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गोंडा जिलेे के पहले कलेक्टर कर्नल ब्यालूू का सिर काट कर फजल अली बनेे क्रांतिकारी

Wed, 12 Aug 2020 10:06 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 12 Aug 2020 10:06 PM IST
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Fazal Ali became revolutionary by beheading Colonel Bylu, the first collector of Gonda district
गोंडा। ब्रिटिश हकूमत के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी करनैलगंज के सकरौर में सबसे पहले गूंजी थी। साल 1857 में शुरु हुई आजाद की लड़ाई, यहां से पूरे जिले में फैल गई थी। 7 फरवरी 1856 गोंडा जिला अस्तित्व में आया। जिले के पहले कलेक्टर बने कर्नल ब्यालू ने आतंक का ठीकरा जनता पर फोड़ना शुरू किया। स्वाधीनता के लिए मंगल पांडेय ने भले ही मेरठ में चिन्गारी फूंकी पर यहां लोगों के जेहन में यह पहले से सुलग रही थी। कर्नल ब्यालू के आतंक से नाराज फजल अली ने सकरौरा छावनी में घुस कर उनकी गर्दन की काट डाली। आज तक फजल अली को डाकू व बदमाश होने का खिताब मिलता रहा पर वह पहले असली स्वतंत्रता सेनानी रहेे।
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इसमें अमीर, गरीब, किसान, मजदूर, हिन्दू, मुस्लिम सब ने मिलकर भाग लिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अवध क्षेत्र का भी अहम योगदान रहा। मेरठ के बाद स्वाधीनता के लिए शुरू हुई जंग सबसे पहले अवध के गोंडा जिले में कर्नलगंज के सकरौरा छावनी से ही हुई थी। 10 जून को सकरौरा छावनी के सिपाहियों ने विद्रोह का बिगुल फूंक कर हिसामपुर तहसील को भी लूट लिया था। 10 जून 1857 को पूरे अवध में आजादी का झंडा फहराने लगा था और जब दिल्ली, कानपुर और लखनऊ जैसे प्रमुख केन्द्रों का पतन हो गया तो भी अवध क्षेत्र में क्रांतिकारी लड़ाई जारी रखे थे। जनरल आउटम ने 07 फरवरी 1856 को अवध पर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन घोषित किया। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में दिल्ली और मेरठ में विद्रोह के बाद अवध क्षेत्र के गोंडा जिले के सकरौरा छावनी में सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। 10 जून 1857 को सकरौरा छावनी के कुछ सिपाहियों ने हिसामपुर तहसील को लूट लिया। स्थिति भांपकर लेफ्टीनेंट क्लर्क और सहायक कमिश्नर जार्डन बहराइच की ओर भागे। कमिश्नर विंग फील्ड ने भागकर बलरामपुर में शरण ली। डिप्टी कमिश्नर सीडब्ल्यू कैलिफ के नेतृत्व में उप आयुक्त, लेफ्टिनेंट लेग बेली और जोर्डन अंग्रेज अफसर जब 12 जून को घाघरा नदी होकर लखनऊ जाने लगे तो विद्रोही सैनिकों ने उन्हें बहराइच के बहरामघाट (गणेशपुर) के पास मौत के घाट उतार दिया। तीनों को सकरौरा छावनी में ही दो गज जमीन देकर दफ़न कर दिया, उनकी आज भी ये क़ब्रें मौजूद हैं और हमारे पूर्वजों के उदारता की मिसाल बनी हुई हैं।
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सत्ता की कुर्बानी देकर भी अंग्रेजी को देते रहे चुनौती
अंग्रेजी शासन के खिलाफ गोंडा में बिगुल फूंकने वाले गोंडा नरेश महाराजा देवी बक्श सिंह की शौर्य गाथा आज भी लोगों में देश भक्ति की अलख जगा रही है। राजपाट गंवाया, लेकिन उन्होंने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया। 1857 की क्रांति में गोंडा के राजा देवी बक्श सिंह ने आजादी की लड़ाई को नेतृत्व प्रदान किया था। उनके हजारों सैनिकों ने बेगम हजरत महल के सैनिकों का साथ दिया। अंग्रेज सेनापति रोक्राफ्ट के नेतृत्व में 05 मार्च 1858 को बेलवा पहुंची अंग्रेजों की सेना पर गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह, मेंहदी हसन, चरदा के राजा के नेतृत्व में 14 हजार स्वतंत्र सैनिकों ने अंग्रेजी सेना पर हमला कर दिया। भारी संख्या में सैनिकों के हताहत होेने के कारण राजा देवी बख्श सिंह को युद्ध बंद करना पड़ा। इसके बाद नवाबगंज के ऐतिहासिक मैदान लमती में भी अंग्रेजों व राजा की सेना के बीच युद्ध हुआ। राजा देवी सिंह बनकसिया कोट पहुंचे और यहां भी उन्होंने अपने बचे सैनिकों के साथ फिर लोहा लिया। आखिरकार राजा देवी बक्श सिंह अपने बचे सैनिकों के साथ नेपाल के दांग जिला चले गये, जहां बाद में बीमारी की वजह से उनकी मृत्यु हो गयी।
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अंग्रेजों से जंग के साथ ही क्रांतिकारियों का दिया साथ
सकरौरा की छावनी में सैनिकों ने विद्रोह के समर्थन में महारानी ईश्वरी देवी ने विद्रोह का झंडा उठाया। अंग्रेजों को अपना लोहा मनवाने वाली तुलसीपुर महारानी महारानी ऐश्वर्य राजेश्वरी देवी उर्फ ईश्वरी देवी की अमर गाथा आज भी बड़े-बूढ़ों की जुबान पर है। यह उनकी गौरवगाथा ही थी कि तुलसीपुर के लोग उन्हें लक्ष्मीबाई कहते थे। 25 वर्षीय रानी ईश्वरी देवी भी अपने ढाई वर्षीय दुधमुंहे बच्चे के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध कई दिनों तक मोर्चा संभाल कर युद्ध करती रहीं। उधर गोंडा के स्वतंत्रता सेनानी राजा देवी बख्श सिंह घाघरा और सरयू के मध्य क्षेत्र मंहगूपुर के समीप अंग्रेजी शासक कर्नल वाकर से युद्ध में पराजित होकर उतरौला के तरफ से अपने घोड़े से राप्ती नदी पार कर तुलसीपुर की रानी के साथ आए। दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा पीछा किए जाने पर बेगम हजरत महल, शहजादी बिरजिस कद्र, नानाजी व बाला जी राव ने भी आकर तुलसीपुर रानी के यहां शरण ली। शरणार्थियों को बचाने की खातिर वे युद्ध से पीछे हट गईं और सभी को लेकर नेपाल चली गईं। वहां भी तुलसीपुर के नाम से नगर बसाया जो आज दांग जिले का मुख्यालय है।

फजल अली ने काटा था अंग्रेज कर्नल का सिर
गोंडा गजेटियर के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी ने सात फरवरी 1856 को अवध क्षेत्र पर कब्जा किया था। अंग्रेजों का कब्जा होते ही यहां के रजवाड़ों का विरोध अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ तेज हो गया। तुलसीपुर की महारानी ईश्वरी देवी अंग्रेजी हुकुमत के लिए मुसीबत बन गई थी। अंग्रेजों का सामना करने के लिए रानी तुलसीपुर ने गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह से मदद मांगी। गोंडा राजा ने जनपद के उमरी बेगमगंज के निकट बसे मिर्जापुर गांव के निवासी अपने बहादुर सेनापति फजल अली को रानी की मदद के लिए भेजा। फजल अली तीरंदाजी, बंदूक, घुड़सवारी, तैराकी, लाठी तथा भाला चलाने में माहिर थे। फजल अली के कारण अंग्रेज रानी तुलसीपुर को परास्त नहीं कर पा रहे थे। अंग्रेजों ने गोंडा के कमिश्नर कर्नल ब्वायलू को रानी तुलसीपुर तथा फजल अली को काबू करने के लिए भेजा। राप्ती नदी के किनारे दोनों सेनाओं के बीच मुकाबला हुआ। अंग्रेजी सेना भारी पड़ने लगी तो फजल अली अपनी सेना के साथ जंगल में छिप गए। जब बेतहनिया गांव के पास कर्नल ब्वायलू व फजल अली की सेना का सामना हुआ तो कर्नल ने फजल अली को आत्मसमर्पण के लिए कहा। लेकिन फजल अली ने समर्पण के बजाय ब्वायलू पर गोली चला दी। हालांकि दूसरे दिन ही अंग्रेजी सेना ने फजल अली को गिरफ्तार कर उन्हें फांसी दे दी। फजल अली की वहां समाधि भी बनी थी, जिसके अवशेष अब भगवानपुर जलाशय में विलीन हो गए हैं।
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