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सहते गए जख्म, पर नहीं थमे कदम
अमर उजाला/गोंडा
Updated Mon, 25 Jul 2016 11:44 PM IST
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army
- फोटो : PTI
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गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच न जुबान काम कर रही थी और न ही आंखें। खून से लथपथ शरीर फिर भी हौसला नहीं छोड़ा, मोर्चा संभाले जवानों की मेहनत रंग लाई। यह गाथा है कारगिल के युद्ध की, जिसमें जाने कितने जवानों ने अपना सब कुछ गवां कर भारत मां की रक्षा की। इस घटना को भले ही 16 साल बीत चुके हों, लेकिन जवानों की यादें अभी भी ताजा हैं। जिसे याद कर उनकी बाहें फड़क उठती हैं और आंखें नम हो जाती हैं।
जिले के तरबगंज तहसील के बेलसर ब्लॉक के ऐली परसौली निवासी किसान रूपनरायन सिंह के सबसे छोटे बेटे विजय कुमार सिंह का बचपन से ही सपना सेना में जाकर देश की रक्षा करने का था। कहा जाता है कि व्यक्ति जो सच्चे मन से ठान लेता है, भगवान भी उसका ख्वाब जरूर पूरा करते हैं। यही विजय सिंह के साथ भी हुआ।
विजय ने उमरीबेगमगंज में सुभाष इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की परीक्षा पास की और लखनऊ में सैनिक भर्ती केंद्र में जोर-आजमाइश शुरू की। पहली ही बार में 1988 में विजय सैनिक बन गए। जबलपुर में ट्रेनिंग करने के बाद कहीं जगहों पर पोस्टिंग हुई। नौ जून 1999 को जब कारगिल का युद्ध छिड़ा तो विजय सिंह को भी अपनी देश भक्ति का जज्बा दिखाने का मौका मिल गया। वह बताते हैं कि सूचना आई कि टाइगर हिल के अगल-बगल करीब 15 पहाड़ियों पर दुश्मनों ने कब्जा कर लिया है।
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दुश्मनों के कब्जे से इन चौकियों को छुड़ाने के लिए भारतीय सेना के जवान 13 जुलाई को दराज सेक्टर से रवाना हुए। योजना थी कि 18 जुलाई को सुबह पांच बजे ही हमला किया जाएगा। टाइगर हिल की रीढ़ पहाड़ी 5100 पर देश के जवानों ने दुश्मनों की पूरी तरह से घेरा बंद कर ली थी, लेकिन ऐन वक्त पर कहीं से पत्थर गिरा और दुश्मन चौकन्ने हो गए।
दोनों तरफ से ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी। करीब डेढ़ घंटे की फायरिंग के बाद विजय सिंह कारगिल का एक साथी अमर बहादुर सिंह वीरगति को प्राप्त हुआ। इसके थोड़ी देर बाद विजय के दाहिने पैर में घुटने के नीचे गोली लग गई। सैनिकों का जोश इस कदर बढ़ा था कि गोली लगने का अहसास तक नहीं हुआ।
विजय कहते हैं कि लथपथ पैर का खून जूते में पहुंच गया तो चिपचिपाहट महसूस हुई। इस पर उन्हें गोली लगने की शंका हुई। फिर भी जल्द से जल्द दुश्मनों के चंगुल से चौकी को खाली कराने की हसरत थी, इसलिए कदम नहीं थमे। वह बढ़ते जा रहे थे कि दूसरी गोली भी विजय सिंह के पैर में घुटने के ऊपर आ लगी।
उन्होंने अपने साथी अमर देव सिंह को गोली लगने की बात कहकर पास बुलाया। जब तक अमर सिंह विजय के पास पहुंचता, तब तक वह बम की चपेट में आकर और घायल हो गए। तब तक अन्य सैनिक उनके पास पहुंचे और हाथ में ग्रेनेड रखकर कहा कि यदि पाकिस्तानी सैनिक घेर लें तो यह काम आएगा।
इसके बाद करीब 18-20 घंटे तक वह बेहोश पडे़ रहे। बाद में सैनिकों ने दुश्मन के चंगुल से सभी चौकियां छुड़ा ली। फिर हेलीकॉप्टर से उन्हें श्रीनगर अस्पताल लाया गया, जहां उन्हें होश आया। स्वास्थ्य लाभ लेने के बाद सेना से छुट्टी कर दी गई। घर पहुंचने पर लोग इनकी देश सेवा से इतने प्रभावित हुए कि विजय सिंह के नाम में उपनाम कारगिल जोड़ दिया।
विजय सिंह कहते हैं कि कारगिल का जंग जीतने के बाद उन्हें सेवा मेडल, जेएंडके मेडल, नाइन ईयरर्स मेडल सहित कई सम्मान दिए गए। इसके बावजूद यहां उनकी उपेक्षा भी हुई। बकौल कारगिल उन्हें पेट्रोल पंप व गैस एजेंसी देने का लॉलीपाप दिया गया, लेकिन कुछ नहीं हाथ आया। यहां के जनप्रतिनिधियों व नेताओं ने भी इस सैनिक की कोई मदद नहीं की।
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जिले के तरबगंज तहसील के बेलसर ब्लॉक के ऐली परसौली निवासी किसान रूपनरायन सिंह के सबसे छोटे बेटे विजय कुमार सिंह का बचपन से ही सपना सेना में जाकर देश की रक्षा करने का था। कहा जाता है कि व्यक्ति जो सच्चे मन से ठान लेता है, भगवान भी उसका ख्वाब जरूर पूरा करते हैं। यही विजय सिंह के साथ भी हुआ।
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विजय ने उमरीबेगमगंज में सुभाष इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की परीक्षा पास की और लखनऊ में सैनिक भर्ती केंद्र में जोर-आजमाइश शुरू की। पहली ही बार में 1988 में विजय सैनिक बन गए। जबलपुर में ट्रेनिंग करने के बाद कहीं जगहों पर पोस्टिंग हुई। नौ जून 1999 को जब कारगिल का युद्ध छिड़ा तो विजय सिंह को भी अपनी देश भक्ति का जज्बा दिखाने का मौका मिल गया। वह बताते हैं कि सूचना आई कि टाइगर हिल के अगल-बगल करीब 15 पहाड़ियों पर दुश्मनों ने कब्जा कर लिया है।
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दुश्मनों के कब्जे से इन चौकियों को छुड़ाने के लिए भारतीय सेना के जवान 13 जुलाई को दराज सेक्टर से रवाना हुए। योजना थी कि 18 जुलाई को सुबह पांच बजे ही हमला किया जाएगा। टाइगर हिल की रीढ़ पहाड़ी 5100 पर देश के जवानों ने दुश्मनों की पूरी तरह से घेरा बंद कर ली थी, लेकिन ऐन वक्त पर कहीं से पत्थर गिरा और दुश्मन चौकन्ने हो गए।
दोनों तरफ से ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी। करीब डेढ़ घंटे की फायरिंग के बाद विजय सिंह कारगिल का एक साथी अमर बहादुर सिंह वीरगति को प्राप्त हुआ। इसके थोड़ी देर बाद विजय के दाहिने पैर में घुटने के नीचे गोली लग गई। सैनिकों का जोश इस कदर बढ़ा था कि गोली लगने का अहसास तक नहीं हुआ।
विजय कहते हैं कि लथपथ पैर का खून जूते में पहुंच गया तो चिपचिपाहट महसूस हुई। इस पर उन्हें गोली लगने की शंका हुई। फिर भी जल्द से जल्द दुश्मनों के चंगुल से चौकी को खाली कराने की हसरत थी, इसलिए कदम नहीं थमे। वह बढ़ते जा रहे थे कि दूसरी गोली भी विजय सिंह के पैर में घुटने के ऊपर आ लगी।
उन्होंने अपने साथी अमर देव सिंह को गोली लगने की बात कहकर पास बुलाया। जब तक अमर सिंह विजय के पास पहुंचता, तब तक वह बम की चपेट में आकर और घायल हो गए। तब तक अन्य सैनिक उनके पास पहुंचे और हाथ में ग्रेनेड रखकर कहा कि यदि पाकिस्तानी सैनिक घेर लें तो यह काम आएगा।
इसके बाद करीब 18-20 घंटे तक वह बेहोश पडे़ रहे। बाद में सैनिकों ने दुश्मन के चंगुल से सभी चौकियां छुड़ा ली। फिर हेलीकॉप्टर से उन्हें श्रीनगर अस्पताल लाया गया, जहां उन्हें होश आया। स्वास्थ्य लाभ लेने के बाद सेना से छुट्टी कर दी गई। घर पहुंचने पर लोग इनकी देश सेवा से इतने प्रभावित हुए कि विजय सिंह के नाम में उपनाम कारगिल जोड़ दिया।
विजय सिंह कहते हैं कि कारगिल का जंग जीतने के बाद उन्हें सेवा मेडल, जेएंडके मेडल, नाइन ईयरर्स मेडल सहित कई सम्मान दिए गए। इसके बावजूद यहां उनकी उपेक्षा भी हुई। बकौल कारगिल उन्हें पेट्रोल पंप व गैस एजेंसी देने का लॉलीपाप दिया गया, लेकिन कुछ नहीं हाथ आया। यहां के जनप्रतिनिधियों व नेताओं ने भी इस सैनिक की कोई मदद नहीं की।