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पढ़ाई छोड़ चूल्हा चौका कर रही 268 बेटियां
amar ujala
Updated Sat, 29 Jul 2017 11:42 PM IST
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बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूल चलो रैली व नामांकन मेले जैसे कार्यक्रमों के आयोजन के बावजूद शत प्रतिशत बच्चों का स्कूलों में नामांकन कराने का दावा छलावा साबित हो रहा है। कक्षा पांच पास करने के बाद 11 से 14 वर्ष तक की 268 बेटियां अपनी स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ चुकी हैं और वह अपने घर पर चूल्हा चौका संभाल रहीं हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के सर्वेक्षण के दौरान इसका खुलासा हुआ है। इस खुलासे के शत प्रतिशत बच्चों का नामांकन का दावे पर सवालिया निशान लगा गया है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद 6 से 14 वर्ष तक के बालक बालिकाओं को अनिवार्य रुप से शिक्षा दिलाए जाने का प्रावधान है। इसके लिए सरकार परिषदीय स्कूलों में पढने वाले बच्चों को निशुल्क पाठ्य पुस्तक, स्कूल यूनीफार्म व दोपहर का भोजन भी उपलब्ध कराती है।
स्कूल में बच्चों को सप्ताह में एक दिन दूध व फल देने की योजना भी संचालित है। इस वर्ष से सरकार स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ाने के लिए जूता मोजा व टाई बेल्ट देने जा रही है। इन सबके अलावा नामांकन ठहराव को लेकर बेसिक शिक्षा विभाग स्कूल चलो रैली, नामांकन मेला, उपस्थिति अभियान व अन्य न जाने कितने अभियानों का संचालन करता है। इन अभियानों पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।
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स्कूलों में बच्चों के नामाकंन की असलियत जानने के लिए प्रत्येक वर्ष हाउस होल्ड सर्वे व बाल गणना कराई जाती है। बावजूद इसके स्कूलों में शत प्रतिशत बालक बालिकाओं के दावे पर विभाग के अफसर खरे नहीं उतर रहे हैं। स्कूलों में लगातार बच्चों का नामांकन घट रहा है।
और तो और पांचवी पास करने के बाद छात्र छात्राएं स्कूलों से ड्राप आउट हो रहे हैं। इनमें बालिकाओं की संख्या सर्वाधिक है। हाल ही में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए किशोरी बालिकाओं के सर्वेक्षण में 11 से 14 वर्ष तक के 268 बालिकाओं के स्कूल न जाने के रिपोर्ट सामने आई है।
यह ऐसी बालिकाएं है जो पांचवीं के बाद स्कूल जाना छोड़ चुकी हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के इस सर्वेक्षण ने बेसिक शिक्षा विभाग के उस हाउस होल्ड सर्वे व बाल गणना की रिपोर्टों की पोल खोल दी है जिसमें 6 से 14 वर्ष तक के शत प्रतिशत बच्चों का नामांकन स्कूलों में होने का दावा किया गया है।
गोंडा। बेसिक शिक्षा विभाग ने आउट आफ स्कूल बच्चों की जानकारी के लिए मई माह में हाउस होल्ड सर्वे कराया था। इस हाउस होल्ड सर्वे में 105 बच्चों के स्कूल से ड्रॉपआउट होने की जानकारी सामने आई थी। बाद में इसमें खामी बताकर इसे निरस्त कर दिया गया। इन खामियों के मद्देनजर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी इस सर्वे को दोबारा करवा चुके हैं लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात है।
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शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद 6 से 14 वर्ष तक के बालक बालिकाओं को अनिवार्य रुप से शिक्षा दिलाए जाने का प्रावधान है। इसके लिए सरकार परिषदीय स्कूलों में पढने वाले बच्चों को निशुल्क पाठ्य पुस्तक, स्कूल यूनीफार्म व दोपहर का भोजन भी उपलब्ध कराती है।
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स्कूल में बच्चों को सप्ताह में एक दिन दूध व फल देने की योजना भी संचालित है। इस वर्ष से सरकार स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ाने के लिए जूता मोजा व टाई बेल्ट देने जा रही है। इन सबके अलावा नामांकन ठहराव को लेकर बेसिक शिक्षा विभाग स्कूल चलो रैली, नामांकन मेला, उपस्थिति अभियान व अन्य न जाने कितने अभियानों का संचालन करता है। इन अभियानों पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।
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स्कूलों में बच्चों के नामाकंन की असलियत जानने के लिए प्रत्येक वर्ष हाउस होल्ड सर्वे व बाल गणना कराई जाती है। बावजूद इसके स्कूलों में शत प्रतिशत बालक बालिकाओं के दावे पर विभाग के अफसर खरे नहीं उतर रहे हैं। स्कूलों में लगातार बच्चों का नामांकन घट रहा है।
और तो और पांचवी पास करने के बाद छात्र छात्राएं स्कूलों से ड्राप आउट हो रहे हैं। इनमें बालिकाओं की संख्या सर्वाधिक है। हाल ही में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए किशोरी बालिकाओं के सर्वेक्षण में 11 से 14 वर्ष तक के 268 बालिकाओं के स्कूल न जाने के रिपोर्ट सामने आई है।
यह ऐसी बालिकाएं है जो पांचवीं के बाद स्कूल जाना छोड़ चुकी हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के इस सर्वेक्षण ने बेसिक शिक्षा विभाग के उस हाउस होल्ड सर्वे व बाल गणना की रिपोर्टों की पोल खोल दी है जिसमें 6 से 14 वर्ष तक के शत प्रतिशत बच्चों का नामांकन स्कूलों में होने का दावा किया गया है।
गोंडा। बेसिक शिक्षा विभाग ने आउट आफ स्कूल बच्चों की जानकारी के लिए मई माह में हाउस होल्ड सर्वे कराया था। इस हाउस होल्ड सर्वे में 105 बच्चों के स्कूल से ड्रॉपआउट होने की जानकारी सामने आई थी। बाद में इसमें खामी बताकर इसे निरस्त कर दिया गया। इन खामियों के मद्देनजर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी इस सर्वे को दोबारा करवा चुके हैं लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात है।