{"_id":"59e26b184f1c1bd9798b68dc","slug":"71508010776-gorakhpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कच्ची उम्र की मोहब्बत पुलिस के लिए मुसीबत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कच्ची उम्र की मोहब्बत पुलिस के लिए मुसीबत
शिवम सिंह, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Sun, 15 Oct 2017 01:28 AM IST
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कच्ची उम्र का प्रेम घर वालों के लिए जिल्लत तो पुलिस के लिए नई मुसीबत साबित हो रहा है। एक हफ्ते में पुलिस तक नौ मामले ऐसे पहुंचे हैं, जिनमें किशोरवय लड़के-लड़की का लगाव दो घरों में अलगाव की बड़ी वजह बन गया। इनमें से तीन मामलों में लड़की को फुसला कर ले भागने की एफआईआर भी दर्ज थी। पुलिस की पूछताछ में बेटी की रजामंदी का कड़वा सच सामने आया तो खुद को बेबस मान कर कुछ अभिभावक तो यहां तक कह बैठे, इसे तो कुछ दिन हवालात में ही रखो दरोगा जी।
पुलिस के मुताबिक कहीं अशिक्षा तो कहीं खुद को आधुनिक साबित करने की होड़ ऐसी घटनाओं को बढ़ा रही है। मनोवैज्ञानिक इसे पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण का प्रभाव बताते हैं। दोनों का ही मानना है कि फिल्म, टीवी के बाद सोशल मीडिया के विविध आयाम की पहुंच हर घर तक है। जीवकोपार्जन की उलझन में घर के बड़े बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाते, जबकि इससे पैदा हुए खालीपन में वो माध्यम अपनी जगह बना लेते हैं, जिनमें मोहब्बत और आधुनिकता का फलसफा कुछ अलग तरह से परिभाषित किया जाता है।
जेल भी पहुंचा रही नादानी
चौराहे या किसी अन्य जगह पर पकड़े जाने के बाद अक्सर ही लड़की पक्ष की ओर से तहरीर में छेड़खानी या बरगला कर ले जाने जैसे आरोप लगाए जाते हैं। ऐसे मामलों में युवक हो या किशोर उन्हें जेल भी जाना पड़ता है। फुसला कर ले भागने के ज्यादातर मामलों की जांच में दोनों की रजामंदी सामने आती है। लड़की नाबालिग होने पर पुलिस घर या महिला आश्रय केंद्र भेजती है, जबकि बालिग की शादी को हरी झंडी दे देती है। कुछ समय पहले ऐसे एक मामले में सरहरी चौकी में ही शादी कराई गई थी।
विज्ञापन
केस 1::
सहजनवां थाने से चंद कदम की दूरी पर मंगलवार रात एक लड़का और लड़की के संदिग्ध स्थिति में मौजूद होने की सूचना पर पुलिस सक्रिय हुई। दोनों को थाने ले लाई। लड़की किशोरवय थी, लिहाजा उसे महिला थाने भेजा। तलाश में भटकते घर वाले थाने पहुंचे तो बेटी के इरादे जानकर झटका लगा। टूटकर बेटी को कुछ दिन थाने में ही रखने की सिफारिश करने लगे। पुलिस ने दोनों को समझा कर किशोरी की घर वापसी का रास्ता तैयार कराया।
केस 2::
सिकरीगंज थाने में पंद्रह दिन पहले पुलिस ने छेड़खानी का एक केस दर्ज किया। जांच में पता चला कि जिसके खिलाफ केस दर्ज कराया गया, उसका लड़की से प्रेम संबंध था। यह सच जानने के बाद लड़की के घर वालों ने न सिर्फ दोनों को पकड़ लिया बल्कि लड़के की जमकर पिटाई करने के बाद तहरीर देकर छेड़छाड़ का केस भी दर्ज करा दिया।
केस 3::
खजनी इलाके के एक गांव से एक हफ्ते पहले लड़की लापता हो गई। घरवालों ने आशंका जताई तो पुलिस ने गांव के ही किशोर को पकड़ लिया। लड़की भी साथ मिली। दोनों को अलग-अलग थाने में रखकर समझाया गया और फिर घरवालों के सुपुर्द कर दिया। महिला थाने में किशोरी की काउंसलिंग हुई तो उसने सोचे-समझने बिना मोहब्बत के भ्रम में घर से निकल भागने की बात स्वीकार की।
परिवार ही बच्चों की पहली पाठशाला होती है। अब लालन-पालन में पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है। कई अभिभावक ओपेन सोसायटी की बात बेहिचक करते हैं। कम उम्र की संतानें इनके सही मायने समझे बिना ऐसी सोसायटी का हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं। फिल्में, टीवी सीरियल भी प्यार को अलग तरह से परिभाषित करते हैं। युगल के साथ को आज की जरूरत की तरह पेश करते हैं। बेटा हो या बेटी, इन सारी चीजों का प्रभाव उनके रहन-सहन, सोचने के ढंग पर असर डालता है। भटकाव की नौबत तक भी ले जाता है।
- प्रो. सुषमा पांडेय, मनोवैज्ञानिक
अशिक्षा और अनुशासन की कमी की वजह से ऐसे मामले ज्यादा सामने आते हैं। किशोरावस्था में बच्चों को सही-गलत की ज्यादा समझ नहीं होती है। ऐसे में पूरी जिम्मेदारी अभिभावकों की होती है कि वे उन पर नजर रखें। उनकी हर गतिविधि का मूल्यांकन करें। बच्चों के व्यवहार में बदलाव आने पर अभिभावक को काउंसलिंग करनी चाहिए। मित्रवत व्यवहार रखते हुए उन्हें सही और गलत की पहचान करानी चाहिए। सुविधाएं देने में खराबी नहीं है लेकिन ध्यान रखें कि उनका दुरुपयोग न हो।
- प्रो. मानवेंद्र सिंह, समाजशास्त्री
मौजूदा वक्त में प्रतिदिन एक या एक से ज्यादा मामला इस तरह का आ रहा है। ऐसे मामलों में पहले लड़कियों की काउंसलिंग करते हैं। उनसे मिली जानकारी के आधार पर जरूरत के मुताबिक लड़कियों को समझाते हैं, अभिभावकों को सच बताते हैं। बेटी की सुरक्षा का भरोसा लेकर उन्हें अभिभावक के सुपुर्द कर देते हैं। ज्यादा बिगड़ी स्थिति में अदालत की मदद ली जाती है।
- डॉ. शालिनी सिंह, थानाध्यक्ष, महिला थाना
विज्ञापन
पुलिस के मुताबिक कहीं अशिक्षा तो कहीं खुद को आधुनिक साबित करने की होड़ ऐसी घटनाओं को बढ़ा रही है। मनोवैज्ञानिक इसे पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण का प्रभाव बताते हैं। दोनों का ही मानना है कि फिल्म, टीवी के बाद सोशल मीडिया के विविध आयाम की पहुंच हर घर तक है। जीवकोपार्जन की उलझन में घर के बड़े बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाते, जबकि इससे पैदा हुए खालीपन में वो माध्यम अपनी जगह बना लेते हैं, जिनमें मोहब्बत और आधुनिकता का फलसफा कुछ अलग तरह से परिभाषित किया जाता है।
विज्ञापन
जेल भी पहुंचा रही नादानी
चौराहे या किसी अन्य जगह पर पकड़े जाने के बाद अक्सर ही लड़की पक्ष की ओर से तहरीर में छेड़खानी या बरगला कर ले जाने जैसे आरोप लगाए जाते हैं। ऐसे मामलों में युवक हो या किशोर उन्हें जेल भी जाना पड़ता है। फुसला कर ले भागने के ज्यादातर मामलों की जांच में दोनों की रजामंदी सामने आती है। लड़की नाबालिग होने पर पुलिस घर या महिला आश्रय केंद्र भेजती है, जबकि बालिग की शादी को हरी झंडी दे देती है। कुछ समय पहले ऐसे एक मामले में सरहरी चौकी में ही शादी कराई गई थी।
विज्ञापन
केस 1::
सहजनवां थाने से चंद कदम की दूरी पर मंगलवार रात एक लड़का और लड़की के संदिग्ध स्थिति में मौजूद होने की सूचना पर पुलिस सक्रिय हुई। दोनों को थाने ले लाई। लड़की किशोरवय थी, लिहाजा उसे महिला थाने भेजा। तलाश में भटकते घर वाले थाने पहुंचे तो बेटी के इरादे जानकर झटका लगा। टूटकर बेटी को कुछ दिन थाने में ही रखने की सिफारिश करने लगे। पुलिस ने दोनों को समझा कर किशोरी की घर वापसी का रास्ता तैयार कराया।
केस 2::
सिकरीगंज थाने में पंद्रह दिन पहले पुलिस ने छेड़खानी का एक केस दर्ज किया। जांच में पता चला कि जिसके खिलाफ केस दर्ज कराया गया, उसका लड़की से प्रेम संबंध था। यह सच जानने के बाद लड़की के घर वालों ने न सिर्फ दोनों को पकड़ लिया बल्कि लड़के की जमकर पिटाई करने के बाद तहरीर देकर छेड़छाड़ का केस भी दर्ज करा दिया।
केस 3::
खजनी इलाके के एक गांव से एक हफ्ते पहले लड़की लापता हो गई। घरवालों ने आशंका जताई तो पुलिस ने गांव के ही किशोर को पकड़ लिया। लड़की भी साथ मिली। दोनों को अलग-अलग थाने में रखकर समझाया गया और फिर घरवालों के सुपुर्द कर दिया। महिला थाने में किशोरी की काउंसलिंग हुई तो उसने सोचे-समझने बिना मोहब्बत के भ्रम में घर से निकल भागने की बात स्वीकार की।
परिवार ही बच्चों की पहली पाठशाला होती है। अब लालन-पालन में पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है। कई अभिभावक ओपेन सोसायटी की बात बेहिचक करते हैं। कम उम्र की संतानें इनके सही मायने समझे बिना ऐसी सोसायटी का हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं। फिल्में, टीवी सीरियल भी प्यार को अलग तरह से परिभाषित करते हैं। युगल के साथ को आज की जरूरत की तरह पेश करते हैं। बेटा हो या बेटी, इन सारी चीजों का प्रभाव उनके रहन-सहन, सोचने के ढंग पर असर डालता है। भटकाव की नौबत तक भी ले जाता है।
- प्रो. सुषमा पांडेय, मनोवैज्ञानिक
अशिक्षा और अनुशासन की कमी की वजह से ऐसे मामले ज्यादा सामने आते हैं। किशोरावस्था में बच्चों को सही-गलत की ज्यादा समझ नहीं होती है। ऐसे में पूरी जिम्मेदारी अभिभावकों की होती है कि वे उन पर नजर रखें। उनकी हर गतिविधि का मूल्यांकन करें। बच्चों के व्यवहार में बदलाव आने पर अभिभावक को काउंसलिंग करनी चाहिए। मित्रवत व्यवहार रखते हुए उन्हें सही और गलत की पहचान करानी चाहिए। सुविधाएं देने में खराबी नहीं है लेकिन ध्यान रखें कि उनका दुरुपयोग न हो।
- प्रो. मानवेंद्र सिंह, समाजशास्त्री
मौजूदा वक्त में प्रतिदिन एक या एक से ज्यादा मामला इस तरह का आ रहा है। ऐसे मामलों में पहले लड़कियों की काउंसलिंग करते हैं। उनसे मिली जानकारी के आधार पर जरूरत के मुताबिक लड़कियों को समझाते हैं, अभिभावकों को सच बताते हैं। बेटी की सुरक्षा का भरोसा लेकर उन्हें अभिभावक के सुपुर्द कर देते हैं। ज्यादा बिगड़ी स्थिति में अदालत की मदद ली जाती है।
- डॉ. शालिनी सिंह, थानाध्यक्ष, महिला थाना