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दूरदर्शन के मंच पर उभरी पूर्वांचल की सांस्कृतिक थाती
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Sat, 11 Nov 2017 12:47 AM IST
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दूरदर्शन के स्थापना दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।
- फोटो : Amar Ujala
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दूरदर्शन केंद्र के स्थापना दिवस समारोह के अंतिम दिन पूर्वांचल की सांस्कृतिक थाती की झलक दिखी। स्थानीय कलाकारों ने सांस्कृतिक संध्या में पूर्वांचल की संस्कृतियों पर आधारित गीत-संगीत पेश कर समां बांध दिया। इस बीच दर्शकों ने तालियों से कलाकारों का खूब उत्साहवर्धन किया।
गोरखपुर दूरदर्शन केंद्र की स्थापना 14 नवंबर 1984 को हुई थी। लंबे समय तक कार्यालय असुरन स्थित किराए के भवन में चला। अब यह केंद्र राप्तीनगर स्थित अपने वर्तमान भवन में स्थापित हो चुका है। स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में इस साल नौ नवंबर से दो दिवसीय समारोह शुरू हुआ। शुक्रवार को दूसरे दिन सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ केंद्राध्यक्ष राहुल सिंह और कार्यक्रम प्रमुख योगेंद्र सिंह ने दीप जलाकर किया। कुमार वार्षिकेय ने गीत व गजलों की शानदार प्रस्तुतियां दीं। राकेश उपाध्याय और उनकी टीम ने भोजपुरी गीतों की छटा बिखेरी। लोकगीत ‘गोरखपुर गोरक्ष भूमि है, काशी शिव की नगरी...’ और ‘घूंघट से झांके अजोरिया हो...’ पर लोगों ने जमकर तालियां लुटाईं।
शिप्रा दयाल ने भोजपुरी गीत ‘ननद फुलगेनवा...’ और ‘बड़की जाले रे गवनवा...’ की प्रस्तुति से गांव की माटी की खुशबू बिखेरी। लोकगीतों से गंवई परंपरा और संस्कृति समझाने की उनकी कोशिश को लोगों ने खूब सराहा। कार्यक्रम में दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के अधिकारी, कर्मचारियों के साथ बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद रहे।
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गोरखपुर दूरदर्शन केंद्र की स्थापना 14 नवंबर 1984 को हुई थी। लंबे समय तक कार्यालय असुरन स्थित किराए के भवन में चला। अब यह केंद्र राप्तीनगर स्थित अपने वर्तमान भवन में स्थापित हो चुका है। स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में इस साल नौ नवंबर से दो दिवसीय समारोह शुरू हुआ। शुक्रवार को दूसरे दिन सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ केंद्राध्यक्ष राहुल सिंह और कार्यक्रम प्रमुख योगेंद्र सिंह ने दीप जलाकर किया। कुमार वार्षिकेय ने गीत व गजलों की शानदार प्रस्तुतियां दीं। राकेश उपाध्याय और उनकी टीम ने भोजपुरी गीतों की छटा बिखेरी। लोकगीत ‘गोरखपुर गोरक्ष भूमि है, काशी शिव की नगरी...’ और ‘घूंघट से झांके अजोरिया हो...’ पर लोगों ने जमकर तालियां लुटाईं।
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शिप्रा दयाल ने भोजपुरी गीत ‘ननद फुलगेनवा...’ और ‘बड़की जाले रे गवनवा...’ की प्रस्तुति से गांव की माटी की खुशबू बिखेरी। लोकगीतों से गंवई परंपरा और संस्कृति समझाने की उनकी कोशिश को लोगों ने खूब सराहा। कार्यक्रम में दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के अधिकारी, कर्मचारियों के साथ बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद रहे।
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