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निर्जला व्रत का लिया संकल्प, आज ढलते सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य ं
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गोंडा में छठ पूजा की तैयारी करता परिवार।
- फोटो : GONDA
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गोंडा। डाला छठ पर्व के लिए महिलाओं ने निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया है। सभी तैयारियों को पूरी करने के बाद बुधवार की दोपहर में पूरी साज-सज्जा व विधि-विधान के साथ पोखरे पर पूजन करेंगी। इसके बाद दिन ढलते अस्ताचल भगवान सूर्य को अर्घ्य देंगी।
मान्यता है कि सूर्य देव को छठ माता के रूप में पूजन करने से परिवार में सुख, समृद्धि बढ़ती है और पुत्र व पति स्वस्थ रहते हैं। संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति होती है। पौराणिक काल में भगवान सूर्य की सर्वप्रथम पूजा भगवान रामचंद्र जी और माता सीता ने लंका पर विजय करने के पश्चात दीपावली के 6वें दिन छठ मैया की पूजा की थी।
महाभारत काल में सूर्य पुत्र कर्ण भगवान सूर्य की प्रति दिन उपासना व दान करते थे। पांडव की पत्नी द्रोपदी भी अपने पतियों की कुशलता व राष्ट्र कल्याण के लिए भगवान सूर्य की आराधना करती थीं।
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चार दिवसीय डाला छठ पर्व सोमवार से शुरू हो गया है। डाला छठ व्रत रखने वाली महिलाएं और पुरुष मंगलवार को खरना के रूप में मानती हैं।
मंगलवार को खरना में महिलाओं ने निर्जला व्रत धारण किया और बुधवार की शाम को सूर्य का अर्घ्य देंगी। गुरुवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत को समाप्त करेंगी।
उर्मिला श्रीवास्तव का कहना है कि यह व्रत हमारे घर में कई पुश्तों से चला आ रहा है। यह व्रत करने से परिवार में सुख व समृद्धि की प्राप्ति होती है। संध्या देवी का कहना है कि उनकी मां ने मन्नत किया था।
मन्नत पूरा होने के बाद पूरे परिवार के साथ छठ माता की पूजा करती हैं। गीता श्रीवास्तव का कहना है कि उनके पति की तबीयत बहुत खराब हो जाने के बाद छठी मैया से मन्नत मांगी थी कि उनके पति का स्वास्थ्य ठीक हो जाए। तब से यह व्रत करने लगीं।
रंजिता दिलीप का कहना है कि यह व्रत उनके परिवार में कई वर्षों से चला आ रहा है। अब वह भी व्रत धारण करतीं हैं। इस व्रत को करने से उनके पति व पुत्र की दीर्घायु व अच्छे स्वास्थ्य की कामना पूरी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि डाला छठ पर्व पर साफ-सफाई का ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने बताया कि डाला छठ पर्व शुरू होने से तीन-चार दिन पहले से ही पूरा परिवार बिना लहसुन प्याज का भोजन करता है, और व्रत रखने वाली महिला या पुरुष चार दिन तक जमीन पर ही विश्राम करना रहता है।
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मान्यता है कि सूर्य देव को छठ माता के रूप में पूजन करने से परिवार में सुख, समृद्धि बढ़ती है और पुत्र व पति स्वस्थ रहते हैं। संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति होती है। पौराणिक काल में भगवान सूर्य की सर्वप्रथम पूजा भगवान रामचंद्र जी और माता सीता ने लंका पर विजय करने के पश्चात दीपावली के 6वें दिन छठ मैया की पूजा की थी।
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महाभारत काल में सूर्य पुत्र कर्ण भगवान सूर्य की प्रति दिन उपासना व दान करते थे। पांडव की पत्नी द्रोपदी भी अपने पतियों की कुशलता व राष्ट्र कल्याण के लिए भगवान सूर्य की आराधना करती थीं।
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चार दिवसीय डाला छठ पर्व सोमवार से शुरू हो गया है। डाला छठ व्रत रखने वाली महिलाएं और पुरुष मंगलवार को खरना के रूप में मानती हैं।
मंगलवार को खरना में महिलाओं ने निर्जला व्रत धारण किया और बुधवार की शाम को सूर्य का अर्घ्य देंगी। गुरुवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत को समाप्त करेंगी।
उर्मिला श्रीवास्तव का कहना है कि यह व्रत हमारे घर में कई पुश्तों से चला आ रहा है। यह व्रत करने से परिवार में सुख व समृद्धि की प्राप्ति होती है। संध्या देवी का कहना है कि उनकी मां ने मन्नत किया था।
मन्नत पूरा होने के बाद पूरे परिवार के साथ छठ माता की पूजा करती हैं। गीता श्रीवास्तव का कहना है कि उनके पति की तबीयत बहुत खराब हो जाने के बाद छठी मैया से मन्नत मांगी थी कि उनके पति का स्वास्थ्य ठीक हो जाए। तब से यह व्रत करने लगीं।
रंजिता दिलीप का कहना है कि यह व्रत उनके परिवार में कई वर्षों से चला आ रहा है। अब वह भी व्रत धारण करतीं हैं। इस व्रत को करने से उनके पति व पुत्र की दीर्घायु व अच्छे स्वास्थ्य की कामना पूरी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि डाला छठ पर्व पर साफ-सफाई का ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने बताया कि डाला छठ पर्व शुरू होने से तीन-चार दिन पहले से ही पूरा परिवार बिना लहसुन प्याज का भोजन करता है, और व्रत रखने वाली महिला या पुरुष चार दिन तक जमीन पर ही विश्राम करना रहता है।