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उपभोक्ताओं को लूट रही बिलिंग कंपनी
अमर उजाला/गोंडा
Updated Sat, 02 Apr 2016 11:26 PM IST
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बिजली
- फोटो : अमर उजाला
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पावर कॉर्पोरेशन में बिलिंग करने वाली कंपनियों का फर्जीवाड़ा बंद होने का नाम नहीं ले रहा है। बिलिंग कंपनियां ड्यू डेट के ठीक एक दिन पहले बिजली का बिल जनरेट करती हैं और जब तक उपभोक्ता उसके भुगतान की तैयारी करता है, तब तक वह अगले बिल में जुड़कर आने वाले सरचार्ज का भागीदार बन जाता है।
र महीने ऐसे हजारों उपभोक्ताओं से यह बिलिंग कंपनियां लाखों रुपये का लेट पेमेंट के तौर पर भुगतान कराती हैं और जब उपभोक्ता इसकी शिकायत लेकर अधिकारियों के पास जाता है तो उसे वहां से समस्या का समाधान करने के बजाय टरका दिया जाता है।
गोंडा शहर में बिजली उपभोक्ताओं की सहूलियत के लिए हैंडहेल्ड बिलिंग की व्यवस्था बीते तीन साल से लागू है, जबकि ई-सुविधा के तहत ऑनलाइन बिल जमा करने की व्यवस्था बीते डेढ़ साल से।
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इस व्यवस्था के तहत कॉर्पोरेशन से हायर की गई बिलिंग कंपनी के लोग उपभोक्ताओं के घर-घर जाकर मीटरों की रीडिंग लेते हैं और उसका बिल उपभोक्ताओं को थमा कर चले जाते हैं। इस बिल में कुल बिलिंग राशि के साथ ही भुगतान की ड्यू डेट और डिस्कनेक्शन की तारीख भी अंकित रहती है।
लेकिन जो बिल बिलिंग कंपनियां उपभोक्ताओं को हैंडहेल्ड बिलिंग मशीन से निकाल कर देती हैं, उसमें बिल जमा करने के लिए उपभोक्ताओं को हफ्ता भर तो दूर 24 घंटे की भी मोहलत नहीं होती। जिससे अगले बिल में उपभोक्ताओं को न चाहते हुए भी कॉर्पोरेशन को लेट फीस का भुगतान करना पड़ता है।
गोंडा शहर में वैसे तो बिजली के करीब 44 हजार उपभोक्ता हैं, जिसमें से करीब 27 हजार उपभोक्ता ऐसे हैं, जिनकी बिलिंग हर महीने ऑनलाइन होती है। इन उपभोक्ताओं में हजारों ऐसे उपभोक्ता शामिल हैं, जिन्हें हर महीने लेट फीस के तौर पर कुछ न कुछ पैसा फाइनली बिल पेमेंट के लिए जरूर देना होता है।
इस लेट पेमेंट के नाम पर हर महीने यह कंपनियां उपभोक्ताओं को लाखों रुपये का चूना लगा रही हैं। इसके बावजूद कॉर्पोरेशन इस पूरे खेल में बिलिंग कंपनियों का साथ दे रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में जहां उपभोक्ताओं को हर दूसरे महीने बिजली का बिल दिया जाता है तो वहीं शहरी क्षेत्र में बिलिंग व्यवस्था ऑनलाइन होने के नाते हर महीने बिल देने की व्यवस्था है। लेकिन बिलिंग कंपनियां यह बिल उपभोक्ताओं को हर माह देने के बजाय हर दूसरे महीने में देती हैं। '
शहर में ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या हजारों में हैं, जिनके बिल हर दूसरे महीने में कंपनियां जेनरेट करती हैं। जिनके बिजली बिल में पहले-दूसरे महीने के साथ ही लेट पेमेंट का पैसा पहले से ही जुड़ा रहता है, जिसका भुगतान करना उपभोक्ताओं की मजबूरी होती है।
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र महीने ऐसे हजारों उपभोक्ताओं से यह बिलिंग कंपनियां लाखों रुपये का लेट पेमेंट के तौर पर भुगतान कराती हैं और जब उपभोक्ता इसकी शिकायत लेकर अधिकारियों के पास जाता है तो उसे वहां से समस्या का समाधान करने के बजाय टरका दिया जाता है।
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गोंडा शहर में बिजली उपभोक्ताओं की सहूलियत के लिए हैंडहेल्ड बिलिंग की व्यवस्था बीते तीन साल से लागू है, जबकि ई-सुविधा के तहत ऑनलाइन बिल जमा करने की व्यवस्था बीते डेढ़ साल से।
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इस व्यवस्था के तहत कॉर्पोरेशन से हायर की गई बिलिंग कंपनी के लोग उपभोक्ताओं के घर-घर जाकर मीटरों की रीडिंग लेते हैं और उसका बिल उपभोक्ताओं को थमा कर चले जाते हैं। इस बिल में कुल बिलिंग राशि के साथ ही भुगतान की ड्यू डेट और डिस्कनेक्शन की तारीख भी अंकित रहती है।
लेकिन जो बिल बिलिंग कंपनियां उपभोक्ताओं को हैंडहेल्ड बिलिंग मशीन से निकाल कर देती हैं, उसमें बिल जमा करने के लिए उपभोक्ताओं को हफ्ता भर तो दूर 24 घंटे की भी मोहलत नहीं होती। जिससे अगले बिल में उपभोक्ताओं को न चाहते हुए भी कॉर्पोरेशन को लेट फीस का भुगतान करना पड़ता है।
गोंडा शहर में वैसे तो बिजली के करीब 44 हजार उपभोक्ता हैं, जिसमें से करीब 27 हजार उपभोक्ता ऐसे हैं, जिनकी बिलिंग हर महीने ऑनलाइन होती है। इन उपभोक्ताओं में हजारों ऐसे उपभोक्ता शामिल हैं, जिन्हें हर महीने लेट फीस के तौर पर कुछ न कुछ पैसा फाइनली बिल पेमेंट के लिए जरूर देना होता है।
इस लेट पेमेंट के नाम पर हर महीने यह कंपनियां उपभोक्ताओं को लाखों रुपये का चूना लगा रही हैं। इसके बावजूद कॉर्पोरेशन इस पूरे खेल में बिलिंग कंपनियों का साथ दे रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में जहां उपभोक्ताओं को हर दूसरे महीने बिजली का बिल दिया जाता है तो वहीं शहरी क्षेत्र में बिलिंग व्यवस्था ऑनलाइन होने के नाते हर महीने बिल देने की व्यवस्था है। लेकिन बिलिंग कंपनियां यह बिल उपभोक्ताओं को हर माह देने के बजाय हर दूसरे महीने में देती हैं। '
शहर में ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या हजारों में हैं, जिनके बिल हर दूसरे महीने में कंपनियां जेनरेट करती हैं। जिनके बिजली बिल में पहले-दूसरे महीने के साथ ही लेट पेमेंट का पैसा पहले से ही जुड़ा रहता है, जिसका भुगतान करना उपभोक्ताओं की मजबूरी होती है।