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चुनावी सभा में किसानी कविता सुनाकर नेहरु के प्रिय बन गए थे बेकल उत्साही
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फोटो-2 गोंडा में स्व.बेकल उत्साही।(फाइल फोटो) (संवाद)
- फोटो : GONDA
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गोंडा। हिंदी और उर्दू साहित्य के ख्यातिलब्ध कवि और शायर बेकल उत्साही की रचनाएं प्रकृति के साथ-साथ गांव प्रेम, सामाजिक सौहार्द और देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण होती थीं। बेकल उत्साही ने हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन कर दुनिया को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि साल 1952 में एक चुनावी सभा में ‘किसान भारत का‘ कविता सुनकर देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू काफी प्रभावित हुए थे। बाद में पंडित नेहरू की प्रेरणा से ही बेकल उत्साही ने राजनीति में पदार्पण भी किया। उनके गीतों की रसधारा ने ही उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु के अति निकट पहुंचा दिया था। बाद में उन्हें पदमश्री और राज्यसभा में सदस्य मनोनीत कर सम्मानित किया गया। उनकी गीत, गजल, नज्म, मुक्तक, रुबाई, दोहा आदि विविध काव्य विधाओं में 20 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हुईं।
देश को आजादी मिलने के बाद साल 1952 में प्रथम बार देश में आम चुनाव हो रहे थे। तब कांग्रेस के अध्यक्ष व भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु चुनाव प्रचार के लिए गोंडा आए थे। वह गोंडा के टामसन इंटर कॉलेज (वर्तमान में शहीदे आजम सरदार भगत सिंह इंटर कॉलेज) में आयोजित चुनावी सभा में पहुंचे तो वहां बेकल उत्साही ने ‘किसान भारत का‘ कविता गाकर उनका स्वागत किया। इस कविता को सुनकर नेहरू मंत्रमुग्ध होकर बोले कि यह हमारा उत्साही शायर है। इसके बाद से ही उनका नाम बेकल उत्साही हो गया। बाद में नेहरू की प्रेरणा से ही वह कांग्रेस से जुड़ कर राजनीति में आए। बेकल उत्साही से जुड़े करीबी बताते हैं कि उनका बलरामपुर का घर बनवाने में नेहरू ने करीब 35 हजार रुपये दिए थे। विरोधी विचारधारा के बावजूद वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भी हमेशा काफी करीब रहे।
मिला पद्मश्री, बने राज्यसभा सांसद
साहित्य में योगदान के लिए 1976 में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पार्टी की निरंतर सेवाओं को देखते हुए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने बेकल उत्साही को 1986 में राज्य सभा का सदस्य भी बनाया। इसके बाद वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा उन्हें यश भारती मिला था। 03 दिसंबर 2016 को दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली।
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ठुकराया था नेपाल के राष्ट्रकवि का सम्मान
बलरामपुर जिला नेपाल से सटा हुआ है। देश का नेपाल के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता है। बेकल की बड़ी बेटी का विवाह नेपाल सीमा से सटे लक्ष्मी नगर में हुआ है। इसलिए अक्सर उनका नेपाल आना जाना होता था। नेपाल का राज घराना भी बेकल उत्साही की रचनाओं का मुरीद था। इस लिए वहां का शाही दरबार बेकल को नेपाल का राष्ट्रकवि तक बनाने की सोच रखता था। राजा की इच्छा थी कि बेकल हमेशा के लिए नेपाल के हो जाएं। लेकिन बेकल भारत की मिट्टी से बेपनाह मोहब्बत करते थे और उन्हें बलरामपुर छोड़ना गंवारा न था, इसीलिए उन्होंने नेपाल नरेश का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।
मोहम्मद शफी खान से बने बेकल उत्साही
अविभाजित गोंडा जिले के उतरौला तहसील क्षेत्र के गौर रमवापुर गांव में 01 जून 1924 को जमींदार परिवार में जन्मे बेकल उत्साही का वास्तविक नाम मो. शफी खां था। उनके पिता का नाम जफर खां लोदी और मां का नाम बिस्मिल्ला था। बेकल उत्साही ने 1942 में पहली बार जब बलरामपुर के एमपीपी इंटर कॉलेज में शेर पढ़ा तब वह कक्षा सात में पढ़ते थे। शेरो-शायरी के शौक ने पिता-पुत्र के रिश्ते में दरार पैदा कर दी थी। उनके पिता जफर खां जब उन्हें जमींदारी के कानून कायदे बताते थे तो वे खेतों में बैठकर शेरो-शायरी करते रहते। पिता को यह नागवार गुजरता था। फिर उन्होंनेे अपनी अलग मंजिल तय कर ली। इसके बाद से ही उनकी पहचान मुहम्मद शफी खान की जगह बेकल उत्साही के नाम से होने लगी। बेकल भाषा की वह त्रिवेणी थे जहां अवधी-हिंदी-उर्दू तीनों भाषाएं गले मिलती थीं।
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देश को आजादी मिलने के बाद साल 1952 में प्रथम बार देश में आम चुनाव हो रहे थे। तब कांग्रेस के अध्यक्ष व भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु चुनाव प्रचार के लिए गोंडा आए थे। वह गोंडा के टामसन इंटर कॉलेज (वर्तमान में शहीदे आजम सरदार भगत सिंह इंटर कॉलेज) में आयोजित चुनावी सभा में पहुंचे तो वहां बेकल उत्साही ने ‘किसान भारत का‘ कविता गाकर उनका स्वागत किया। इस कविता को सुनकर नेहरू मंत्रमुग्ध होकर बोले कि यह हमारा उत्साही शायर है। इसके बाद से ही उनका नाम बेकल उत्साही हो गया। बाद में नेहरू की प्रेरणा से ही वह कांग्रेस से जुड़ कर राजनीति में आए। बेकल उत्साही से जुड़े करीबी बताते हैं कि उनका बलरामपुर का घर बनवाने में नेहरू ने करीब 35 हजार रुपये दिए थे। विरोधी विचारधारा के बावजूद वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भी हमेशा काफी करीब रहे।
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मिला पद्मश्री, बने राज्यसभा सांसद
साहित्य में योगदान के लिए 1976 में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पार्टी की निरंतर सेवाओं को देखते हुए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने बेकल उत्साही को 1986 में राज्य सभा का सदस्य भी बनाया। इसके बाद वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा उन्हें यश भारती मिला था। 03 दिसंबर 2016 को दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली।
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ठुकराया था नेपाल के राष्ट्रकवि का सम्मान
बलरामपुर जिला नेपाल से सटा हुआ है। देश का नेपाल के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता है। बेकल की बड़ी बेटी का विवाह नेपाल सीमा से सटे लक्ष्मी नगर में हुआ है। इसलिए अक्सर उनका नेपाल आना जाना होता था। नेपाल का राज घराना भी बेकल उत्साही की रचनाओं का मुरीद था। इस लिए वहां का शाही दरबार बेकल को नेपाल का राष्ट्रकवि तक बनाने की सोच रखता था। राजा की इच्छा थी कि बेकल हमेशा के लिए नेपाल के हो जाएं। लेकिन बेकल भारत की मिट्टी से बेपनाह मोहब्बत करते थे और उन्हें बलरामपुर छोड़ना गंवारा न था, इसीलिए उन्होंने नेपाल नरेश का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।
मोहम्मद शफी खान से बने बेकल उत्साही
अविभाजित गोंडा जिले के उतरौला तहसील क्षेत्र के गौर रमवापुर गांव में 01 जून 1924 को जमींदार परिवार में जन्मे बेकल उत्साही का वास्तविक नाम मो. शफी खां था। उनके पिता का नाम जफर खां लोदी और मां का नाम बिस्मिल्ला था। बेकल उत्साही ने 1942 में पहली बार जब बलरामपुर के एमपीपी इंटर कॉलेज में शेर पढ़ा तब वह कक्षा सात में पढ़ते थे। शेरो-शायरी के शौक ने पिता-पुत्र के रिश्ते में दरार पैदा कर दी थी। उनके पिता जफर खां जब उन्हें जमींदारी के कानून कायदे बताते थे तो वे खेतों में बैठकर शेरो-शायरी करते रहते। पिता को यह नागवार गुजरता था। फिर उन्होंनेे अपनी अलग मंजिल तय कर ली। इसके बाद से ही उनकी पहचान मुहम्मद शफी खान की जगह बेकल उत्साही के नाम से होने लगी। बेकल भाषा की वह त्रिवेणी थे जहां अवधी-हिंदी-उर्दू तीनों भाषाएं गले मिलती थीं।