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लंगर और कव्वाली से हुआ उर्स का समापन
Updated Sun, 23 Jul 2017 08:22 PM IST
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गोरखपुर।
नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद पर सालाना उर्स-ए-पाक के अंतिम दिन रविवार को आखिरी कुलशरीफ की रस्म परंपरागत तरीके से अदा की गई। इसमें देश में अमन और एकता की दुआ की गई। लंगर और फिर कव्वाली के साथ उर्स मुकम्मल हुआ।
तीसरे दिन कार्यक्रम की शुरुआत कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुई। इसके बाद नात शरीफ पढ़ी गई। फिर दरगाह सदर इकरार अहमद की देखरेख में कुलशरीफ की रस्म की अदा हुई। सामूहिक रूप से सलातो-सलाम पढ़ दुआएं की गईं। अंतिम दिन हजरत की दरगाह पर अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ी थी। जोहर की नमाज के बाद सभी में लंगर वितरित किया गया। दूरदराज से आए अकीदतमंदों ने अपनी और मुल्क की सलामती की दुआएं मांगीं। सुबह से ही चादर चढ़ाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहा। दरगाह पर साझा संस्कृति परवान चढ़ रही थी। हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों से बड़ी संख्या में महिला, पुरुष व बच्चे पहुंचे। दिन भर हजरत की दरगाह पर अकीदतमंद आते रहे। रात की नमाज के बाद में बदायूं के जुनैद सुल्तानी व मुजफ्फरनगर के रेयाज अहमद वारसी के बीच कव्वाली का मुकाबला हुआ। इसका लोगों ने लुत्फ उठाया।
इस दौरान दरगाह के अध्यक्ष इकरार अहमद, सैयद शहाब, मंजूर आलम, शमसीर अहमद, अहमद हसन, रमजान, एजाज अहमद, कुतुबुद्दीन, नूर मोहम्मद दानिश, मो. मतीउद्दीन, हाजी फरजंद, मोईनुद्दीन, उमर कादरी, मोहम्मद अली, फहीम, समद, मोहम्मद आजम, नवेद आलम, सेराज अहमद, रमजान अली, मुनव्वर अहमद, अतहर आदि मौजूद रहे।
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जलसे का आयोजन हुआ
उर्स-ए-पाक के अंतिम दिन दरगाह पर जलसा भी हुआ। इसमें दरगाह की मस्जिद के इमाम मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने कहा कि वलियों की बारगाह से इत्तेहाद और भाईचारगी का सबक मिलता है। भटकी हुई इंसानियत के लिए राहत व सुकून दरगाहों से मिला। दरगाह सदर इकरार अहमद ने कहा कि इस्लाम हमेशा से भाईचारा, समानता और अमन की बात करता आया है और इन्हीं पर यकीन करता है। इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाने में हमारे बुजुर्गों और सूफियों ने बहुत मेहनत की है। वली दिलों को जोड़ते हैं। ऐसे ही वली हैं हजरत मुबारक खां शहीद, जिनके दर पर पहुंचने वाला फकीर भी फैज पाता है और अमीर भी। दरगाह मदरसा के अध्यापक कारी शराफत हुसैन कादरी ने कहा कि हजरत मुबारक खां ने गोरखपुर में इस्लाम की पक्की बुनियाद डाली। मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी ने भी जलसे को संबोधित किया।
नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद पर सालाना उर्स-ए-पाक के अंतिम दिन रविवार को आखिरी कुलशरीफ की रस्म परंपरागत तरीके से अदा की गई। इसमें देश में अमन और एकता की दुआ की गई। लंगर और फिर कव्वाली के साथ उर्स मुकम्मल हुआ।
तीसरे दिन कार्यक्रम की शुरुआत कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुई। इसके बाद नात शरीफ पढ़ी गई। फिर दरगाह सदर इकरार अहमद की देखरेख में कुलशरीफ की रस्म की अदा हुई। सामूहिक रूप से सलातो-सलाम पढ़ दुआएं की गईं। अंतिम दिन हजरत की दरगाह पर अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ी थी। जोहर की नमाज के बाद सभी में लंगर वितरित किया गया। दूरदराज से आए अकीदतमंदों ने अपनी और मुल्क की सलामती की दुआएं मांगीं। सुबह से ही चादर चढ़ाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहा। दरगाह पर साझा संस्कृति परवान चढ़ रही थी। हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों से बड़ी संख्या में महिला, पुरुष व बच्चे पहुंचे। दिन भर हजरत की दरगाह पर अकीदतमंद आते रहे। रात की नमाज के बाद में बदायूं के जुनैद सुल्तानी व मुजफ्फरनगर के रेयाज अहमद वारसी के बीच कव्वाली का मुकाबला हुआ। इसका लोगों ने लुत्फ उठाया।
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इस दौरान दरगाह के अध्यक्ष इकरार अहमद, सैयद शहाब, मंजूर आलम, शमसीर अहमद, अहमद हसन, रमजान, एजाज अहमद, कुतुबुद्दीन, नूर मोहम्मद दानिश, मो. मतीउद्दीन, हाजी फरजंद, मोईनुद्दीन, उमर कादरी, मोहम्मद अली, फहीम, समद, मोहम्मद आजम, नवेद आलम, सेराज अहमद, रमजान अली, मुनव्वर अहमद, अतहर आदि मौजूद रहे।
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जलसे का आयोजन हुआ
उर्स-ए-पाक के अंतिम दिन दरगाह पर जलसा भी हुआ। इसमें दरगाह की मस्जिद के इमाम मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने कहा कि वलियों की बारगाह से इत्तेहाद और भाईचारगी का सबक मिलता है। भटकी हुई इंसानियत के लिए राहत व सुकून दरगाहों से मिला। दरगाह सदर इकरार अहमद ने कहा कि इस्लाम हमेशा से भाईचारा, समानता और अमन की बात करता आया है और इन्हीं पर यकीन करता है। इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाने में हमारे बुजुर्गों और सूफियों ने बहुत मेहनत की है। वली दिलों को जोड़ते हैं। ऐसे ही वली हैं हजरत मुबारक खां शहीद, जिनके दर पर पहुंचने वाला फकीर भी फैज पाता है और अमीर भी। दरगाह मदरसा के अध्यापक कारी शराफत हुसैन कादरी ने कहा कि हजरत मुबारक खां ने गोरखपुर में इस्लाम की पक्की बुनियाद डाली। मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी ने भी जलसे को संबोधित किया।