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भारतीय नारी का स्वरूप है गजल : प्रो वसीम बरेलवी
अमर उजाला/गाोरख्ापुर
Updated Sun, 07 Oct 2018 09:52 PM IST
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वसीम बरेलवी।
- फोटो : amar ujala
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राजन राय
गोरखपुर। मशहूर शायर पद्मश्री प्रो. वसीम बरेलवी कहते हैं शायरी की सबसे बड़ी विधा गजल है। वक्ती हवाओं से गजल मुतासिर नहीं हो सकता। इसमें परिवर्तित करने की क्षमता है। यह अपनी विरासत को संभाले हुए है। सही मायने में भारतीय नारी का स्वरूप है। तभी तो गजल आज भी प्रासंगिक है।
प्रो. बरेलवी रविवार को गोरखपुर में कवि सम्मेलन में शरीक होने आए थे। ‘अमर उजाला’ से उन्होंने साहित्य और सियासत के स्वरूप और बदलाव पर खुलकर बातचीत की।
उन्होंने कहा कि गजल ही एक ऐसी विधा है जिसमें समय के हिसाब से बदलाव आता गया। उन्होेंने खान-खाहियत, तरक्की पसंद और आज के दौर की चर्चा कर इसे भारतीय नारी के स्वरूप से बड़ी साफगोई से जोड़ा। कहा कि जैसे भारतीय नारी का कई स्वरूप है, इसी तरह गजल भी है। साहित्य में सियासत पर कहा, साहित्य कभी राजनीति से प्रभावित नहीं हो सकती। अगर प्रभावित स्वरूप दिखता है तो वह साहित्य नहीं है। साहित्य तो चिंतन में तब्दीली लाता है, समाज को दिशा देता है, इंसान की बेहतरी के ख्वाब देखता है। जबकि सियासत में नफा-नुकसान छिपा है। प्रो. बरेलवी ने प्रजातांत्रिक ढांचे पर भी सवाल उठाए। कहा, सबसे चिंता करने वाली बात है कि प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं है। हमारी प्राथमिकताएं उधार की हैं, हम अपने मूल से विरत हो गए हैं। त्याग, बलिदान, निष्ठा की जगह भौतिकवादिता ने ले लिया है। इसका असर समाज से लेकर शायरी तक पड़ा है।
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सहूलियत नहीं जरूरत की चीज है गांधी के विचार
प्रो. वसीम बरेलवी ने कहा कि देश में महात्मा गांधी की जयंती मनाई जा रही है। गांधी जी इंसानियत के प्रतीक हैं। उनके विचार सहूलियत नहीं बल्कि जरूरत की चीज हैं। यही वजह है कि उनके विचार हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
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गोरखपुर। मशहूर शायर पद्मश्री प्रो. वसीम बरेलवी कहते हैं शायरी की सबसे बड़ी विधा गजल है। वक्ती हवाओं से गजल मुतासिर नहीं हो सकता। इसमें परिवर्तित करने की क्षमता है। यह अपनी विरासत को संभाले हुए है। सही मायने में भारतीय नारी का स्वरूप है। तभी तो गजल आज भी प्रासंगिक है।
प्रो. बरेलवी रविवार को गोरखपुर में कवि सम्मेलन में शरीक होने आए थे। ‘अमर उजाला’ से उन्होंने साहित्य और सियासत के स्वरूप और बदलाव पर खुलकर बातचीत की।
उन्होंने कहा कि गजल ही एक ऐसी विधा है जिसमें समय के हिसाब से बदलाव आता गया। उन्होेंने खान-खाहियत, तरक्की पसंद और आज के दौर की चर्चा कर इसे भारतीय नारी के स्वरूप से बड़ी साफगोई से जोड़ा। कहा कि जैसे भारतीय नारी का कई स्वरूप है, इसी तरह गजल भी है। साहित्य में सियासत पर कहा, साहित्य कभी राजनीति से प्रभावित नहीं हो सकती। अगर प्रभावित स्वरूप दिखता है तो वह साहित्य नहीं है। साहित्य तो चिंतन में तब्दीली लाता है, समाज को दिशा देता है, इंसान की बेहतरी के ख्वाब देखता है। जबकि सियासत में नफा-नुकसान छिपा है। प्रो. बरेलवी ने प्रजातांत्रिक ढांचे पर भी सवाल उठाए। कहा, सबसे चिंता करने वाली बात है कि प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं है। हमारी प्राथमिकताएं उधार की हैं, हम अपने मूल से विरत हो गए हैं। त्याग, बलिदान, निष्ठा की जगह भौतिकवादिता ने ले लिया है। इसका असर समाज से लेकर शायरी तक पड़ा है।
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शार्टकट से बचें, पहले पढ़ें फिर लिखें युवा
सोशल मीडिया से साहित्य को होने वाले नुकसान पर प्रो. बरेलवी कहते हैं, युवाओं में समझ तो है पर सहनशीलता नहीं। साहित्य साधना का मामला है। गजल की 300 वर्ष पुरानी विद्या को समझे कोई कैसे लिख-पढ़ सकता है। युवा शार्टकट से बचें।
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सहूलियत नहीं जरूरत की चीज है गांधी के विचार
प्रो. वसीम बरेलवी ने कहा कि देश में महात्मा गांधी की जयंती मनाई जा रही है। गांधी जी इंसानियत के प्रतीक हैं। उनके विचार सहूलियत नहीं बल्कि जरूरत की चीज हैं। यही वजह है कि उनके विचार हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।