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चार दिन से मैले कपड़े, रोटी नहीं, मकान डुबे
Updated Mon, 21 Aug 2017 02:12 AM IST
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अमनदीप सिंह
गोरखपुर। बाढ़ से प्रभावित सैकड़ों लोगों को न तो खाने के लिए रोटी मिल रही है न पीने को पानी। चार-पांच दिनों से एक ही कपड़ा पहने-पहने अब वो भी बदबू करने लगा है। लोगों के पास जो कपड़े हैं वो मैले हो चुके हैं और कई लोगों के कपड़े बाढ़ अपने साथ बहा ले गई। नहाने-धोने तक की जगह नहीं बची है।
मानीराम रेलवे स्टेशन पर चार दिनों से ठहरीं रहमत नगर निवासी सुमन से जब इस बारे में बात की गई तो तपाक से वह बोल उठीं, खाने को रोटी नहीं, पीने को पानी नहीं, पहनने को कपड़े तक नहीं हैं हमारे पास। चूल्हा है लेकिन जलानेे के लिए ईंधन नहीं। ऐसे में बच्चियों लेकर हम कहां जाएं। पुराने कपड़े पानी में बह गए। अब नए कपड़े कहां से लाएं। प्रशासन ने न खाना दिया, न पीने को पानी। भला हो सामाजिक संगठनों का जो खाने-पीने को कुछ-कुछ सामान देने चले आ रहे हैं। वरना खाने के भी लाले पड़ जाएं।
रहमत नगर निवासी कौशल्या कैमरा देख भागी आईं और बोलीं, सारा सामान पानी में बह गया। तन पर जो कपड़े हैं, वहीं बचे हैं। बाढ़ ने रोटी, कपड़ा और मकान छीन लिया। प्रशासन कम से कम महिलाओं के लिए कपड़ों की व्यवस्था ही कर देता। हमारे पास तन ढकने तक को कपड़े नहीं बचे हैं। एक ही कपड़ा पहने-पहने बदबू करने लगा है। बिना नहाए-धोए हम किसी तरह दिन गुजार रहे हैं। बाबापुरा निवासी डब्लू अपनी पत्नी और पांच बच्चों के साथ महुआ चौक में एक दुकान के बाहर ठहरे हैं। उन्होंने बताया कि परिवार में पत्नी, बच्चियों और भाभी हैं। सभी गांव में फंसे हैं। अंधेरे में मोमबत्तियां जलाकर रात गुजारना काफी मुश्किल है।
गोरखपुर। बाढ़ से प्रभावित सैकड़ों लोगों को न तो खाने के लिए रोटी मिल रही है न पीने को पानी। चार-पांच दिनों से एक ही कपड़ा पहने-पहने अब वो भी बदबू करने लगा है। लोगों के पास जो कपड़े हैं वो मैले हो चुके हैं और कई लोगों के कपड़े बाढ़ अपने साथ बहा ले गई। नहाने-धोने तक की जगह नहीं बची है।
मानीराम रेलवे स्टेशन पर चार दिनों से ठहरीं रहमत नगर निवासी सुमन से जब इस बारे में बात की गई तो तपाक से वह बोल उठीं, खाने को रोटी नहीं, पीने को पानी नहीं, पहनने को कपड़े तक नहीं हैं हमारे पास। चूल्हा है लेकिन जलानेे के लिए ईंधन नहीं। ऐसे में बच्चियों लेकर हम कहां जाएं। पुराने कपड़े पानी में बह गए। अब नए कपड़े कहां से लाएं। प्रशासन ने न खाना दिया, न पीने को पानी। भला हो सामाजिक संगठनों का जो खाने-पीने को कुछ-कुछ सामान देने चले आ रहे हैं। वरना खाने के भी लाले पड़ जाएं।
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रहमत नगर निवासी कौशल्या कैमरा देख भागी आईं और बोलीं, सारा सामान पानी में बह गया। तन पर जो कपड़े हैं, वहीं बचे हैं। बाढ़ ने रोटी, कपड़ा और मकान छीन लिया। प्रशासन कम से कम महिलाओं के लिए कपड़ों की व्यवस्था ही कर देता। हमारे पास तन ढकने तक को कपड़े नहीं बचे हैं। एक ही कपड़ा पहने-पहने बदबू करने लगा है। बिना नहाए-धोए हम किसी तरह दिन गुजार रहे हैं। बाबापुरा निवासी डब्लू अपनी पत्नी और पांच बच्चों के साथ महुआ चौक में एक दुकान के बाहर ठहरे हैं। उन्होंने बताया कि परिवार में पत्नी, बच्चियों और भाभी हैं। सभी गांव में फंसे हैं। अंधेरे में मोमबत्तियां जलाकर रात गुजारना काफी मुश्किल है।
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