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परंपरागत खेलों के प्रति बच्चों में नहीं रही रुचि
बलरामपुर/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 24 Jul 2015 11:12 PM IST
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अषाढ़ के महीने में नम खेतों की मिट्टी में कबड्डी व कुश्ती आदि के परंपरागत खेलों का चलन अब धीरे-धीरे समाप्त होने लगा है। गांवों के बच्चे तथा युवा भी अब इन खेलों के प्रति रुचि नहीं रखते। इन खेलों की जगह अब गली क्रिकेट तथा मोबाइल व कंप्यूटर गेम ने ले लिया है। शरीर को पुष्ट व बलवान बनाने वाले परंपरागत खेलों की उपयोगिता अब समाप्त होती दिख रही है। इन खेलों के प्रति अब नई पीढ़ी का कोई रुझान नहीं है।
अषाढ़ के महीने में बारिश के समय होने वाले परंपरागत खेलों के पीछे चुस्त शरीर का राज छिपा रहता है। कभी कबड्डी, कुश्ती, झाबर, मल्य युद्ध आदि खेल काफी लोकप्रिय होते थे। गांव-गांव कबड्डी, कुश्ती, दंगल, आदि की प्रतियोगिताएं होती थी, जिसमें कई गांवों के खिलाड़ी प्रतिभाग करते थे। धीरे-धीरे अब इन खेलों का रुझान समाप्त होता जा रहा है। कुश्ती व कबड्डी जैसे खेल कुछ हद तक बचे हैं। बच्चे अब इनकी जगह मोबाइल, कम्प्यूटर गेम तथा क्रिकेट व फुटबाल को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
नहीं मिलता समय
गांव में रहने वाले शुभम (15), राजू (9) तथा अभिषेक (12) ने का कहना है कि उन लोगों को कुश्ती व कबड्डी आदि खेलने के लिए समय ही नहीं मिलता। स्कूल व ट्यूशन से जो समय मिलता है उसमें मोबाइल व कम्प्यूटर गेम खेलते हैं। बच्चों ने यह भी बताया कि उनके परिजन भी उन्हें कबड्डी व कुश्ती खेलने से मना करते हैं। खाली समय में यह बच्चे क्रिकेट खेलने को ज्यादा तरजीह देते हैं। शहरी बच्चे हिमांशु (11) व सूरज (8) ने बताया कि पढ़ाई व ट्यूशन के बाद भी वह लोग स्टेडियम में जाकर क्रिकेट व फुटबाल खेलना पसंद करते है। कबड्डी व कुश्ती आदि के बारे में न तो जानकारी है और न ही इनमें कोई रुचि है।
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होना चाहिए परंपरागत खेलों के संरक्षण का प्रयास
विशेषज्ञ महिपाल गुप्ता व जियाउल हशमत का कहना है कि परंपरागत खेलों के संरक्षण का प्रयास हर स्तर पर होना चाहिए। भारतीय परंपरागत खेलों से शरीर बलिष्ठ एवं मजबूत होता है। इन खेलों का संरक्षण करने के लिए शासन-प्रशासन तथा अभिभावकों को आगे आना होगा। महज कागजी खानापूर्ति एवं खोखली बयानबाजी से इन खेलों का उद्धार नहीं होगा। कबड्डी, कुश्ती, खोखो व अन्य भारतीय खेल देश की धरोहर व पहचान हैं।
होता है आयोजन
स्पोर्ट्स स्टेडियम में समय-समय पर कबड्डी व कुश्ती आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। गांवों में इन खेलों को बढ़ावा देने के लिए युवा कल्याण विभाग की ओर से क्रीड़ाश्री की भी नियुक्ति की गई है। इन खेलों को बढ़ावा देने के लिए शासन स्तर पर भी प्रयास किये जाने की जरूरत है।
- राजेश सोनकर, जिला क्रीड़ाधिकारी
फोटो-08 से 10-
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अषाढ़ के महीने में बारिश के समय होने वाले परंपरागत खेलों के पीछे चुस्त शरीर का राज छिपा रहता है। कभी कबड्डी, कुश्ती, झाबर, मल्य युद्ध आदि खेल काफी लोकप्रिय होते थे। गांव-गांव कबड्डी, कुश्ती, दंगल, आदि की प्रतियोगिताएं होती थी, जिसमें कई गांवों के खिलाड़ी प्रतिभाग करते थे। धीरे-धीरे अब इन खेलों का रुझान समाप्त होता जा रहा है। कुश्ती व कबड्डी जैसे खेल कुछ हद तक बचे हैं। बच्चे अब इनकी जगह मोबाइल, कम्प्यूटर गेम तथा क्रिकेट व फुटबाल को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
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नहीं मिलता समय
गांव में रहने वाले शुभम (15), राजू (9) तथा अभिषेक (12) ने का कहना है कि उन लोगों को कुश्ती व कबड्डी आदि खेलने के लिए समय ही नहीं मिलता। स्कूल व ट्यूशन से जो समय मिलता है उसमें मोबाइल व कम्प्यूटर गेम खेलते हैं। बच्चों ने यह भी बताया कि उनके परिजन भी उन्हें कबड्डी व कुश्ती खेलने से मना करते हैं। खाली समय में यह बच्चे क्रिकेट खेलने को ज्यादा तरजीह देते हैं। शहरी बच्चे हिमांशु (11) व सूरज (8) ने बताया कि पढ़ाई व ट्यूशन के बाद भी वह लोग स्टेडियम में जाकर क्रिकेट व फुटबाल खेलना पसंद करते है। कबड्डी व कुश्ती आदि के बारे में न तो जानकारी है और न ही इनमें कोई रुचि है।
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होना चाहिए परंपरागत खेलों के संरक्षण का प्रयास
विशेषज्ञ महिपाल गुप्ता व जियाउल हशमत का कहना है कि परंपरागत खेलों के संरक्षण का प्रयास हर स्तर पर होना चाहिए। भारतीय परंपरागत खेलों से शरीर बलिष्ठ एवं मजबूत होता है। इन खेलों का संरक्षण करने के लिए शासन-प्रशासन तथा अभिभावकों को आगे आना होगा। महज कागजी खानापूर्ति एवं खोखली बयानबाजी से इन खेलों का उद्धार नहीं होगा। कबड्डी, कुश्ती, खोखो व अन्य भारतीय खेल देश की धरोहर व पहचान हैं।
होता है आयोजन
स्पोर्ट्स स्टेडियम में समय-समय पर कबड्डी व कुश्ती आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। गांवों में इन खेलों को बढ़ावा देने के लिए युवा कल्याण विभाग की ओर से क्रीड़ाश्री की भी नियुक्ति की गई है। इन खेलों को बढ़ावा देने के लिए शासन स्तर पर भी प्रयास किये जाने की जरूरत है।
- राजेश सोनकर, जिला क्रीड़ाधिकारी
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