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यूनिवर्सिटी प्रशासन की लापरवाही से बिगड़ी बात

Sat, 09 Sep 2017 01:07 AM IST
Updated Sat, 09 Sep 2017 01:07 AM IST
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यूनिवर्सिटी प्रशासन की लापरवाही से बिगड़ी बात

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गोरखपुर।
छात्रसंघ चुनाव को लेकर हुए बवाल के पीछे की वजह गोरखपुर यूनिवर्सिटी प्रशासन की लापरवाही है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शासन से चुनाव कराने की अनुमति लिए बगैर ही प्रो. संजय बैजल को चुनाव अधिकारी नामित कर पूरा कार्यक्रम जारी कर दिया। अब जब उपमुख्यमंत्री ने चुनाव कराने से इंकार किया तो यूनिवर्सिटी प्रशासन बैकफुट पर आ गया। आनन-फानन में चुनाव कार्यक्रम निरस्त कर दिया गया। इसी से नाराज होकर छात्रों ने बवाल काटा।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि छात्रसंघ चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिशों के हिसाब से ही कराए जाएंगे। इसमें सीधे चुनाव का प्रावधान नहीं है। हर कक्षा और छात्र संख्या के हिसाब से प्रतिनिधि चुने जाएंगे। प्रतिनिधि ही अध्यक्ष, महामंत्री का चुनाव करेंगे। पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से पूरी की जाएगी। पोस्टरबाजी नहीं होगी। इसके बावजूद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने मनमानी की और वोटिंग से चुनाव कराने का एलान कर दिया। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने वाहवाही लूटने के इरादे से चुनाव कार्यक्रम भी बना लिया। मीडिया को बताया कि उपमुख्यमंत्री ही चुनाव की तारीख घोषित करेंगे। पूरा कार्यक्रम जारी करेंगे लेकिन कार्यक्रम के दौरान ऐसा नहीं हुआ। उपमुख्यमंत्री ने लिंगदोह समिति की हिसाब से चुनाव कराने की बात कही तो यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारियों की बत्ती गुल हो गई। सब बगलें झांकने लगे। लगा कि कुछ गलत कर दिया। इसी का नतीजा रहा कि उपमुख्यमंत्री के जाते ही यूनिवर्सिटी प्रशासन को प्रेस कांफ्रेंस कर चुनाव कार्यक्रम निरस्त करने की घोषणा करनी पड़ी।
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पोस्टर, बैनर से पटे चौराहे
चुनाव अधिकारी का नाम फाइनल होने के बाद ही छात्रनेता चुनावी मोड में आ गए। यूनिवर्सिटी कैंपस, छात्रसंघ चौराहा समेत पूरे शहर को पोस्टर, बैनर से पाट दिया। लिंगदोह समिति की सिफारिशों को दरकिनार कर छात्रनेता प्रचार में जुट गए। जातीय आधार पर भी वे वोट मांगते देखे गए। इसकी छाप पोस्टर, बैनर में भी देखने को मिली है।
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अराजकता बढ़ी
छात्रसंघ चुनाव के एलान के बाद से ही छात्रनेताओं और उनके समर्थकों की अराजकता भी बढ़ गई। देर रात तक रेलवे स्टेशन के आसपास तमाम छात्रों का जमावड़ा लगने लगा। मारपीट की भी घटनाएं हुईं। पुलिस सूत्रों की माने तो कुछ छात्रनेता उगाही में जुटे हैं। व्यापारी, उद्यमियों से चुनावी खर्च वसूल रहे हैं। इन्कार करने वालों को धमकाया जा रहा है। इसकी शिकायतें थाने तक पहुंची हैं।
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