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गोंडा में हिंदी साहित्य के आधार हैं जीपी बाबू

अमर उजाला/गोंडा Updated Fri, 22 Apr 2016 10:55 PM IST
जीपी बाबू
जीपी बाबू - फोटो : अमर उजाला
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वैसे तो हिंदी साहित्य का आधुनिक इतिहास भारतेंदु युग से शुरू माना जाता है, लेकिन जिस वक्त उर्दू की जुबान व साहित्य परंपरा अपने चरम पर थी, उस समय जीपी श्रीवास्तव उर्फ गंगा बाबू ने हिंदी को चुना और पढ़ाई करने के साथ हिंदी की रचनाओं में अपना जीवन खपा दिया। 60 साल तक उनका साहित्यिक अनुष्ठान यूं चला कि उन्हें हास्य सम्राट की पदवी मिल गई।
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इतना ही नहीं गंगा बाबू को ‘साहित्य वारिधि’ व ‘साहित्य महारथी’ जैसे अलंकरण से विभूषित किया गया। हास्य सम्राट गंगा बाबू की याद में पूर्वोत्तर रेलवे ने गोंडा-बहराइच रेल खंड पर गंगाधाम स्टेशन का निर्माण कराया। हिंदी साहित्य रचना के इतिहास में हास्य सम्राट जीपी बाबू की याद हमेशा साहित्य प्रेमियों को आती रहेगी। 23 अप्रैल को गंगा बाबू की 126वीं जयंती है, इसलिए उनकी स्मृतियों को संजोना समीचीन होगा।

बाबू गंगा प्रसाद श्रीवास्तव मूलत: गोंडा के नहीं थे। उनका जन्म 23 अप्रैल 1889 में बिहार के छपरा जिले में हुआ था। उनके पिता रघुनंदन जी रेलवे में यहां नौकरी करते थे, इसलिए गंगा बाबू भी यहीं रहते थे। उर्दू के उस जमाने में गंगा बाबू ने लीक से हटकर हिंदी पढ़ने को प्राथमिकता दी। कैनिंग कॉलेज में शिक्षा ग्रहण करते हुए गंगा बाबू ने हिंदी साहित्य की सशक्त रचना ‘लंबी दाढ़ी’ लिखी।

इस रचना को लिखने की प्रेरणा देवकी नंदन खत्री की कालजयी रचना चंद्रकांता संतति से उन्हें मिली थी। जीपी बाबू चंद्रकांता से बहुत प्रभावित थे। गंगा बाबू की रचनाएं गद्यात्मक थीं। खासकर लोगों को गुदगुदाने व ठहाके लगाने पर मजबूर करने वाली रचना ‘दिलजले की आह’, ‘लतखोरी लाल’, ‘भइया अकिल बहादुर’, ‘दिल ही तो है’, ‘मामा जी’, ‘मुर्दा बाजार’ आदि हैं।

दिलजले की आह व लतखोरी लाल ने जीपी बाबू को हास्य सम्राट बना दिया। इतना ही नहीं लंबी दाढ़ी रचना उस वक्त क्षय रोगियों को पढ़ने के लिए दी जाती थी। कलकत्ता एवं प्रयाग में आयोजित हास्य सम्मेलन में उनको अध्यक्ष बनाया गया था। उनके साहित्य पर तमाम लोगों को पीएचडी की उपाधि मिल चुकी है। 60 साल तक हिंदी साहित्य के प्रवाह में चलते हुए गंगा बाबू ने 30 अगस्त 1976 को संसार को त्याग दिया।


साहित्य अनुरागियों के अनुसार जीपी बाबू अच्छे कथाकार, कहानीकार के अलावा एक बेहतर अभिनेता थे। कई नाटकों में उन्होंने सशक्त अभिनय किया। उस दौरान वे एकांकी के सशक्त अभिनेता थे। सरलता एवं अभिनय के गुण से परिपक्व, एकांकी लिखने में माहिर गंगा बाबू का नाम हिंदी के शुरुआती एकांकीकार के रूप में जाना जाता है।

उनकी साहित्य की रचनाएं सामान्य हिंदी भाषा में चित्रित हैं। गंगा बाबू मनुष्य के सामान्य जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव से प्रभावित थे। वे मुंशी प्रेमचंद्र के भी पूर्ववर्ती थे। 1916 ई. में साहित्य रचना के क्षेत्र में प्रेमचंद्र के पदार्पण के पहले ही जीपी श्रीवास्तव उर्फ हास्य सम्राट गंगा बाबू की कई रचनाएं प्रकाशित हो चुकी थीं।

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