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...वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा

Mon, 14 Aug 2017 10:04 PM IST
Updated Mon, 14 Aug 2017 10:04 PM IST
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...वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा

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...वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा
खंडहर में तब्दील हो गया आजादी की मशाल जलाने वाले गोंडा नरेश का महल
अमर उजाला ब्यूरो
गोंडा। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यहीं बाकी निशां होगा। आजादी के परवानों की याद दिलाने वाली यह पंक्तियां किसी शहीद के स्मारक को देखकर बरबस ही होठों पर आ जाती है लेकिन पराधीनता के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंकने वाले गोंडा नरेश रहे महराजा देवी बक्श सिंह को सरकारी उपेक्षा ने भुला दिया। उनकी निशानी के रुप में मौजूद उनका महल जहां आज शहीद स्मारक होना चाहिए था उस स्थान को प्रशासन सहेजकर नहीं रख सका जिससे महराज का पैतृक महल खंडहर बनकर रह गया है।


गोंडा नरेश महराज देवी बक्श सिंह न्याय प्रिय व बहादुर राजा थे। सन 1856 में जब अंग्रेजों ने अवध की कंपनी को शासन में शामिल कर गोंडा को प्रथम जिला बनाया तो महराजा देवी बक्श सिंह ने क्रांतिकारी तेवर अपना लिए। महराजा देवी बक्श सिंह उन महान योद्धाओं में सुमार किए जाते हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फंका। सन 1857 में आजादी की पहली क्रांति में महराजा ने एक अंग्रेज जनरल का सिर कलम कर दिया था। चार मार्च 1857 को अंग्रेज सेनापति रोक्राफ्र्ट के खिलाफ बेलवा शिविर में जब 22 हजार सैनिकों ने विद्रोह किया तो 17 व 25 अप्रैल 1857 को महराजा देवी बक्श सिंह ने इस सेना का नेतृत्व किया। नवबंर में सर हाये ग्रांट के खिलाफ नवाबगंज के ऐतिहासिक मैदान लमती में अंग्रेजी सेना से लोहा लिया। इस चौतरफा युद्ध में करीब 21 हजार स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए। इसके बाद यहां बचे 800 सैनिकों के साथ महराजा ने मुजेहना के बनकसिया कोट पहुंचे और वहां 6 दिसबंर को एक बार फिर से अपने बचे हुए सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना से लोहा लिया। महराजा देवी बक्श सिंह ने अपने जीवन काल में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चार लड़ाईयां लड़ी जिसमें जरवा, सीतापुर व नवाबगंज की लड़ाई प्रमुख है। महराजा देवी बक्श सिंह उन महान योद्धाओं में शुमार किए जाते हैं जिन्होंने आजादी की खातिर अपना 84 कोस का राज्य गंवा दिया लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ कभी सिर नहीं झुकाया। जिले के मुजेहना ब्लाक के जिगना ग्राम पंचायत में महराजा देवी बक्श सिंह का पैतृक महल व नगर के भीतर बनी इनकी ड्योढ़ी आज भी इस महान योद्धा के शौर्य गाथा की याद दिलाती है लेकिन वर्तमान समय में यह दोनों स्थान जिला प्रशासन की उपेक्षा के शिकार हैं। शहीदों के स्मारकों को संरक्षित करने के बजाय उन्हे जिम्मेदारों ने भुला दिया। महराजा देवी बक्श सिंह के यह दोनों स्थल पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। शासन प्रशासन की उपेक्षा के कारण जिले के लोगों के मान सम्मान से जुड़ा यह ऐतिहासिक स्थल अब धुंध में खोता जा रहा है।
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