाराबंकी-लखनऊ के बीच ट्रेन जलाने, प्लाजा और देहरादून बमकांड समेत कई घटनाओं में शामिल हुए।
वर्ष 1943 की पहली जनवरी को अंग्रेजी पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया और मुकदमा चलाकर आजन्म कारावास की सजा दी। इनके फरार साथियों की जानकारी के लिए जेल में इन्हें कठोर यातना दी गई पर इन्होंने जुबान नहीं खोली। देश को आजादी मिलने पर इनकी रिहाई हुई और आजाद भारत की सरकार ने पुरस्कार स्वरूप इन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा की नौकरी दी, जिससे अवकाशप्राप्त करने के बाद वे शहर के बिलंदपुर मोहल्ले में घर बनवाकर परिवार के साथ रहते थे।