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नेपाल त्रासदी: जिंदगी में ऐसी तबाही कभी नहीं देखी...आंखों के सामने बह गई जमा पूंजी और गहने-सामान

Tue, 01 Sep 2026 02:48 PM IST
Rohit Singh अमर उजाला ब्यूरो, नेपाल का सिमचौर
अमर उजाला ब्यूरो, नेपाल का सिमचौर Published by: Rohit Singh Updated Tue, 01 Sep 2026 02:48 PM IST
सार

 जिस घर को बनाने में पूरी जिंदगी खपा दी, जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और जहां परिवार ने न जाने कितने सपने संजोए थे, आज वही घर उनके लिए सिर्फ एक याद बनकर रह गया है। विदुर के सिमचौर बाजार के लोगों के लिए नेपाल सरकार ने भोजन की व्यवस्था तो करा दी है पर रहने को ठौर नहीं मिला। अब हालात ऐसे हैं कि वे दूसरे के घरों में शरण लेकर रात काटने को मजबूर हैं।

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In the Nepal tragedy, people saw everything they owned destroyed right before their eyes.
तीनों पीड़ितों की जुबानी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जिस घर को बनाने में पूरी जिंदगी खपा दी, जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और जहां परिवार ने न जाने कितने सपने संजोए थे, आज वही घर उनके लिए सिर्फ एक याद बनकर रह गया है। विदुर के सिमचौर बाजार के लोगों के लिए नेपाल सरकार ने भोजन की व्यवस्था तो करा दी है पर रहने को ठौर नहीं मिला। अब हालात ऐसे हैं कि वे दूसरे के घरों में शरण लेकर रात काटने को मजबूर हैं।

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पता नहीं था सुबह अपना घर भी नहीं रहेगा
सिमचौरा बाजार की पीड़ित अनीता ने भर्राई आवाज में कहा, रात तक सब कुछ ठीक था। घर था, सामान था, जिंदगी थी। सुबह देखा तो कुछ भी नहीं बचा। ऐसी तबाही हमने कभी नहीं देखी। पानी और मलबा इतनी तेजी से आया कि परिवार को सामान समेटने तक का मौका नहीं मिला। लोग अपनी जान बचाकर घरों से बाहर निकले। पीछे मुड़कर देखा तो वर्षों का बनाया आशियाना तबाही की धारा में समा चुका था।

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अपने घर में लौटने की उम्मीद भी टूटी
दूसरे के घर में शरण लिए शिव कुमार लांबा ने बताया कि एक झटके में हम बर्बाद हो गए। कुछ नहीं कर पाए। सब छोड़कर सिर्फ जान बचाकर भागे। सिर छिपाने के लिए जगह तो मिल गई है लेकिन आगे की जिंदगी कैसे चलेगी, इसका कोई जवाब नहीं है।
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दूसरों ने इंसानियत दिखाई और अपने घर में जगह दी है। कब तक यहां रहेंगे, पता नहीं। अपना घर तो चला गया। अब फिर से घर कैसे बनाएंगे, यही चिंता है। घर के साथ कपड़े, बर्तन, जरूरी दस्तावेज, अनाज, बच्चों की किताबें और रोजमर्रा का सामान भी तबाही में खो गया।

बच्चों को देखकर छलक आता है दर्द
लक्ष्मी लांबा ने बताया कि बच्चे पूछते हैं कि हमारा घर कब वापस बनेगा। उनके सवाल का जवाब नहीं दे पाती। अपना घर ही नहीं रहा तो उन्हें क्या बताऊं? बस, सुकून यही है कि अपनों को बचा लिया। लहरें इतनी तेज उठ रही थीं कि वहां से हम लोग भाग लिए। बाद में गए तो देखे घर नदी में विलीन हो गया।

कोई मदद करे या नहीं, हम फिर खड़े होंगे
95 साल की बुजुर्ग महिला सौम्या तमांग दमा की मरीज हैं पर उनके हौसले जवान हैं। अपनी बहू से बोलीं, डरती क्यूं है, पहली बार है क्या। फिर मेहनत करके घर बनाएंगे। सरकार पर बहुत भरोसा करने की जरूरत नहीं है। पहले भी हमने ऐसा किया है।

वे गुस्से में बोलीं, सरकार को रहने के लिए शिविर की व्यवस्था करनी चाहिए। दूसरों जगहों पर किया है तो यहां भी कराए। दूसर के घर में लोग भाड़ा पर रह रहे हैं। त्रासदी में तो सबको मिलकर रहना चाहिए। खुशी इस बात की है कि घर-दुकान सब चला गया, लेकिन बच्चे और परिवार बच गए। जान है तो फिर से कुछ बनाने की कोशिश करेंगे।

जलप्रलय के एक दिन पहले दुबई से घर आई थी
सुनीता महाजन कहती हैं कि मैं 25 अगस्त को दुबई से मायके आई थी। हमें क्या पता था कि जिस घर में सोने जा रही है वह अंतिम रात होगी। अचानक तेज आवाज के साथ लहरें उठने लगी। हम लोग डर गए। ऐसे में क्या करते। जेवर, पैसा, सामान कुछ नहीं ला सके। कपड़ा भी जो पहनकर आए था वही पास में है। बाद में एनजीओ की तरफ से कपड़े मिल हैं। खाना के लिए भी जगह-जगह इंतजाम है।
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