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अंकल..अंकल प्लीज हमें बचा लो
Updated Sat, 19 Aug 2017 01:36 AM IST
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बाढ़ में फंसे लोग।
- फोटो : Amar Ujala
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गोरखपुर। मानीराम इलाके के बैजनाथपुर गांव में दोपहर ढाई बजे एनडीआरएफ की टीम जैसे ही बोट के साथ घुसी, अचानक मासूमों की आवाज गूंजने लगी। अंकल...अंकल प्लीज हमें बचा लो। उनकी आवाज सुनकर एनडीआरएफ के जवान संजू और रामचंद ने बोट उनके घर की ओर मोड़ दी। वहां से बच्चों के पिता ओमवीर यादव, बूढ़ी मां, पत्नी व तीन बच्चे सृष्टि, आयुषी और विुदशी नीचे आ गए। इतने लोगों को एक साथ बोट में न बैठा पाने की बेबसी जताते हुए जवानों ने बच्चों और महिलाओं को बैठाया और बाद में आने का भरोसा दिया। बोट में बैठते ही डरे, सहमे बच्चे मां से लिपट गए। यह देख दादी की आंखों से आंसू छलक पड़े। वो हाथ जोड़कर भगवान का शुक्रिया जताने लगीं।
शहर से कोई 13 किलोमीटर दूर मानीराम रेलवे क्रासिंग के पास पुलिस ने रास्ता रोक रखा था। ‘अमर उजाला’ की टीम पड़ताल करने पहुंची तो हर तरफ बाढ़ ही बाढ़ का नजारा था। पास के गांव सिक्टौर में तीन से चार फीट तक पानी लोगों के घर में घुसा था। बहुत से लोग अपने घरों में ही फंसे थे। जो निकल पाए उनके रहने के लिए बाढ़ शिविर भी नहीं बनाए गए थे। गांव में 16 घंटे बीतने के बाद भी प्रशासन की तरफ से लंच पैकेट तक का इंतजाम नहीं होने पर लोग गुस्से में थे। उनमें इस कदर आक्रोश था कि जब फोटो जर्नलिस्ट ने बाढ़ में घिरे लोगों की बेबसी को कैमरे में कैद करने की कोशिश तो वे भड़क उठे। मानीराम रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर परिवार के साथ बैठे सिक्टौर के राजकुमार आपबीती बताते-बताते फफक पड़े। बोले, गुरुवार की शाम सात बजे अचानक पानी बढ़ने लगा। थोड़ी ही देर में पानी घर में घुस गया। हम लोग जान बचाकर किसी तरह बाहर आए। साहब, सब कुछ तबाह हो गया। सिर्फ बिस्तर ही ला सके। घर रेलवे ट्रैक के सामने है। रात भर बच्चे जागकर घर की रखवाली करते रहे।
मानीराम रेलवे स्टेशन पर डाला तंबू
प्रशासन की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत शिविर के इंतजाम न किए जाने से लोगों में काफी नाराजगी थी। सिक्टौर, जमुनिया गांव के लोगों ने मजबूरी में मानीराम रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर ही तंबू गाड़ लिया। कुछ लोगों ने मवेशियों को भी प्लेटफॉर्म पर बांध दिया। सुबह से भूखे-प्यासे लोगों को मानीराम के कुछ लोगों ने लंच पैकेट मुहैया कराया तो उन्हें राहत पहुंची।
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हेलीकाप्टर मंडराया तो समझे लंच पैकेट आया
दोपहर करीब एक बजे हेलीकाप्टर मंडराने लगा तो लोगों को लगा कि लंच पैकेट आया है। मानीराम रेलवे स्टेशन के पास हेलीकाप्टर थोड़ा नीचे आया तो लोग उधर दौड़ पड़े, लेकिन जब हेलीकाप्टर नहीं उतरा तो लोगों का गुस्सा और भड़क गया।
अब भैंस को क्या खिलाएं
जमुनिया गांव की 80 साल की राजमति बाढ़ से हुई तबाही की दास्तां बताने लगीं तो वह अपने आंसू नहीं रोक पाईं। बोलीं, हम लोग तो मांग कर खा लेंगे पर भैंस को क्या खिलाएं। सब तो पानी में डूबा पड़ा है। कल सुबह 11 बजे से हम लोग स्टेशन पर हैं। किसी ने अब तक सुध नहीं ली है। कुछ ऐसा ही दर्द छोटा सोनबरसा के कोइल और जमुनिया के हंसराज ने बयां किया। उनमें बाढ़ में सब कुछ गंवाने का गम तो था ही सबसे बड़ा संकट उनके सामने दो जून की रोटी और मवेशियों के लिए चारे का है।
साहब, पिताजी फंसे हैं बाढ़ में
मानीराम रेलवे स्टेशन के पास अधिकारियों से गुहार लगाकर थक चुके जमुनिया के रवींद्र कुमार काफी परेशान थे। अपनी बेबसी बताते हुए वह फफक पड़े। बोले, गुरुवार की सुबह से हम बाढ़ में घिर गए। परिवार में 12 लोग हैं। सभी लोग सुरक्षित आ गए हैं पर पिताजी घर में ही छूट गए। उनको लाने तैरकर गया था लेकिन लहरें तेज होने से जब मुझे लगा कि डूब जाऊंगा तो छत की ओर रोटी व गुड़ फेंककर चला आया। उनके पास मोबाइल भी नहीं है। 36 घंटे हो गए हैं, उनका पता नहीं चल रहा है।
कोई तो सुनो, मेरे दामाद को बचा लो
बालापार रोड पर रेस्क्यू ऑपरेशन में लगी एनडीआरएफ की टीम के पास पहुंचे 70 साल के हरिहर रोते, बिलखते रहे। वह एसपी क्राइम से गिड़गिड़ाते हुए बोले, बनसप्ती गांव में दामाद और नाती फंसे हैं। उन्हें बचा लें लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई।
पहले प्रेगनेंट लेडी को बचाओ
बचाव एवं राहत कार्य में जुटी एनडीआरएफ की टीम मौके की नजाकत और हालात को देख फैसले ले रही है। बालापार गांव में जब टीम बोट लेकर तो कई बाढ़ में फंसे कई परिवारों के लोगों ने पहले निकालने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। जवान ने कमांडेंट राजेश को फोन कर बताया कि साहब इसमें एक सुनील हैं जिनकी पत्नी प्रेग्नेंट हैं। कमांडेंट ने तपाक से कहा, पहले प्रेग्नेंट लेडी को बचाओ।
ऐसी तबाही तो 1962 में नहीं आई
बैजनाथपुर गांव के बबलू के पिता के पैर का ऑपरेशन होना था। माफी मशक्कत के बाद बबलू एनडीआरएफ की एक बोट लेकर अपने घर तक पहुंचने में कामयाब हुए। बोट में बैठते ही उनकी मां राजमति ने राहत भरी सांस ली। बोलीं, 1962 में भी इस तरह की बाढ़ नहीं आई थी। हमारे गांव तक ही पानी पहुंचा था, इस बार तो घर में रखा सारा सामान ही खराब हो गया।
घर ध्वस्त, सड़क पर गिरे पोल
बालापार रोड पर बाढ़ के पानी की धारा इतनी तेजी से गिरने लगी कि सिक्टौर के राम बचन बेलदार का मकान ध्वस्त हो गया। सारा सामान बह गया। गनीमत थी कि रामबचन कुछ समय पहले ही घर से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए थे। खौफजदा रामबचन सिर पकड़कर बोले, हम तो तबाह हो गए। उनके घर से कुछ दूर आगे बढ़ने पर सड़क पर दो फीट पानी आ गया था। पानी के दबाव से बिजली के पोल और ट्रांसफार्मर गिर गए थे।
एनडीआरएफ व पीएसी ने संभाला मोर्चा
बाढ़ प्रभावितों को सुरक्षित निकालने के लिए एनडीआरएफ के 30 जवान और बरेली की आठवीं वाहिनी पीएसी की टीम ने मोर्चा संभाल रखा था। एनडीआरएफ के इंस्पेक्टर राजेश रावेल ने बताया कि सुबह 9:30 बजे से चार बोट लेकर जवान रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे हैं। शाम चार बजे तक गौनकपुरा, विशुनपुरा और बैजनाथपुर गांव के 80 लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। वहीं 8वीं वाहिनी पीएसी के कंपनी कमांडेंट महेश चंद ने बताया कि चार बोट के साथ 25 कर्मी लगे हैं। 140 बाढ़ प्रभावितों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
रेलवे ट्रैक के करीब पहुंचा पानी
मानीराम रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक से कुछ दूरी तक पानी चढ़ गया है। हालांकि पानी के फ्लो कम होने से ट्रेनों के संचालन में अभी बाधा नहीं आई है। अधिकारियों ने मॉनीटरिंग तेज कर दी है। आरपीएफ ने एहतियात के तौर पर जवान तैनात कर दिए हैं। रेलवे ट्रैक पर अगर पानी चढ़ा तो गोरखपुर से नौतनवां रूट पर ट्रेनें रोक दी जाएंगी।
रेस्क्यू ऑपरेशन में टूटे बिजली के तार और सड़क से दिक्कत
चिलुआताल। एनडीआरएफ और पीएसी की टीम के रेस्क्यू ऑपरेशन में टूटे बिजली के तार और सड़कें बाधा बनी रही हैं। मानीराम में बोट में तार फंसने से एनडीआरएफ की एक बोट डैमेज हो गई। ऑपरेशन में जुटे जवानों ने बताया कि पानी में गांव से बाहर की ओर निकले खड़ंजा का अनुमान नही लग पा रहा है। कई बार खड़ंजे से बोट टच होकर बंद हो जा रही है। बोट में जवानों ने एक स्थानीय नागरिक को भी बैठाना शुरू कर दिया।
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शहर से कोई 13 किलोमीटर दूर मानीराम रेलवे क्रासिंग के पास पुलिस ने रास्ता रोक रखा था। ‘अमर उजाला’ की टीम पड़ताल करने पहुंची तो हर तरफ बाढ़ ही बाढ़ का नजारा था। पास के गांव सिक्टौर में तीन से चार फीट तक पानी लोगों के घर में घुसा था। बहुत से लोग अपने घरों में ही फंसे थे। जो निकल पाए उनके रहने के लिए बाढ़ शिविर भी नहीं बनाए गए थे। गांव में 16 घंटे बीतने के बाद भी प्रशासन की तरफ से लंच पैकेट तक का इंतजाम नहीं होने पर लोग गुस्से में थे। उनमें इस कदर आक्रोश था कि जब फोटो जर्नलिस्ट ने बाढ़ में घिरे लोगों की बेबसी को कैमरे में कैद करने की कोशिश तो वे भड़क उठे। मानीराम रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर परिवार के साथ बैठे सिक्टौर के राजकुमार आपबीती बताते-बताते फफक पड़े। बोले, गुरुवार की शाम सात बजे अचानक पानी बढ़ने लगा। थोड़ी ही देर में पानी घर में घुस गया। हम लोग जान बचाकर किसी तरह बाहर आए। साहब, सब कुछ तबाह हो गया। सिर्फ बिस्तर ही ला सके। घर रेलवे ट्रैक के सामने है। रात भर बच्चे जागकर घर की रखवाली करते रहे।
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मानीराम रेलवे स्टेशन पर डाला तंबू
प्रशासन की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत शिविर के इंतजाम न किए जाने से लोगों में काफी नाराजगी थी। सिक्टौर, जमुनिया गांव के लोगों ने मजबूरी में मानीराम रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर ही तंबू गाड़ लिया। कुछ लोगों ने मवेशियों को भी प्लेटफॉर्म पर बांध दिया। सुबह से भूखे-प्यासे लोगों को मानीराम के कुछ लोगों ने लंच पैकेट मुहैया कराया तो उन्हें राहत पहुंची।
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हेलीकाप्टर मंडराया तो समझे लंच पैकेट आया
दोपहर करीब एक बजे हेलीकाप्टर मंडराने लगा तो लोगों को लगा कि लंच पैकेट आया है। मानीराम रेलवे स्टेशन के पास हेलीकाप्टर थोड़ा नीचे आया तो लोग उधर दौड़ पड़े, लेकिन जब हेलीकाप्टर नहीं उतरा तो लोगों का गुस्सा और भड़क गया।
अब भैंस को क्या खिलाएं
जमुनिया गांव की 80 साल की राजमति बाढ़ से हुई तबाही की दास्तां बताने लगीं तो वह अपने आंसू नहीं रोक पाईं। बोलीं, हम लोग तो मांग कर खा लेंगे पर भैंस को क्या खिलाएं। सब तो पानी में डूबा पड़ा है। कल सुबह 11 बजे से हम लोग स्टेशन पर हैं। किसी ने अब तक सुध नहीं ली है। कुछ ऐसा ही दर्द छोटा सोनबरसा के कोइल और जमुनिया के हंसराज ने बयां किया। उनमें बाढ़ में सब कुछ गंवाने का गम तो था ही सबसे बड़ा संकट उनके सामने दो जून की रोटी और मवेशियों के लिए चारे का है।
साहब, पिताजी फंसे हैं बाढ़ में
मानीराम रेलवे स्टेशन के पास अधिकारियों से गुहार लगाकर थक चुके जमुनिया के रवींद्र कुमार काफी परेशान थे। अपनी बेबसी बताते हुए वह फफक पड़े। बोले, गुरुवार की सुबह से हम बाढ़ में घिर गए। परिवार में 12 लोग हैं। सभी लोग सुरक्षित आ गए हैं पर पिताजी घर में ही छूट गए। उनको लाने तैरकर गया था लेकिन लहरें तेज होने से जब मुझे लगा कि डूब जाऊंगा तो छत की ओर रोटी व गुड़ फेंककर चला आया। उनके पास मोबाइल भी नहीं है। 36 घंटे हो गए हैं, उनका पता नहीं चल रहा है।
कोई तो सुनो, मेरे दामाद को बचा लो
बालापार रोड पर रेस्क्यू ऑपरेशन में लगी एनडीआरएफ की टीम के पास पहुंचे 70 साल के हरिहर रोते, बिलखते रहे। वह एसपी क्राइम से गिड़गिड़ाते हुए बोले, बनसप्ती गांव में दामाद और नाती फंसे हैं। उन्हें बचा लें लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई।
पहले प्रेगनेंट लेडी को बचाओ
बचाव एवं राहत कार्य में जुटी एनडीआरएफ की टीम मौके की नजाकत और हालात को देख फैसले ले रही है। बालापार गांव में जब टीम बोट लेकर तो कई बाढ़ में फंसे कई परिवारों के लोगों ने पहले निकालने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। जवान ने कमांडेंट राजेश को फोन कर बताया कि साहब इसमें एक सुनील हैं जिनकी पत्नी प्रेग्नेंट हैं। कमांडेंट ने तपाक से कहा, पहले प्रेग्नेंट लेडी को बचाओ।
ऐसी तबाही तो 1962 में नहीं आई
बैजनाथपुर गांव के बबलू के पिता के पैर का ऑपरेशन होना था। माफी मशक्कत के बाद बबलू एनडीआरएफ की एक बोट लेकर अपने घर तक पहुंचने में कामयाब हुए। बोट में बैठते ही उनकी मां राजमति ने राहत भरी सांस ली। बोलीं, 1962 में भी इस तरह की बाढ़ नहीं आई थी। हमारे गांव तक ही पानी पहुंचा था, इस बार तो घर में रखा सारा सामान ही खराब हो गया।
घर ध्वस्त, सड़क पर गिरे पोल
बालापार रोड पर बाढ़ के पानी की धारा इतनी तेजी से गिरने लगी कि सिक्टौर के राम बचन बेलदार का मकान ध्वस्त हो गया। सारा सामान बह गया। गनीमत थी कि रामबचन कुछ समय पहले ही घर से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए थे। खौफजदा रामबचन सिर पकड़कर बोले, हम तो तबाह हो गए। उनके घर से कुछ दूर आगे बढ़ने पर सड़क पर दो फीट पानी आ गया था। पानी के दबाव से बिजली के पोल और ट्रांसफार्मर गिर गए थे।
एनडीआरएफ व पीएसी ने संभाला मोर्चा
बाढ़ प्रभावितों को सुरक्षित निकालने के लिए एनडीआरएफ के 30 जवान और बरेली की आठवीं वाहिनी पीएसी की टीम ने मोर्चा संभाल रखा था। एनडीआरएफ के इंस्पेक्टर राजेश रावेल ने बताया कि सुबह 9:30 बजे से चार बोट लेकर जवान रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे हैं। शाम चार बजे तक गौनकपुरा, विशुनपुरा और बैजनाथपुर गांव के 80 लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। वहीं 8वीं वाहिनी पीएसी के कंपनी कमांडेंट महेश चंद ने बताया कि चार बोट के साथ 25 कर्मी लगे हैं। 140 बाढ़ प्रभावितों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
रेलवे ट्रैक के करीब पहुंचा पानी
मानीराम रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक से कुछ दूरी तक पानी चढ़ गया है। हालांकि पानी के फ्लो कम होने से ट्रेनों के संचालन में अभी बाधा नहीं आई है। अधिकारियों ने मॉनीटरिंग तेज कर दी है। आरपीएफ ने एहतियात के तौर पर जवान तैनात कर दिए हैं। रेलवे ट्रैक पर अगर पानी चढ़ा तो गोरखपुर से नौतनवां रूट पर ट्रेनें रोक दी जाएंगी।
रेस्क्यू ऑपरेशन में टूटे बिजली के तार और सड़क से दिक्कत
चिलुआताल। एनडीआरएफ और पीएसी की टीम के रेस्क्यू ऑपरेशन में टूटे बिजली के तार और सड़कें बाधा बनी रही हैं। मानीराम में बोट में तार फंसने से एनडीआरएफ की एक बोट डैमेज हो गई। ऑपरेशन में जुटे जवानों ने बताया कि पानी में गांव से बाहर की ओर निकले खड़ंजा का अनुमान नही लग पा रहा है। कई बार खड़ंजे से बोट टच होकर बंद हो जा रही है। बोट में जवानों ने एक स्थानीय नागरिक को भी बैठाना शुरू कर दिया।