नेपाल त्रासदी: जिंदगी में ऐसी तबाही कभी नहीं देखी...आंखों के सामने बह गई जमा पूंजी और गहने-सामान
जिस घर को बनाने में पूरी जिंदगी खपा दी, जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और जहां परिवार ने न जाने कितने सपने संजोए थे, आज वही घर उनके लिए सिर्फ एक याद बनकर रह गया है। विदुर के सिमचौर बाजार के लोगों के लिए नेपाल सरकार ने भोजन की व्यवस्था तो करा दी है पर रहने को ठौर नहीं मिला। अब हालात ऐसे हैं कि वे दूसरे के घरों में शरण लेकर रात काटने को मजबूर हैं।
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जिस घर को बनाने में पूरी जिंदगी खपा दी, जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और जहां परिवार ने न जाने कितने सपने संजोए थे, आज वही घर उनके लिए सिर्फ एक याद बनकर रह गया है। विदुर के सिमचौर बाजार के लोगों के लिए नेपाल सरकार ने भोजन की व्यवस्था तो करा दी है पर रहने को ठौर नहीं मिला। अब हालात ऐसे हैं कि वे दूसरे के घरों में शरण लेकर रात काटने को मजबूर हैं।
पता नहीं था सुबह अपना घर भी नहीं रहेगा
सिमचौरा बाजार की पीड़ित अनीता ने भर्राई आवाज में कहा, रात तक सब कुछ ठीक था। घर था, सामान था, जिंदगी थी। सुबह देखा तो कुछ भी नहीं बचा। ऐसी तबाही हमने कभी नहीं देखी। पानी और मलबा इतनी तेजी से आया कि परिवार को सामान समेटने तक का मौका नहीं मिला। लोग अपनी जान बचाकर घरों से बाहर निकले। पीछे मुड़कर देखा तो वर्षों का बनाया आशियाना तबाही की धारा में समा चुका था।
दूसरे के घर में शरण लिए शिव कुमार लांबा ने बताया कि एक झटके में हम बर्बाद हो गए। कुछ नहीं कर पाए। सब छोड़कर सिर्फ जान बचाकर भागे। सिर छिपाने के लिए जगह तो मिल गई है लेकिन आगे की जिंदगी कैसे चलेगी, इसका कोई जवाब नहीं है।
लक्ष्मी लांबा ने बताया कि बच्चे पूछते हैं कि हमारा घर कब वापस बनेगा। उनके सवाल का जवाब नहीं दे पाती। अपना घर ही नहीं रहा तो उन्हें क्या बताऊं? बस, सुकून यही है कि अपनों को बचा लिया। लहरें इतनी तेज उठ रही थीं कि वहां से हम लोग भाग लिए। बाद में गए तो देखे घर नदी में विलीन हो गया।
95 साल की बुजुर्ग महिला सौम्या तमांग दमा की मरीज हैं पर उनके हौसले जवान हैं। अपनी बहू से बोलीं, डरती क्यूं है, पहली बार है क्या। फिर मेहनत करके घर बनाएंगे। सरकार पर बहुत भरोसा करने की जरूरत नहीं है। पहले भी हमने ऐसा किया है।
सुनीता महाजन कहती हैं कि मैं 25 अगस्त को दुबई से मायके आई थी। हमें क्या पता था कि जिस घर में सोने जा रही है वह अंतिम रात होगी। अचानक तेज आवाज के साथ लहरें उठने लगी। हम लोग डर गए। ऐसे में क्या करते। जेवर, पैसा, सामान कुछ नहीं ला सके। कपड़ा भी जो पहनकर आए था वही पास में है। बाद में एनजीओ की तरफ से कपड़े मिल हैं। खाना के लिए भी जगह-जगह इंतजाम है।