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नाटक के जरिए किया जातिवाद पर चोट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Mon, 19 Feb 2018 08:58 PM IST
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नाटक का मंचन करते कलाकार।
- फोटो : Amar Ujala
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उत्तर प्रदेश संगीत नाट्य अकादमी की ओर से गोरखपुर यूनिवर्सिटी के दीक्षा भवन में आयोजित संभागीय नाट्य समारोह का सोमवार को ‘उम्र पैंतालीस बतलाई गई थी’ के मंचन के बाद समापन हुआ। कलाकारों ने इस नाटक के जरिए जातिवाद पर चोट की। इसका निर्देशन सुब्रत राय ने किया।
नाटक बूढ़े बरगद के नीचे लगने वाली पाठशाला के दृश्य से शुरू हुआ। यहां विद्यार्थियों को कक्षा के हिसाब से नहीं, बल्कि जातियों के लिहाज से बैठना होता है। पाठशाला में यह वर्ण व्यवस्था भाषा शिक्षक पंडित जी की बनाई थी और इसे लागू किया था गणित के मास्टर साब ने। अनुसूचित जाति के वाल्मीकि सहपाठियों और अध्यापकों के भेदभाव के बावजूद कक्षा में अव्वल आते हैं। एक दिन पंडित जी बच्चों को श्लोकों का पाठ कराते हैं। वह वाल्मीकि को श्लोक पाठ से रोक देते हैं। वाल्मीकि इसका विरोध करते हैं। इसे मास्टर साब और पंडित जी अपना अपमान समझते हैं।
दोनों कहते हैं कि वाल्मीकि यदि पाठशाला आएगा तो हम नहीं आएंगे। सहपाठी तथा गांव के ठाकुर की बेटी सुगंधा वाल्मीकि का साथ देती हैं। वह वाल्मीकि को इस बात के लिए राजी करती हैं कि जब तक दोनों अध्यापक कक्षा का बहिष्कार कर रहे हैं, तब तक वह ही सभी विद्यार्थियों को पढ़ाएं। कुछ समय बाद न चाहते हुए भी शिक्षकों को वाल्मीकि समेत सभी विद्यार्थियों का आठवीं कक्षा का बोर्ड का फार्म भरवाना पड़ता है। वाल्मीकि समेत सभी विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा तो पास कर लेते हैं, परंतु मास्टर साब व पंडित जी के षड्यंत्र के कारण जिंदगी की असल दौड़ में फेल हो जाते हैं।
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इनका रहा योगदान
कलाकार पंकज कश्यप, ऊजाली राज, रवि वर्मा, मुकेश सोनी, राहुल जोशी, केशव मित्तल, निशा तिवारी, निवेदिता जायसवाल, तारा उप्रेती, शुभम गौतम, इकबाल अहमद रजा, प्रशांत, कृष्णकांत शर्मा, मनीष तिवारी, सौरभ पांडेय, सचिन गुप्ता, अनुज चौहान, वकार अहमद व संदीप कन्नौजिया ने अपने अभिनय से कथानक को जीवंत किया। मंच से परे अमर राजभर, अवनीश सिंह, आशीष मौर्या, ब्रजेंद्र शर्मा, रजत राय, आशुतोष मिश्र, अवनीश सिंह, आशीष मौर्या, शोभा राय, विहान राय का सहयोग रहा। आयोजन में रूपांतर नाट्य मंच के निशिकांत पांडेय, अपर्णेश मिश्रा, रवि प्रताप सिंह, शैलजा पाठक आदि का सहयोग रहा।
नाटक बूढ़े बरगद के नीचे लगने वाली पाठशाला के दृश्य से शुरू हुआ। यहां विद्यार्थियों को कक्षा के हिसाब से नहीं, बल्कि जातियों के लिहाज से बैठना होता है। पाठशाला में यह वर्ण व्यवस्था भाषा शिक्षक पंडित जी की बनाई थी और इसे लागू किया था गणित के मास्टर साब ने। अनुसूचित जाति के वाल्मीकि सहपाठियों और अध्यापकों के भेदभाव के बावजूद कक्षा में अव्वल आते हैं। एक दिन पंडित जी बच्चों को श्लोकों का पाठ कराते हैं। वह वाल्मीकि को श्लोक पाठ से रोक देते हैं। वाल्मीकि इसका विरोध करते हैं। इसे मास्टर साब और पंडित जी अपना अपमान समझते हैं।
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दोनों कहते हैं कि वाल्मीकि यदि पाठशाला आएगा तो हम नहीं आएंगे। सहपाठी तथा गांव के ठाकुर की बेटी सुगंधा वाल्मीकि का साथ देती हैं। वह वाल्मीकि को इस बात के लिए राजी करती हैं कि जब तक दोनों अध्यापक कक्षा का बहिष्कार कर रहे हैं, तब तक वह ही सभी विद्यार्थियों को पढ़ाएं। कुछ समय बाद न चाहते हुए भी शिक्षकों को वाल्मीकि समेत सभी विद्यार्थियों का आठवीं कक्षा का बोर्ड का फार्म भरवाना पड़ता है। वाल्मीकि समेत सभी विद्यार्थी बोर्ड की परीक्षा तो पास कर लेते हैं, परंतु मास्टर साब व पंडित जी के षड्यंत्र के कारण जिंदगी की असल दौड़ में फेल हो जाते हैं।
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इनका रहा योगदान
कलाकार पंकज कश्यप, ऊजाली राज, रवि वर्मा, मुकेश सोनी, राहुल जोशी, केशव मित्तल, निशा तिवारी, निवेदिता जायसवाल, तारा उप्रेती, शुभम गौतम, इकबाल अहमद रजा, प्रशांत, कृष्णकांत शर्मा, मनीष तिवारी, सौरभ पांडेय, सचिन गुप्ता, अनुज चौहान, वकार अहमद व संदीप कन्नौजिया ने अपने अभिनय से कथानक को जीवंत किया। मंच से परे अमर राजभर, अवनीश सिंह, आशीष मौर्या, ब्रजेंद्र शर्मा, रजत राय, आशुतोष मिश्र, अवनीश सिंह, आशीष मौर्या, शोभा राय, विहान राय का सहयोग रहा। आयोजन में रूपांतर नाट्य मंच के निशिकांत पांडेय, अपर्णेश मिश्रा, रवि प्रताप सिंह, शैलजा पाठक आदि का सहयोग रहा।