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डॉ. आरती के भाई ने पुलिस की आत्महत्या की थ्योरी पर खड़े किए सवाल
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Sun, 03 Dec 2017 01:40 AM IST
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घटना के बाद पुलिस ने हॉस्टल पहुंचकर जांच की।
- फोटो : Amar Ujala
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डॉ. आरती के भाई आईओसी के इंजीनियर प्रशांत कुमार झा ने आत्महत्या की थ्योरी पर कई सवाल खड़े किए। इसके साथ ही उन्होंने तहरीर देकर इंसाफ मिलने तक लड़ने की बात कही।
प्रशांत ने बताया कि घटना की सूचना पर गोरखपुर रेलवे में कार्यरत फुफेरे भाई विवेकानंद को सुबह ही हॉस्टल भेजा। जिस कमरे में घटना हुई, वहां अंधेरा था। भाई के सामने ही एक मिस्त्री आया और वहां बिजली दुरुस्त की। जब वह कमरा ही क्राइम सीन था तो इससे छेड़छाड़ क्यों की गई? पुलिस बहन की एक डायरी के हवाले से घटना को आत्महत्या बताते हुए उसकी सहेली के पास से इसके मिलने की बात कह रही है। आखिर कोई अपनी पर्सनल डायरी किसी और के पास क्यों रखेगा? उसने सुसाइड किया तो उसकी गर्दन, पीठ, सिर और हाथ पर चोट के निशान कैसे आए? गाइनोकॉलोजी विभाग में एक डॉक्टर ने पहले 12:30 बजे बहन से मोबाइल फोन पर बात होने की जानकारी दी, फिर वही उसकी मौत 12 बजे होने की बात कहने लगा। अपने विभाग की सीनियर रेजिडेंट के शव को लेकर जाने के लिए रिश्तेदार पर दबाव बनाना भी विभाग के लोगों की भूमिका पर संदेह खड़ा कर रहा है।
बहन इसी संस्थान में पढ़ने के साथ सेवाएं दे रही थी, फिर भी किसी भी डॉक्टर या अफसर की ओर से सहयोग क्या सहानुभूति तक नहीं मिली। बीआरडी की ओर से कोई भी अफसर या डॉक्टर पोस्टमार्टम हाउस भी नहीं आए। हद तो यह कि कॉलेज में उसके साथ पढ़ने वाले सहपाठी भी यहां नहीं दिखे। भला ऐसा कहीं होता है? यहां लोग उसके बीमार होने की बात कह रहे हैं, जबकि शुक्रवार रात करीब 10 बजे हुई बातचीत में वह बिल्कुल स्वस्थ लगी। मां के बाद उसने मुझसे भी बात की थी। इसमें न तो वह परेशान लग रही थी और न ही बीमार।
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प्रशांत ने बताया कि घटना की सूचना पर गोरखपुर रेलवे में कार्यरत फुफेरे भाई विवेकानंद को सुबह ही हॉस्टल भेजा। जिस कमरे में घटना हुई, वहां अंधेरा था। भाई के सामने ही एक मिस्त्री आया और वहां बिजली दुरुस्त की। जब वह कमरा ही क्राइम सीन था तो इससे छेड़छाड़ क्यों की गई? पुलिस बहन की एक डायरी के हवाले से घटना को आत्महत्या बताते हुए उसकी सहेली के पास से इसके मिलने की बात कह रही है। आखिर कोई अपनी पर्सनल डायरी किसी और के पास क्यों रखेगा? उसने सुसाइड किया तो उसकी गर्दन, पीठ, सिर और हाथ पर चोट के निशान कैसे आए? गाइनोकॉलोजी विभाग में एक डॉक्टर ने पहले 12:30 बजे बहन से मोबाइल फोन पर बात होने की जानकारी दी, फिर वही उसकी मौत 12 बजे होने की बात कहने लगा। अपने विभाग की सीनियर रेजिडेंट के शव को लेकर जाने के लिए रिश्तेदार पर दबाव बनाना भी विभाग के लोगों की भूमिका पर संदेह खड़ा कर रहा है।
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बहन इसी संस्थान में पढ़ने के साथ सेवाएं दे रही थी, फिर भी किसी भी डॉक्टर या अफसर की ओर से सहयोग क्या सहानुभूति तक नहीं मिली। बीआरडी की ओर से कोई भी अफसर या डॉक्टर पोस्टमार्टम हाउस भी नहीं आए। हद तो यह कि कॉलेज में उसके साथ पढ़ने वाले सहपाठी भी यहां नहीं दिखे। भला ऐसा कहीं होता है? यहां लोग उसके बीमार होने की बात कह रहे हैं, जबकि शुक्रवार रात करीब 10 बजे हुई बातचीत में वह बिल्कुल स्वस्थ लगी। मां के बाद उसने मुझसे भी बात की थी। इसमें न तो वह परेशान लग रही थी और न ही बीमार।
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