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फर्श पर बच्चों का किया जाता इलाज

Tue, 24 May 2016 11:05 PM IST
अमर उजाला/गोंडा
अमर उजाला/गोंडा Updated Tue, 24 May 2016 11:05 PM IST
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Treatment of children is on the floor
जमीन पर बीमार बच्चा - फोटो : अमर उजाला
सरकार की हिदायतों के बाद भी जिला अस्पताल की व्यवस्थाएं सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं। अस्पताल में मरीजों का हाल पूछने वाला कोई नहीं है तो वहीं जिला अस्पताल में बच्चों के लिए बने चिल्ड्रेन वार्ड का हाल तो ऐसा है कि यहां बच्चों को जमीन पर लिटाकर उनका इलाज किया जा रहा है।
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एक ही बेड पर जहां से दो से चार बच्चों को भर्ती किए जाने से एक बच्चे का इंफेक्शन दूसरे में फैलने का डर बना रहता है तो वहीं वहीं अस्पताल की इस अव्यवस्था के जिम्मेदार डॉक्टर व सीएमएस इस समस्या का कोई हल निकालने के बजाय अपने एसी कमरों में बैठे आराम फरमा रहे हैं। 
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जैसे-जैसे मौसम करवट ले रहा है, वैसे-वैसे जिला अस्पताल आने वाले बीमारों की संख्या भी तेजी से बढ़ती जा रही है। जिला अस्पताल में मरीजों के लिए अव्यवस्थाएं तो वैसे कदम-कदम पर हावी हैं, लेकिन बात अगर शून्य से 10 साल तक के मासूम बच्चों की हो तो उन पर जो बीत रही है, इसका नजारा किसी भी वक्त अस्पताल में बने चिल्ड्रेन वार्ड में जाकर देखा जा सकता है।
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जहां एक ही बेड पर दो से चार बच्चों को अस्पताल प्रशासन भर्ती कर उनका इलाज कर रहा है। इन बच्चों में कोई उल्टी-दस्त से पीड़ित है तो कोई बुखार, अस्थमा व अन्य बीमारियों से। जिसका इंफेक्शन एक बच्चे से दूसरे बच्चे में कब हो जाए, कह पाना बड़ा मुश्किल है।

वहीं बेड पर जगह न मिल पाने के कारण परिवारीजनों को अपने बच्चों को जमीन पर लिटाकर भी उनका इलाज कराना पड़ता है। लेकिन इसकी तनिक भी फिक्र अस्पताल के जिम्मेदारों को नहीं है। 

वहीं, इस वार्ड में बेड पर बिछी चद्दरों की हालत भी बेहद खराब है। अस्पताल में छोटे बच्चों के लिए न तो भाप लेने वाली मशीन की कोई व्यवस्था है और न ही वार्मर की। यहां उन्हें न तो उन्हें ठीक तरह से इलाज मिल पाता है और न ही अन्य सुविधाएं। 

जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन के आने के बाद से जिलास्तरीय अधिकारी अब तक कई बार जिला अस्पताल में छापेमारी कर यहां की व्यवस्थाओं का जायजा ले चुके हैं।

वह जिस भी दौरे पर आते हैं, उन्हें यहां कदम-कदम पर अव्यवस्थाएं हावी नजर आती हैं। लेकिन दिक्कत इस बात की है कि जिलाधिकारी के इतने कड़क तेवरों के बाद भी अस्पताल प्रशासन अपनी आदतों में कोई सुधार नहीं ला रहा। 

जिला अस्पताल में हर साल करोड़ों रुपये अस्पताली सेवाओं पर खर्च होते हैं। फिर चाहे वह मरीजों की सहूलियत पर खर्च हों, या फिर उनकी दवाई पर। लेकिन इन पैसों का कोई भी मुकम्मल लाभ मरीजों को नहीं मिल पाता। यहां तक कि जो सहूलियतें उन्हें अस्पताल में मिलनी चाहिए, उसके लिए भी उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं।

प्रभारी सीएमएस, जिला अस्पताल गोंडा -डॉ. वीपी श्रीवास्तव का कहना है कि गोंडा जिला अस्पताल की कुल क्षमता 176 बेड की है। बच्चों के लिए जो चिल्ड्रेन वार्ड बना है, उसमें कुछ बेड बीमार बच्चों की संख्या को देखते हुए बढ़ाए गए हैं।


जहां तक एक ही बेड पर बच्चों को लिटाकर या फिर जमीन पर लिटाकर उनका इलाज करने की बात है तो यह बात वह किसी भी बीमार बच्चों के परिवारीजनों से नहीं कह सकते कि वह अपने बच्चे को लेकर चले जाएं। इसलिए उन्हें मजबूरी में बच्चों को भर्ती करके उनका इलाज करना पड़ता है। रही बात अस्पताल में खराब पड़ी मशीनों की, तो इसे ठीक कराने के लिए कहा गया है। जल्द ही मशीनें ठीक हो जाएंगी।
 
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