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कवि व गीतकार डॉ. कुंवर बेचैन बोले, मंच पर हमेशा रहेगा गीतों का बोलबाला

Mon, 01 Feb 2016 02:17 AM IST
गोरखपुर। अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 01 Feb 2016 02:17 AM IST
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Dr. kunwar Bechain interview in gorakhpur mahotsav
कवि और गीतकार डॉ. कुंवर बेचैन का मानना है कि अतुकांत और नई कविताओं की उम्र लंबी नहीं है। उनका दावा है कि कवि सम्मेलन या मुशायरों के मंच पर गीतों का बोलबाला रहा है और आगे भी रहेगा। गेय शैली के पक्के समर्थक कवि बेचैन का कहना है कि जहां जीवन है, वहां लय की जगह खुद-ब-खुद बन ही जाती है। यही वजह है कि अतुकांत कविताएं बहुत कम समय में अपनी अंतिम गति को पहुंच गई हैं।
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बेचैन का मानना है कि कवि गीतों के जरिये अपने संदेश को श्रोताओं और पाठकों तक ज्यादा सहजता से पहुंचा सकता है। तुलसी के मानस से लेकर नए दौर के कवियों की तुकांत कविताओं की लोकप्रियता को लेकर कोई सवाल नहीं उठा सकता। लोक साहित्य की चर्चा पर कवि बेचैन बोले, लोक साहित्य की अपनी संस्कृति है जो लोगों को सीधे सृजनात्मकता से जोड़ती है। गांव, गली, मोहल्लों से जोड़ने वाले लोक साहित्य का अपना अलग साहित्य बोध है। उनके जुड़े लोगों की क्लास भी अलग है।
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संस्कार गीत की लोक उपयोगिता और लोकप्रियता पर शायद ही किसी को संदेह हो। ये गीत संस्कारों को पीढ़ियों तक जिंदा रखने का काम करते हैं। पुरस्कारों की वापसी की राजनीति के सवाल पर डॉ. बेचैन कहते हैं कि मेरी समझ में यह बहस का मुद्दा ही नहीं है। युवा पीढ़ी में साहित्य की जागरूकता के सवाल पर बेचैन की बेचैनी साफ झलकी। उन्होंने कहा कि इसके लिए स्कूलों से अभियान चलाने की जरूरत है। कविता और गीतों के लिए स्कूलों में कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू होना चाहिए। प्रतिभाओं की कमी नहीं है, जरूरत उन्हें बेहतर मंच देने की है। बेहतर सृजनशीलता के लिए माहौल तैयार करना होगा। इसके लिए स्कूल बेहतर माध्यम साबित होंगे।
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