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अब महाजनों के गुलाम
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 10 Aug 2015 11:40 PM IST
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स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हुए आजाद देश के लोगों को सुखद अनुभूति होती है कि ऐसे रणबांकुरों की बदौलत देश में हम लोग खुली हवा में सांस ले रहे हैं। लेकिन जब इन रणबांकुरों के परिवार की स्थिति व उनके रहन-सहन पर नजर डालते हैं तो अंदर से टीस उभरती है कि यह क्या हो रहा है।
पहले अंग्रेजों की गुलामी करते रहे और संघर्ष कर आजादी दिलाई, लेकिन अब उन्हीं का परिवार महाजनों की गुलामी करने को विवश है। अंग्रेजों से लड़ना तो आसान था, लेकिन इन लोगों से लड़ना आसान नहीं है। ऐसा ही एक सपूत रामलाल जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया, लेकिन अपने परिवार को गुलामी की दलदल में छोड़ दिया।
यह सेनानी की गलती थी या फिर मौजूदा व्यवस्था की। इस पर आज शासन-प्रशासन व अन्य लोगों को सोचने की जरूरत है। मुख्यालय से कटरा बाजार रोड पर स्थित सरैयां माफी गांव के मंडफ मजरे में एक और वीर सपूत ने जन्म लिया था। उसका नाम रामलाल है। सत्याग्रह, क्विट इंडिया मूवमेंट सहित अन्य आजादी की लड़ाई में रामलाल ने अपना सब कुछ लुटा दिया।
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परिवार की चिंता किए बिना रामलाल तो अमर हो गए, लेकिन उनका परिवार गुलामी की जंजीरों में आज भी जकड़ा हुआ है। स्वतंत्रता सेनानी रामलाल की मौत करीब 32 साल पहले हो गई। पूरा परिवार अनपढ़ है। सेनानी रामलाल के चार पुत्र हैं, केशवराम, राम सेवक, त्रिवेनी व लुल्लुर। अब केशवराम, राम सेवक व लुल्लुर की मौत हो चुकी है। त्रिवेनी अभी जीवित हैं।
त्रिवेनी अपने पिता को याद करते हुए उनकी आजादी की लड़ाई पर गर्व करते हैं। लेकिन जब उनके बारे में पूछा जाता है तो वह रोने लगते हैं। त्रिवेनी व उनकी बहू उर्मिला ने बताया कि अब उनका परिवार बहुत बड़ा है। त्रिवेनी ने बताया कि वह चार भाई थे।
तीन भाई चल बसे। बाप की 16 बीघे जमीन थी जो चारों भाइयों के बीच चार-चार बीघे बंट गई। हर घर में करीब दस लोग हैं। इतनी कम खेती में गुजारा नहीं हो पाता है। चारों भाइयों के परिवार ने महाजनों से 40-40 हजार रुपये कर्ज ले रखा है।
कर्ज न चुका पाने से पूरा परिवार भट्ठे पर मजदूरी करता है। मजदूरी से जो मिलता है, उसी से गुजारा होता है। गरीबी के कारण बच्चे पढ़-लिख नहीं पाए। सरकार की ओर से कोई जमीन भी नहीं मिली। किसी प्रकार का आवास भी नहीं मिला। फूस के मकान में परिवार गुजर-बसर कर रहा है। इतना ही नहीं इस परिवार का राशन कार्ड भी नहीं बना है।
ये परिवार इतना गरीब है कि उसकी ओर किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया। रही बात देश की आजादी की तो परिवार के लोगों के मुंह से बरबस निकल जाता है कि उस गुलामी से यह गुलामी बहुत ही घातक है। देश के लोग तरक्की कर रहे हैं, लेकिन उनके हिस्से में गरीबी, भूख व लाचारी ही आई है।
किसी ने कभी ये नहीं पूछा कि उनके दादा आदि ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी तो उन्हें कुछ मिला या नहीं। अखबार वालों को देखकर पूरे परिवार में एक बार आशा की किरण जगी कि हो सकता है अब शासन-प्रशासन को उनकी गरीबी याद आ जाए।
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पहले अंग्रेजों की गुलामी करते रहे और संघर्ष कर आजादी दिलाई, लेकिन अब उन्हीं का परिवार महाजनों की गुलामी करने को विवश है। अंग्रेजों से लड़ना तो आसान था, लेकिन इन लोगों से लड़ना आसान नहीं है। ऐसा ही एक सपूत रामलाल जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया, लेकिन अपने परिवार को गुलामी की दलदल में छोड़ दिया।
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यह सेनानी की गलती थी या फिर मौजूदा व्यवस्था की। इस पर आज शासन-प्रशासन व अन्य लोगों को सोचने की जरूरत है। मुख्यालय से कटरा बाजार रोड पर स्थित सरैयां माफी गांव के मंडफ मजरे में एक और वीर सपूत ने जन्म लिया था। उसका नाम रामलाल है। सत्याग्रह, क्विट इंडिया मूवमेंट सहित अन्य आजादी की लड़ाई में रामलाल ने अपना सब कुछ लुटा दिया।
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परिवार की चिंता किए बिना रामलाल तो अमर हो गए, लेकिन उनका परिवार गुलामी की जंजीरों में आज भी जकड़ा हुआ है। स्वतंत्रता सेनानी रामलाल की मौत करीब 32 साल पहले हो गई। पूरा परिवार अनपढ़ है। सेनानी रामलाल के चार पुत्र हैं, केशवराम, राम सेवक, त्रिवेनी व लुल्लुर। अब केशवराम, राम सेवक व लुल्लुर की मौत हो चुकी है। त्रिवेनी अभी जीवित हैं।
त्रिवेनी अपने पिता को याद करते हुए उनकी आजादी की लड़ाई पर गर्व करते हैं। लेकिन जब उनके बारे में पूछा जाता है तो वह रोने लगते हैं। त्रिवेनी व उनकी बहू उर्मिला ने बताया कि अब उनका परिवार बहुत बड़ा है। त्रिवेनी ने बताया कि वह चार भाई थे।
तीन भाई चल बसे। बाप की 16 बीघे जमीन थी जो चारों भाइयों के बीच चार-चार बीघे बंट गई। हर घर में करीब दस लोग हैं। इतनी कम खेती में गुजारा नहीं हो पाता है। चारों भाइयों के परिवार ने महाजनों से 40-40 हजार रुपये कर्ज ले रखा है।
कर्ज न चुका पाने से पूरा परिवार भट्ठे पर मजदूरी करता है। मजदूरी से जो मिलता है, उसी से गुजारा होता है। गरीबी के कारण बच्चे पढ़-लिख नहीं पाए। सरकार की ओर से कोई जमीन भी नहीं मिली। किसी प्रकार का आवास भी नहीं मिला। फूस के मकान में परिवार गुजर-बसर कर रहा है। इतना ही नहीं इस परिवार का राशन कार्ड भी नहीं बना है।
ये परिवार इतना गरीब है कि उसकी ओर किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया। रही बात देश की आजादी की तो परिवार के लोगों के मुंह से बरबस निकल जाता है कि उस गुलामी से यह गुलामी बहुत ही घातक है। देश के लोग तरक्की कर रहे हैं, लेकिन उनके हिस्से में गरीबी, भूख व लाचारी ही आई है।
किसी ने कभी ये नहीं पूछा कि उनके दादा आदि ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी तो उन्हें कुछ मिला या नहीं। अखबार वालों को देखकर पूरे परिवार में एक बार आशा की किरण जगी कि हो सकता है अब शासन-प्रशासन को उनकी गरीबी याद आ जाए।