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अभी पीआईसीयू के लिए करना होगा 6 महीने इंतजार
Updated Fri, 02 Feb 2018 11:49 PM IST
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पीडियाट्रिक आईसीयू के लिए करना होगा 6 महीने इंतजार
गोंडा। जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) व एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से बीमार होकर आने वाले बच्चों के उपचार के लिए 62 लाख से जिस पीडियाट्रिक आईसीयू (पीआईसीयू)का निर्माण जिले में होना था। डेढ़ साल में स्वास्थ्य विभाग अभी तक केवल पीआईसीयू की बिल्डिंग का ढांचा ही तैयार कर पाया है।
बिल्डिंग की न तो ठीक तरह से फिनिशिंग हो पाई है न ही यहां आईसीयू में लगने वाले किसी तरह के इक्विटमेंट ही लगाए गए हैं। जिससे जेई व एईस से पीड़ित होकर आने वाले बच्चों को हायर सेंटर रेफर किए जाने के अलावा स्थानीय स्वास्थ्य महकमे के पास दूसरा कोई और विकल्प नहीं है। हालांकि जिम्मेदारों का कहना है कि 6 महीने में सारी व्यवस्थाएं दुरु स्त कर ली जाएंगी।
गौरतलब है कि सूबे के 6 जिलों जेई-एई की बीमारी तेजी से फैलती जा रही है। गोरखपुर के अलावा जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से प्रभावित 6 जिलों सीतापुर, गोंडा, रायबरेली, मऊ, आजमगढ़ व हरदोई में पीडियाट्रिक आईसीयू (पीआईसीयू) बनाए जाने की योजना आज से डेढ़ साल पहले सरकार ने तय की थी।
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गोंडा जिले में इसका काम डेढ़ साल पहले ही कार्यदायी संस्था ने चालू कर दिया था। बावजूद इसके जिले में जेई व एईएस से पीड़ित होकर आने वाले बच्चों के लिए आज तक यह पीआईसीयू चालू नहीं हो पाया है।
जबकि पीआईसीयू का ढांचा खड़ा कराने में ही स्वास्थ्य विभाग को डेढ़ साल का समय लग गया। पीआईसीयू का सपोर्ट न मिलने से आज भी इससे पीड़ित बच्चों को उपचार के लिए बाहर भेजा जाता है।
जिससे इनके अभिभावकों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। जबकि इधर दो वर्षों में जेई व एईएस पीड़ित मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है।
पीडियाट्रिक आईसीयू का मतलब खासतौर पर बच्चों के लिए बनने वाले आईसीयू (इंटेंसिव क्योर यूनिट) से है। आईसीयू एक खास तरह का कक्ष है जिसमें तमाम तरह के अत्याधुनिक जीनव रक्षा उपकरण होते हैं, जो गंभीर रोग या ट्रॉमा की स्थिति में आए मरीजों को बचा पाने के लिए बेहद जरूरी होते हैं।
आईसीयू में हर तरह के रोग के अनुसार विशष तरह की मशीनें होती हैं, जो मरीज की हर एक स्थिति पर बड़ी बारीकी से नजर रखती है। जबकि ऐसे मरीज जो श्वांस लेने में सक्षम नहीं होते, उन्हें वेंटीलेटर के जरिए नाक में एक नली लगाकर श्वांस मुहैया कराई जाती है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. बीसी गुप्ता का कहना है कि जिला अस्पताल में बन रहे पीआईसीयू (पीडियाट्रिक) का अभी तक केवल ढांचा ही बनकर तैयार हो पाया है। जबकि अभी इसके भवन की फिनिशिंग और आईसीयू मे लगने वाले तमाम इक्विटमेंट नहीं आए हैं। उम्मीद है कि अगले 6 महीनों में सारी व्यवस्थाएं पुख्ता हो जाएंगी।
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गोंडा। जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) व एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से बीमार होकर आने वाले बच्चों के उपचार के लिए 62 लाख से जिस पीडियाट्रिक आईसीयू (पीआईसीयू)का निर्माण जिले में होना था। डेढ़ साल में स्वास्थ्य विभाग अभी तक केवल पीआईसीयू की बिल्डिंग का ढांचा ही तैयार कर पाया है।
बिल्डिंग की न तो ठीक तरह से फिनिशिंग हो पाई है न ही यहां आईसीयू में लगने वाले किसी तरह के इक्विटमेंट ही लगाए गए हैं। जिससे जेई व एईस से पीड़ित होकर आने वाले बच्चों को हायर सेंटर रेफर किए जाने के अलावा स्थानीय स्वास्थ्य महकमे के पास दूसरा कोई और विकल्प नहीं है। हालांकि जिम्मेदारों का कहना है कि 6 महीने में सारी व्यवस्थाएं दुरु स्त कर ली जाएंगी।
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गौरतलब है कि सूबे के 6 जिलों जेई-एई की बीमारी तेजी से फैलती जा रही है। गोरखपुर के अलावा जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से प्रभावित 6 जिलों सीतापुर, गोंडा, रायबरेली, मऊ, आजमगढ़ व हरदोई में पीडियाट्रिक आईसीयू (पीआईसीयू) बनाए जाने की योजना आज से डेढ़ साल पहले सरकार ने तय की थी।
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गोंडा जिले में इसका काम डेढ़ साल पहले ही कार्यदायी संस्था ने चालू कर दिया था। बावजूद इसके जिले में जेई व एईएस से पीड़ित होकर आने वाले बच्चों के लिए आज तक यह पीआईसीयू चालू नहीं हो पाया है।
जबकि पीआईसीयू का ढांचा खड़ा कराने में ही स्वास्थ्य विभाग को डेढ़ साल का समय लग गया। पीआईसीयू का सपोर्ट न मिलने से आज भी इससे पीड़ित बच्चों को उपचार के लिए बाहर भेजा जाता है।
जिससे इनके अभिभावकों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। जबकि इधर दो वर्षों में जेई व एईएस पीड़ित मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है।
पीडियाट्रिक आईसीयू का मतलब खासतौर पर बच्चों के लिए बनने वाले आईसीयू (इंटेंसिव क्योर यूनिट) से है। आईसीयू एक खास तरह का कक्ष है जिसमें तमाम तरह के अत्याधुनिक जीनव रक्षा उपकरण होते हैं, जो गंभीर रोग या ट्रॉमा की स्थिति में आए मरीजों को बचा पाने के लिए बेहद जरूरी होते हैं।
आईसीयू में हर तरह के रोग के अनुसार विशष तरह की मशीनें होती हैं, जो मरीज की हर एक स्थिति पर बड़ी बारीकी से नजर रखती है। जबकि ऐसे मरीज जो श्वांस लेने में सक्षम नहीं होते, उन्हें वेंटीलेटर के जरिए नाक में एक नली लगाकर श्वांस मुहैया कराई जाती है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. बीसी गुप्ता का कहना है कि जिला अस्पताल में बन रहे पीआईसीयू (पीडियाट्रिक) का अभी तक केवल ढांचा ही बनकर तैयार हो पाया है। जबकि अभी इसके भवन की फिनिशिंग और आईसीयू मे लगने वाले तमाम इक्विटमेंट नहीं आए हैं। उम्मीद है कि अगले 6 महीनों में सारी व्यवस्थाएं पुख्ता हो जाएंगी।