{"_id":"66c8d15878ba4fa3500842ae","slug":"market-decorated-with-puja-material-for-halashasti-fast-gonda-news-c-100-1-gon1002-122416-2024-08-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"Gonda News: हलषष्ठी व्रत की पूजन सामग्री से सजे बाजार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Gonda News: हलषष्ठी व्रत की पूजन सामग्री से सजे बाजार
Fri, 23 Aug 2024 11:43 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Fri, 23 Aug 2024 11:43 PM IST
विज्ञापन
गोंडा। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में वंश वृद्धि की कामना के साथ सुहागिन महिलाओं का हलषष्ठी अथवा ललही छठ का पर्व रविवार को है। बाजारों में व्रत में प्रयोग किया जाने वाला तिन्नी का चावल 200 से 250 रुपये किलो व 10-10 रुपये की दर से महुआ व दातून बिक रहा है।
गनेशपुर के पं. चंद्रभूषण मिश्र ने बताया कि हलषष्ठी व्रत को अवध में ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के छठे दिवस भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को शेषावतारी लक्ष्मण ने भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में जन्म लिया था। उनके अस्त्र मूसल या हल के प्रतीक स्वरूप इस व्रत को हलषष्ठी या ललही छठ कहा जाता है। नि:संतान महिलाएं इस व्रत को वंश वृद्धि के लिए और पुत्रवती महिलाएं संतान की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य की कामना से रखती हैं। शहर में स्टेशन रोड स्थित राधा-कृष्ण मंदिर में हलषष्ठी पर्व पर सामूहिक पूजन किया जाएगा।
संतान की मंगलकामना से सुहागिन महिलाएं हलषष्ठी व्रत निराहार रहकर मनाती हैं। व्रती महिलाएं षष्ठी को आहार के लिए खेत में उत्पादित किसी अन्न, फल अथवा अन्य कोई खाद्य सामग्री और गाय के दूध का उपयोग नहीं करती हैं। तालाब अथवा नदी की तलहटी में उगने वाले तिन्नी के चावल को पकाकर महुआ के फूल व भैंस के दूध से बने दही के पंचामृत के साथ पूजन और आहार किया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार महिलाएं प्रातः भैंस के गोबर से पूजा स्थल स्वच्छ कर महुआ के दातून और पूजा में उसके पत्तों का प्रयोग करती हैं। इस वर्ष षष्ठी तिथि शनिवार 24 अगस्त को दोपहर 12:30 से शुरू होकर रविवार 25 अगस्त को पूर्वाह्न 11:15 तक है। उदया तिथि में व्रत की मान्यता के कारण महिलाएं रविवार को व्रत रखकर भगवान बलराम, श्रीकृष्ण, श्रीरामचंद्र, हनुमान व शिव परिवार का पूजन करेंगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
गनेशपुर के पं. चंद्रभूषण मिश्र ने बताया कि हलषष्ठी व्रत को अवध में ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के छठे दिवस भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को शेषावतारी लक्ष्मण ने भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में जन्म लिया था। उनके अस्त्र मूसल या हल के प्रतीक स्वरूप इस व्रत को हलषष्ठी या ललही छठ कहा जाता है। नि:संतान महिलाएं इस व्रत को वंश वृद्धि के लिए और पुत्रवती महिलाएं संतान की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य की कामना से रखती हैं। शहर में स्टेशन रोड स्थित राधा-कृष्ण मंदिर में हलषष्ठी पर्व पर सामूहिक पूजन किया जाएगा।
विज्ञापन
संतान की मंगलकामना से सुहागिन महिलाएं हलषष्ठी व्रत निराहार रहकर मनाती हैं। व्रती महिलाएं षष्ठी को आहार के लिए खेत में उत्पादित किसी अन्न, फल अथवा अन्य कोई खाद्य सामग्री और गाय के दूध का उपयोग नहीं करती हैं। तालाब अथवा नदी की तलहटी में उगने वाले तिन्नी के चावल को पकाकर महुआ के फूल व भैंस के दूध से बने दही के पंचामृत के साथ पूजन और आहार किया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार महिलाएं प्रातः भैंस के गोबर से पूजा स्थल स्वच्छ कर महुआ के दातून और पूजा में उसके पत्तों का प्रयोग करती हैं। इस वर्ष षष्ठी तिथि शनिवार 24 अगस्त को दोपहर 12:30 से शुरू होकर रविवार 25 अगस्त को पूर्वाह्न 11:15 तक है। उदया तिथि में व्रत की मान्यता के कारण महिलाएं रविवार को व्रत रखकर भगवान बलराम, श्रीकृष्ण, श्रीरामचंद्र, हनुमान व शिव परिवार का पूजन करेंगी।
विज्ञापन