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Gonda News: ब्लड बैंक से 40 थैलेसीमिया मरीजों की जिंदगी बचाने की पहल
Wed, 07 May 2025 11:28 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Wed, 07 May 2025 11:28 PM IST
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गोंडा। जिले में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिंदगी भर खून की जरूरत के लिए भटक रहे मरीजों के लिए मेडिकल कॉलेज का ब्लड बैंक वरदान साबित हो रहा है। सालभर में 40 मरीजों को 482 यूनिट खून बिना डोनेशन मुफ्त में दिया गया है। रक्तदाताओं की पहल से इन 40 मरीजों की जिंदगी चल रही है। बृहस्पतिवार को विश्व थैलेसीमिया दिवस का आयोजन कर बीमारी के प्रति जागरूक किया जाएगा।
मां-बाप से बच्चों में आने वाली अनुवांशिक बीमारी थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को जिंदगीभर खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती रहती है। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में 40 मरीज पंजीकृत हैं, जिन्हें समय समय पर खून चढ़ाया जाता है। अधिकांश मरीजों को हर महीने खून की जरूरत पड़ती है। ब्लड बैंक के नियमानुसार किसी भी मरीज को खून देने के लिए उसके परिजन से एक यूनिट रक्तदान कराया जाता है। थैलेसीमिया के मरीजों को हर महीने खून की जरूरत पड़ती है, इसलिए उन्हें बिना रक्तदान मुफ्त में खून मुहैया कराया जाता है। अप्रैल 2024 से अप्रैल 2025 तक 482 यूनिट खून मुक्त में दिया गया, जिससे इन मरीजों की जान बच सकी।
आनुवांशिक है थैलेसीमिया, बच्चे में तीन माह बाद जांच में होती पुष्टि
ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. चेतन पराशर ने बताया कि थैलेसीमिया एक आनुवांशिक रक्त रोग है। इसकी पहचान बच्चे में तीन महीने बाद होती है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र लगभग 120 दिन होती है, लेकिन थैलेसीमिया के रोगी की लाल रक्त कणों की उम्र घटकर सिर्फ 20 दिन हो जाती है। इसका प्रभाव हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। हीमोग्लोबिन कम होने से लगातार बीमारियों से ग्रसित रहता है।
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दो प्रकार का होता है थैलेसीमिया
थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है। इसमें एक माइनर व दूसरा मेजर होता है। किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद गुणसूत्र में थैलेसीमिया के लक्षण होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है। महिला और पुरुष दोनों के गुणसूत्र में थैलेसीमिया के लक्षण होने पर बच्चे में मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनती है। इसमें जन्म लेने के छह माह बाद बच्चे के शरीर में रक्त बनना बंद हो जाता है। बार-बार रक्त चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है।
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मां-बाप से बच्चों में आने वाली अनुवांशिक बीमारी थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को जिंदगीभर खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती रहती है। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में 40 मरीज पंजीकृत हैं, जिन्हें समय समय पर खून चढ़ाया जाता है। अधिकांश मरीजों को हर महीने खून की जरूरत पड़ती है। ब्लड बैंक के नियमानुसार किसी भी मरीज को खून देने के लिए उसके परिजन से एक यूनिट रक्तदान कराया जाता है। थैलेसीमिया के मरीजों को हर महीने खून की जरूरत पड़ती है, इसलिए उन्हें बिना रक्तदान मुफ्त में खून मुहैया कराया जाता है। अप्रैल 2024 से अप्रैल 2025 तक 482 यूनिट खून मुक्त में दिया गया, जिससे इन मरीजों की जान बच सकी।
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आनुवांशिक है थैलेसीमिया, बच्चे में तीन माह बाद जांच में होती पुष्टि
ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. चेतन पराशर ने बताया कि थैलेसीमिया एक आनुवांशिक रक्त रोग है। इसकी पहचान बच्चे में तीन महीने बाद होती है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र लगभग 120 दिन होती है, लेकिन थैलेसीमिया के रोगी की लाल रक्त कणों की उम्र घटकर सिर्फ 20 दिन हो जाती है। इसका प्रभाव हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। हीमोग्लोबिन कम होने से लगातार बीमारियों से ग्रसित रहता है।
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दो प्रकार का होता है थैलेसीमिया
थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है। इसमें एक माइनर व दूसरा मेजर होता है। किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद गुणसूत्र में थैलेसीमिया के लक्षण होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है। महिला और पुरुष दोनों के गुणसूत्र में थैलेसीमिया के लक्षण होने पर बच्चे में मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनती है। इसमें जन्म लेने के छह माह बाद बच्चे के शरीर में रक्त बनना बंद हो जाता है। बार-बार रक्त चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है।