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संप्रेक्षण गृह : छह कमरो में कैद है 178 बंदी
Updated Wed, 02 Aug 2017 01:46 AM IST
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शिवम सिंह
गोरखपुर।
राजकीय संप्रेक्षण गृह (बाल सुधार गृह) में सोमवार की रात किशोर बंदियों में संघर्ष यूं ही नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे कई ऐसी वजहें हैं जिन्हें प्रशासन नजरअंदाज करता रहा है। बाल सुधार गृह में मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। महज छह कमरों में 178 बाल बंदी/कैदी बंद हैं। उनके इस्तेमाल के लिए केवल तीन टॉयलेट हैं। यही वजह है कि किशोर कैदी बाल बंदियों को दबाने की कोशिश करते रहते हैं। इसी में मारपीट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यही नहीं, यहां तो पंखे के नीचे सोने तक के लिए मारपीट हो जाती है। पहले भी कई बार किशोर बंदियों पर बाल बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के आरोप लग चुके हैं।
संप्रेक्षण गृह में सुविधाएं न होने से आए दिन झगड़े होते रहते हैं। पिछले महीने ही सीजेएम, महराजगंज राजकिशोर सिंह, सचिव विधि सेवा प्राधिकरण महराजगंज सर्वजीत कुमार सिंह ने संप्रेक्षण गृह का निरीक्षण किया था। उन्होंने बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार का पता चलने पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट को रिपोर्ट भेजने को कहा था। साथ ही उन्होंने जिम्मेदार अफसरों को बाल सुधार गृह में सुधार का आदेश दिया था, मगर कुछ नहीं हुआ। सोमवार की रात किशोर बंदियों में संघर्ष कैरम खेलने को लेकर हुआ। वहां खेलने के लिए चंद कैरम बोर्ड ही हैं। इसे लेकर बाल बंदी और किशोर बंदी के बीच विवाद हो गया। मारपीट के दौरान तीन बंदी घायल हो गए और आठ मौका देखकर फरार हो गए। हालांकि पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए आठों को पकड़ लिया।
गोरखपुर के लिए बना था संप्रेक्षण गृह
जब संप्रेक्षण गृह का निर्माण हुआ तब इसे 50 बच्चों के लिए बनाया गया था। तब सिर्फ गोरखपुर के ही बंदी रखे जाने थे, लेकिन बाद में देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर के बच्चे भी यहां भेजे जाने लगे। बच्चे तो बढ़ते गए और जगह कम होती चली गई। जगह बदलने के बाद भी प्रशासन ने मानक को दरकिनार कर आबादी के बीच छोटे से घर में राजकीय संप्रेक्षण गृह खोल दिया।
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क्या है मानक (सौ बंदी होने पर)
- शयन के लिए कम से कम 40 वर्ग फीट का स्थान होना चाहिए। इस आधार पर औसतन 100 बच्चों के लिए नए भवन में शयन के लिए कम से कम 4000 वर्गफीट जगह होनी चाहिए
- 100 बच्चों के पठन-पाठन के लिए कम से कम 1200 वर्गफीट का कमरा होना चाहिए।
- 500 वर्गफीट जगह भोजन कक्ष के लिए होनी चाहिए।
- मेडिकल के लिए 1500, मनोरंजन के लिए 600, पुस्तकालय के लिए 1000 वर्गफीट की जगह होनी चाहिए
- 10 स्नान गृह के लिए 2500 वर्गफीट जगह चाहिए
- 16 टॉयलेट होना चाहिए, 300 वर्गफीट का कार्यालय कक्ष और 200 वर्गफीट का अधीक्षक कार्यालय होना चाहिए
बच्चों के लिए खेल का मैदान भी होना चाहिए
संस्थान ने जताई थी आपत्ति
बच्चों के कल्याण का कार्य करने वाली संस्था भानू प्रताप स्मृति संस्थान ने इसे लेकर आपत्ति भी जताई थी। संस्था के रत्नाकर सिंह ने मानवाधिकार, हाईकोर्ट, सीएम तक इसकी शिकायत कर जांच की मांग की थी। इस बाबत रत्नाकर सिंह का कहना है कि जांच की जिम्मेदारी उसी अफसर को दे दी गई जिसने यहां संप्रेक्षण गृह स्थानांतरित कराया था। ऐसे में जांच कितनी निष्पक्ष होती, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
गोरखपुर।
राजकीय संप्रेक्षण गृह (बाल सुधार गृह) में सोमवार की रात किशोर बंदियों में संघर्ष यूं ही नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे कई ऐसी वजहें हैं जिन्हें प्रशासन नजरअंदाज करता रहा है। बाल सुधार गृह में मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। महज छह कमरों में 178 बाल बंदी/कैदी बंद हैं। उनके इस्तेमाल के लिए केवल तीन टॉयलेट हैं। यही वजह है कि किशोर कैदी बाल बंदियों को दबाने की कोशिश करते रहते हैं। इसी में मारपीट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यही नहीं, यहां तो पंखे के नीचे सोने तक के लिए मारपीट हो जाती है। पहले भी कई बार किशोर बंदियों पर बाल बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के आरोप लग चुके हैं।
संप्रेक्षण गृह में सुविधाएं न होने से आए दिन झगड़े होते रहते हैं। पिछले महीने ही सीजेएम, महराजगंज राजकिशोर सिंह, सचिव विधि सेवा प्राधिकरण महराजगंज सर्वजीत कुमार सिंह ने संप्रेक्षण गृह का निरीक्षण किया था। उन्होंने बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार का पता चलने पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट को रिपोर्ट भेजने को कहा था। साथ ही उन्होंने जिम्मेदार अफसरों को बाल सुधार गृह में सुधार का आदेश दिया था, मगर कुछ नहीं हुआ। सोमवार की रात किशोर बंदियों में संघर्ष कैरम खेलने को लेकर हुआ। वहां खेलने के लिए चंद कैरम बोर्ड ही हैं। इसे लेकर बाल बंदी और किशोर बंदी के बीच विवाद हो गया। मारपीट के दौरान तीन बंदी घायल हो गए और आठ मौका देखकर फरार हो गए। हालांकि पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए आठों को पकड़ लिया।
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गोरखपुर के लिए बना था संप्रेक्षण गृह
जब संप्रेक्षण गृह का निर्माण हुआ तब इसे 50 बच्चों के लिए बनाया गया था। तब सिर्फ गोरखपुर के ही बंदी रखे जाने थे, लेकिन बाद में देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर के बच्चे भी यहां भेजे जाने लगे। बच्चे तो बढ़ते गए और जगह कम होती चली गई। जगह बदलने के बाद भी प्रशासन ने मानक को दरकिनार कर आबादी के बीच छोटे से घर में राजकीय संप्रेक्षण गृह खोल दिया।
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क्या है मानक (सौ बंदी होने पर)
- शयन के लिए कम से कम 40 वर्ग फीट का स्थान होना चाहिए। इस आधार पर औसतन 100 बच्चों के लिए नए भवन में शयन के लिए कम से कम 4000 वर्गफीट जगह होनी चाहिए
- 100 बच्चों के पठन-पाठन के लिए कम से कम 1200 वर्गफीट का कमरा होना चाहिए।
- 500 वर्गफीट जगह भोजन कक्ष के लिए होनी चाहिए।
- मेडिकल के लिए 1500, मनोरंजन के लिए 600, पुस्तकालय के लिए 1000 वर्गफीट की जगह होनी चाहिए
- 10 स्नान गृह के लिए 2500 वर्गफीट जगह चाहिए
- 16 टॉयलेट होना चाहिए, 300 वर्गफीट का कार्यालय कक्ष और 200 वर्गफीट का अधीक्षक कार्यालय होना चाहिए
बच्चों के लिए खेल का मैदान भी होना चाहिए
संस्थान ने जताई थी आपत्ति
बच्चों के कल्याण का कार्य करने वाली संस्था भानू प्रताप स्मृति संस्थान ने इसे लेकर आपत्ति भी जताई थी। संस्था के रत्नाकर सिंह ने मानवाधिकार, हाईकोर्ट, सीएम तक इसकी शिकायत कर जांच की मांग की थी। इस बाबत रत्नाकर सिंह का कहना है कि जांच की जिम्मेदारी उसी अफसर को दे दी गई जिसने यहां संप्रेक्षण गृह स्थानांतरित कराया था। ऐसे में जांच कितनी निष्पक्ष होती, इसे आसानी से समझा जा सकता है।