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नेपाल में जलप्रलय: 'भाई की लाश ही दिखा दो', बहन स्विष्टी बोली-राखी नहीं बांध पाई; अंतिम संस्कार तो करने दो
Mon, 31 Aug 2026 01:47 PM IST
Rohit Singh
अमर उजाला ब्यूरो, विदुर/नेपाल
अमर उजाला ब्यूरो, विदुर/नेपाल
Published by: Rohit Singh
Updated Mon, 31 Aug 2026 01:47 PM IST
सार
अर्गा खाची से अपनी मां सावित्री बेलबासे के साथ विदुर में सेना के कैंप में आई स्विष्टी कहती है, 'भाई की सांस नहीं बची तो लाश ही दिखा दो...राखी तो नहीं बांध पाई, पर रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कर दूं।' यह कहते-कहते वह फफक पड़ती है।
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भाई की तलाश में फोटो लेकर नेपाल सेना कैंप में पहुंची स्विष्टी
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
नेपाल में जलप्रलय के बाद हर तरफ तबाही का मंजर है। कहीं मलबे के ढेर में घरों की पहचान मिट चुकी है तो कहीं अपनों की तलाश में लोग अस्पतालों और राहत शिविरों के चक्कर काट रहे हैं। इसी भीड़ के बीच स्विष्टी बेलबासे की आंखें लगातार किसी एक चेहरे को तलाश रही हैं। वह चेहरा उसके इकलौते भाई का है।
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जिस भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए वह हर साल बेसब्री से इंतजार करती थी, इस बार उसी भाई का कोई पता नहीं है। आंखों में आंसू हैं, चेहरे पर थकान है और जुबान पर बस एक ही बात...भाई की सांस नहीं बची तो लाश ही दिखा दो... राखी तो नहीं बांध पाई, पर रीति-रिवाज से अंतिम क्रिया कर्म कर दूं।
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अर्गा खाची से अपनी मां सावित्री बेलबासे के साथ विदुर में सेना के कैंप में आई स्विष्टी यह कहते-कहते फफक पड़ती है। कुछ पल के लिए वह चुप हो जाती है। सिर्फ आंखों से आंसू की धारा ही बह रही थी। भाई ने इसी साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। घर में उसके भविष्य को लेकर ढेरों सपने थे।
उसने भी पूरे किए और त्रिशूला में सिविल इंजीनियर के रूप में तैनाती मिली। 25 अगस्त को भाई ने कहा था कि छुट्टी मिली गई है, मैं 26 अगस्त की सुबह आ जाउंगा। कहां, इस बार तुम्हें अच्छे-अच्छे गिफ्ट दिलाउंगा। यह सुनते ही बगल में खड़ी उनकी मां फफक पड़ीं। स्विष्टी ने उन्हें चुप कराया। बोलीं, पापा मेरे पोखरा में सिविल इंजीनियर हैं। वे भी आए हैं और कैेंप में अंदर गए हैं।
भाई की तलाश में भटक रहे सुबोध
जम्मू से आए सुबोध गुप्ता छोटे भाई की तलाश में भटक रहे हैं। रविवार के सेना के कैंप में भाई सुहैल गुप्ता की फोटो के साथ एक पोस्टर लेकर गुमसुम बैठे थे। जब भी उनके मोबाइल पर सुहैल के बार में कोई सूचना जानना चाहने के लिए फोन करता, उनकी आंखें नम हो जाती।
जम्मू से आए सुबोध गुप्ता छोटे भाई की तलाश में भटक रहे हैं। रविवार के सेना के कैंप में भाई सुहैल गुप्ता की फोटो के साथ एक पोस्टर लेकर गुमसुम बैठे थे। जब भी उनके मोबाइल पर सुहैल के बार में कोई सूचना जानना चाहने के लिए फोन करता, उनकी आंखें नम हो जाती।
उन्होंने बताया कि भाई मेरा अपने 30 दोस्ताें के साथ नेपाल में कैलाश मान सरोवर की यात्रा पर आया था। सेना के जवानों ने 21 लोगों को बचा लिया है। भाई समेत चार का पता नहीं चला। बहुत चिंता हो रही है।
घटनास्थल से लेकर अस्पतालों और राहत शिविरों तक वह हर जगह पहुंच रहे हैं। किसी से कोई जानकारी मिलती है तो वहां दौड़ पड़ते हैं। लेकिन अगले ही क्षण उम्मीद टूट जाती है। सुबोध की थकान उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है, लेकिन कदम रुक नहीं रहे। उनका कहना है कि जब तक भाई का पता नहीं चलता, तलाश जारी रहेगी।
घटनास्थल से लेकर अस्पतालों और राहत शिविरों तक वह हर जगह पहुंच रहे हैं। किसी से कोई जानकारी मिलती है तो वहां दौड़ पड़ते हैं। लेकिन अगले ही क्षण उम्मीद टूट जाती है। सुबोध की थकान उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है, लेकिन कदम रुक नहीं रहे। उनका कहना है कि जब तक भाई का पता नहीं चलता, तलाश जारी रहेगी।
दो बच्चों के साथ रेस्कयू कर आई बोली मंजू...मैंने उम्मीद छोड़ दी थी
रविवार शाम के करीब चार बजे थे। सेना के हेलीकाप्टर अपने दो बच्चों के साथ उतरीं मंजू बहुत खुश थीं। घर बह गया, दुकान उजड़ गई, पर दोनों बच्चों के साथ सही सलामत लौटने पर बोलीं, जिंदगी फिर से शुरू करेंगे। जो हालात थे बता नहीं पाउंगी। राशन खत्म हो गया था, छोटी सी दुकान बह गई।
बच्चों को खिलाने के लिए कुछ नहीं था। बस, भगवान की कृपा थी। वरना मैंने तो उम्मीद छोड़ दी थी। उन्होंने बताया कि हेलीकाप्टर में ही सेना के जवानों ने बच्चे को चिप्स खाने के लिए दिया। अब यहां राहत शिविर में जा रही हूं।
रविवार शाम के करीब चार बजे थे। सेना के हेलीकाप्टर अपने दो बच्चों के साथ उतरीं मंजू बहुत खुश थीं। घर बह गया, दुकान उजड़ गई, पर दोनों बच्चों के साथ सही सलामत लौटने पर बोलीं, जिंदगी फिर से शुरू करेंगे। जो हालात थे बता नहीं पाउंगी। राशन खत्म हो गया था, छोटी सी दुकान बह गई।
बच्चों को खिलाने के लिए कुछ नहीं था। बस, भगवान की कृपा थी। वरना मैंने तो उम्मीद छोड़ दी थी। उन्होंने बताया कि हेलीकाप्टर में ही सेना के जवानों ने बच्चे को चिप्स खाने के लिए दिया। अब यहां राहत शिविर में जा रही हूं।
दूसरों की जान बचाते-बचाते भर आई जवान की आंखें, अब अपनों की तलाश में भटक रहा
सैलाब की तेज धार, चारों तरफ पसरा मलबा, टूटे हुए घर और जिंदगी की तलाश में दौड़ते रेस्क्यूकर्मी। जहां किसी के लिए हर पल मौत से जूझने जैसा है, वहीं सेना और सुरक्षा बलों के जवान अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों को बचाने में जुटे हैं।
इस त्रासदी के बीच एक ऐसा पल भी आया, जब दूसरों की जिंदगी बचाने वाला जवान सृजन खुद अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाया। आंखों से आंसू छलक पड़े और जुबां पर बस एक ही बात थी, दोस्तों का कुछ पता नहीं चल रहा, उन्हें ढूंढना है।
सैलाब की तेज धार, चारों तरफ पसरा मलबा, टूटे हुए घर और जिंदगी की तलाश में दौड़ते रेस्क्यूकर्मी। जहां किसी के लिए हर पल मौत से जूझने जैसा है, वहीं सेना और सुरक्षा बलों के जवान अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों को बचाने में जुटे हैं।
इस त्रासदी के बीच एक ऐसा पल भी आया, जब दूसरों की जिंदगी बचाने वाला जवान सृजन खुद अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाया। आंखों से आंसू छलक पड़े और जुबां पर बस एक ही बात थी, दोस्तों का कुछ पता नहीं चल रहा, उन्हें ढूंढना है।