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पंद्रह साल से लापता टीएमटी व टू-डी इको मशीन, अफसर अनजान
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गोंडा में जिला अस्पताल स्थित क्षेत्रीय निदान केंद्र।
- फोटो : GONDA
गोंडा। ठंड बढ़ने से साथ हृदय रोग से पीड़ित मरीजों की भीड़ भी अस्पतालों में बढ़ने लगी है। जिले में हर रोज करीब बीस लोगों को दिल का दौरा पड़ रहा है। जिला अस्पताल में हृदय रोगियों को इलाज की उचित सुविधा नहीं मिल पा रही है। मरीजों की जांच के लिए खरीदी गई लाखों कीमत की जांच मशीनें विभाग से गायब हैं। विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ तकनीकी स्टाफ का टोटा है।
जांच को खरीदी गयी टीएमटी व टू-डी इको मशीन को कहां स्थापित किया गया, इनसे कितने मरीजों की जांच हुई इस बात पर अस्पताल प्रशासन के अधिकारी भी अंजान बने है। इसके चलते ही बीते 15 सालों से सिर्फ ईसीजी के सहारे हृदय रोगियों का इलाज चल रहा है।
जिला अस्पताल में करीब पंद्रह साल पहले ही हृदय के मरीजों की जांच करने के लिए टीएमटी व टू-डी इको मशीन लगाई गई थी। इससे मरीजों का हार्टबीट मापकर हार्डअटैक की संभावना का आंकलन होता था। लेकिन अभी तक इन मशीनों को विभाग में स्थापित नहीं किया जा सका। ऐसे में मरीजों को जांच के लिए भटकना पड़ रहा है।
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वरिष्ट फिजिशियन डॉ. समीर गुप्ता बताते हैं कि हृदयरोग के लिए टीएमटी मशीन रामबाण साबित होती है। हार्ट की नसों में ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए टीएमटी (ट्रेडमिल -टेस्ट) कराने की सलाह दी जाती है।
टीएमटी में व्यक्ति को ट्रेड-मिल-मशीन (जिस पर जिम में दौड़ते हैं) पर तेज-तेज लगभग 5 से 10 मिनट चलाया जाता है। टेस्ट के दौरान धीरे-धीरे मशीन की स्पीड एवं एंगल बढ़ाते हैं, इस दौरान मरीज का ईसीजी मोनिटर किया जाता है, यदि शुरू एवं बाद की ईसीजी में काफी अंतर पाया जाए तो टेस्ट को पॉजिटिव माना जाता है। टू-डी इको कार्डियोग्राफी का प्रयोग दिल की संरचनाओं की वास्तविक गति को देखने के लिए किया जाता है।
बीते दो सालों से जिला अस्पताल का हृदयरोग विभाग विशेषज्ञ डॉक्टरों व तकनीकी स्टाफ की कमी झेल रहा है। दो साल पहले हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ जीके सिंह के अवकाश प्राप्त हो जाने के बाद से हृदयरोग विभाग में किसी भी डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई है।
हृदयरोग विशेषज्ञ व चेस्ट फिजिशियन के साथ ही तकनीकी तौर से प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ की भी कमी है। इसी लिए अस्पताल आने वाले हृदय के मरीजों को या तो रिफर कर दिया जाता है या ईसीजी करवाकर इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर को दिखाकर खानापूर्ति की जाती है।
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जांच को खरीदी गयी टीएमटी व टू-डी इको मशीन को कहां स्थापित किया गया, इनसे कितने मरीजों की जांच हुई इस बात पर अस्पताल प्रशासन के अधिकारी भी अंजान बने है। इसके चलते ही बीते 15 सालों से सिर्फ ईसीजी के सहारे हृदय रोगियों का इलाज चल रहा है।
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जिला अस्पताल में करीब पंद्रह साल पहले ही हृदय के मरीजों की जांच करने के लिए टीएमटी व टू-डी इको मशीन लगाई गई थी। इससे मरीजों का हार्टबीट मापकर हार्डअटैक की संभावना का आंकलन होता था। लेकिन अभी तक इन मशीनों को विभाग में स्थापित नहीं किया जा सका। ऐसे में मरीजों को जांच के लिए भटकना पड़ रहा है।
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वरिष्ट फिजिशियन डॉ. समीर गुप्ता बताते हैं कि हृदयरोग के लिए टीएमटी मशीन रामबाण साबित होती है। हार्ट की नसों में ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए टीएमटी (ट्रेडमिल -टेस्ट) कराने की सलाह दी जाती है।
टीएमटी में व्यक्ति को ट्रेड-मिल-मशीन (जिस पर जिम में दौड़ते हैं) पर तेज-तेज लगभग 5 से 10 मिनट चलाया जाता है। टेस्ट के दौरान धीरे-धीरे मशीन की स्पीड एवं एंगल बढ़ाते हैं, इस दौरान मरीज का ईसीजी मोनिटर किया जाता है, यदि शुरू एवं बाद की ईसीजी में काफी अंतर पाया जाए तो टेस्ट को पॉजिटिव माना जाता है। टू-डी इको कार्डियोग्राफी का प्रयोग दिल की संरचनाओं की वास्तविक गति को देखने के लिए किया जाता है।
बीते दो सालों से जिला अस्पताल का हृदयरोग विभाग विशेषज्ञ डॉक्टरों व तकनीकी स्टाफ की कमी झेल रहा है। दो साल पहले हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ जीके सिंह के अवकाश प्राप्त हो जाने के बाद से हृदयरोग विभाग में किसी भी डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई है।
हृदयरोग विशेषज्ञ व चेस्ट फिजिशियन के साथ ही तकनीकी तौर से प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ की भी कमी है। इसी लिए अस्पताल आने वाले हृदय के मरीजों को या तो रिफर कर दिया जाता है या ईसीजी करवाकर इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर को दिखाकर खानापूर्ति की जाती है।