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बेटियों ने ठानी है, हर हाल में शिक्षा पानी है
अमर उजाला/गोंडा
Updated Sun, 15 Jan 2017 11:20 PM IST
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नाव से नदी पार करतीं छात्राएं
- फोटो : अमर उजाला
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मन में पढ़ने की लगन हो तो बड़ी से बड़ी बाधा भी आपका रास्ता नहीं रोक सकती है। इस बात को बालपुर क्षेत्र के लक्ष्मनपुरजाट समेत कई गांवों की बेटियों ने सच कर दिखाया है। पढ़ाई बाधित न हो इसके लिए इन गांवों की बेटियां स्कूल जाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर रोजाना मछली पकड़ने वाली जर्जर नाव की सवारी करने को विवश हैं। स्कूल और गांव के बीच में पड़ने वाली टेढ़ी नदी पर पुल के अभाव में नाव के सहारे नदी पार कर स्कूल जा रही हैं।
झंझरी ब्लाक के लक्ष्मनपुरजाट, बनियन पुरवा, केशवजोत, अहिरनपुरवा, सदियापुर, सेवकपुरवा, लालापुरवा समेत आधा दर्जन गांव टेढ़ी नदी की किनारे बसे हुए हैं। इन गांवों में नौनिहालों की पढ़ाई के लिए परिषदीय स्कूल तो हैं लेकिन उसके आगे की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। इसके आगे की शिक्षा के लिए इन गांवों के बच्चों को गांव से चार किमी दूर पैदल चलकर लखनऊ हाईवे पर स्थित बालपुर बाजार जाना पड़ता है।
इस सडक़ पर भारी ट्रैफिक के कारण अभिभावक बेटों को तो किसी तरह स्कूल भेजते हैं, लेकिन लंबी दूरी और सुनसान रास्ता होने के कारण बेटियों को आगे की शिक्षा के लिए यहां भेजने का खतरा मोल नहीं लेते हैं। ऐसे मे यहां की बेटियों की शिक्षा प्राथमिक स्तर की पढ़ाई के बाद रुक जाती है। पिछले वर्ष गांव से करीब एक किमी दूर नदी के दूसरी तरफ परसपुर ब्लाक के धानी गांव में जब एक निजी इंटर कालेज खुला तो गांव की बेटियों के मन में आगे की पढ़ाई की उम्मीद जगी, लेकिन इन सब के बीच टेढ़ी नदी बाधा बनकर खड़ी थी।
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नदी को पार कर स्कूल तक पहुंचना बेटियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था लेकिन इन बेटियों ने हार नही मानी और अपने बुलंद हौसलों से अपने परिजनों को स्कूल जाने के लिए मनाया। बेटियों की सुविधा के लिए ग्रामीणों ने नदी पर करीब 100 मीटर लंबा बांस का पुल बनाकर तैयार किया, लेकिन नदी की धारा की चौड़ाई व गहराई अधिक होने के कारण पूरी नदी पर पुल नहीं बन पाया। इस निराशा के बीच स्कूल प्रबंधन आगे आया बेटियों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए नाव की व्यवस्था कराई।
अब इसी मछली मारने वाली जर्जर नाव से इन गांवों की करीब 50 बेटियां नदी पार कर स्कूल पहुंचती हैं। अपनी जान को जोखिम में डालकर इस जर्जर नाव करने वाली छात्रा प्रियंका, खुशबू, मनीषा समेत अन्य बेटियों का कहना है कि लड़कियों की शिक्षा के लिए बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं लेकिन जब समस्या के समाधान की बारी आती है तो अफसर से लेकर जनप्रतिनिधि तक अपना मुंह मोड़ लेते हैं। इस संबंध में लक्ष्मनपुर गांव के ग्राम प्रधान राजेंद्र सिंह का कहना हेै कि जिला प्रशासन व क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों से कई बार इस नदी पर पीपे का पुल बनवाने की मांग की गई लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की।
नदी में पानी होने के कारण नाव पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्कूल जाने की जिद प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को भले ही न दिखाई दे, लेकिन टेढ़ी नदी बेटियों के इस हौसले से बेहद प्रभावित दिखती है। स्कूल जाने के लिए ज्यादा दूर तक नाव का सहारा न लेना पड़े शायद इसे सोचकर ही नदी की धारा सिकुड़ सी गई है। तभी तो करीब 5 सौ मीटर की चौड़ाई में फैली टेढ़ी नदी की धारा महज 100 मीटर चौड़ाई में ही सिमटकर रह गई है।
स्कूल तक पहुंचने के लिए बेटियों जिस नाव का सहारा लेती है उसका भुगतान स्कूल प्रबंधन की तरफ से किया जाता है। नाविक इंद्रमन ने बताया कि रोजाना वह बेटियों को नाव से स्कूल और स्कूल से गांव पहुंचाता है। कई शिफ्ट में बेटियों को लाते ले जाते हैं। इसके बदले में स्कूल प्रबंधन उसे 4 सौ रुपए प्रतिमाह का भुगतान देता है।
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झंझरी ब्लाक के लक्ष्मनपुरजाट, बनियन पुरवा, केशवजोत, अहिरनपुरवा, सदियापुर, सेवकपुरवा, लालापुरवा समेत आधा दर्जन गांव टेढ़ी नदी की किनारे बसे हुए हैं। इन गांवों में नौनिहालों की पढ़ाई के लिए परिषदीय स्कूल तो हैं लेकिन उसके आगे की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। इसके आगे की शिक्षा के लिए इन गांवों के बच्चों को गांव से चार किमी दूर पैदल चलकर लखनऊ हाईवे पर स्थित बालपुर बाजार जाना पड़ता है।
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इस सडक़ पर भारी ट्रैफिक के कारण अभिभावक बेटों को तो किसी तरह स्कूल भेजते हैं, लेकिन लंबी दूरी और सुनसान रास्ता होने के कारण बेटियों को आगे की शिक्षा के लिए यहां भेजने का खतरा मोल नहीं लेते हैं। ऐसे मे यहां की बेटियों की शिक्षा प्राथमिक स्तर की पढ़ाई के बाद रुक जाती है। पिछले वर्ष गांव से करीब एक किमी दूर नदी के दूसरी तरफ परसपुर ब्लाक के धानी गांव में जब एक निजी इंटर कालेज खुला तो गांव की बेटियों के मन में आगे की पढ़ाई की उम्मीद जगी, लेकिन इन सब के बीच टेढ़ी नदी बाधा बनकर खड़ी थी।
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नदी को पार कर स्कूल तक पहुंचना बेटियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था लेकिन इन बेटियों ने हार नही मानी और अपने बुलंद हौसलों से अपने परिजनों को स्कूल जाने के लिए मनाया। बेटियों की सुविधा के लिए ग्रामीणों ने नदी पर करीब 100 मीटर लंबा बांस का पुल बनाकर तैयार किया, लेकिन नदी की धारा की चौड़ाई व गहराई अधिक होने के कारण पूरी नदी पर पुल नहीं बन पाया। इस निराशा के बीच स्कूल प्रबंधन आगे आया बेटियों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए नाव की व्यवस्था कराई।
अब इसी मछली मारने वाली जर्जर नाव से इन गांवों की करीब 50 बेटियां नदी पार कर स्कूल पहुंचती हैं। अपनी जान को जोखिम में डालकर इस जर्जर नाव करने वाली छात्रा प्रियंका, खुशबू, मनीषा समेत अन्य बेटियों का कहना है कि लड़कियों की शिक्षा के लिए बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं लेकिन जब समस्या के समाधान की बारी आती है तो अफसर से लेकर जनप्रतिनिधि तक अपना मुंह मोड़ लेते हैं। इस संबंध में लक्ष्मनपुर गांव के ग्राम प्रधान राजेंद्र सिंह का कहना हेै कि जिला प्रशासन व क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों से कई बार इस नदी पर पीपे का पुल बनवाने की मांग की गई लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की।
नदी में पानी होने के कारण नाव पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्कूल जाने की जिद प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को भले ही न दिखाई दे, लेकिन टेढ़ी नदी बेटियों के इस हौसले से बेहद प्रभावित दिखती है। स्कूल जाने के लिए ज्यादा दूर तक नाव का सहारा न लेना पड़े शायद इसे सोचकर ही नदी की धारा सिकुड़ सी गई है। तभी तो करीब 5 सौ मीटर की चौड़ाई में फैली टेढ़ी नदी की धारा महज 100 मीटर चौड़ाई में ही सिमटकर रह गई है।
स्कूल तक पहुंचने के लिए बेटियों जिस नाव का सहारा लेती है उसका भुगतान स्कूल प्रबंधन की तरफ से किया जाता है। नाविक इंद्रमन ने बताया कि रोजाना वह बेटियों को नाव से स्कूल और स्कूल से गांव पहुंचाता है। कई शिफ्ट में बेटियों को लाते ले जाते हैं। इसके बदले में स्कूल प्रबंधन उसे 4 सौ रुपए प्रतिमाह का भुगतान देता है।