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Ghazipur News: लावारिस शवों का बनते हैं वारिश, तीन हजार का करा चुके अंतिम संस्कार

Wed, 24 Dec 2025 12:18 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 24 Dec 2025 12:18 AM IST
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Unclaimed bodies are made to rain, last rites have been performed for three thousand rupees.
लावारिस शव… जिनसे अक्सर लोग नजरें चुरा लेते हैं, जिनके पास न कोई अपना होता है, न अंतिम विदाई देने वाला...। शहर के कचहरी मोहल्ले के कुंवर वीरेंद्र सिंह हर शव को इंसान और सम्मान का हकदार मानते हैं। वह उनका अंतिम संस्कार कराते हैं।
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कृष्ण कुमार बॉसफोर, जमुना राजभर, भोलेनाथ गोंड हिंदू शवों के अंतिम संस्कार में सहयोग करते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय के अज्ञात शवों मो मिट्टी देने में वीरेंद्र का सहयोग अतीक अहमद राईनी, गुड्डू खान एवं शेर अली राईनी करते है।
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कुंवर वीरेंद्र सिंह बताते है कि बीते 12 वर्षों में वह तीन हजार से अधिक लावारिस शवों का विधि-विधान से अंतिम संस्कार करा चुके। इसमें हिंदू बिरादरी के 2000 और मुस्लिम बिरादरी के करीब 1000 शव शामिल हैं।
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इसके अलावा 50 से अधिक मृत अज्ञात नवजातों का जल प्रवाह भी किया है। वीरेंद्र कहते हैं कि यह कोई नौकरी नहीं है, यह मेरा धर्म है। भगवान ने जो जिम्मेदारी दी है, उसे निभा रहा हूं।





मां की मौत से टूटा, लेकिन वहीं से जन्मा सेवा भाव
कुंवर वीरेंद्र सिंह, जिन्हें लोग प्यार से कुश भी कहते हैं, अपनी मां से बेहद जुड़ाव रखते थे। मां की कैंसर से हुई मौत ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। घर सूना हो गया, मन खाली हो गया,लेकिन इसी खालीपन में उन्हें जीवन का एक ऐसा उद्देश्य मिला, जिसने न सिर्फ उनकी जिंदगी बदली, बल्कि हजारों लावारिस आत्माओं को सम्मान दिया। अब तक वे 29 बार स्वयं रक्तदान कर चुके हैं।

वीरेंद्र बताते है कि एक दिन जिलाधिकारी आवास के पास बहते नाले में एक अज्ञात शव पड़ा दिखा। पोस्टमार्टम हो चुका था। अंतिम संस्कार के लिए ले जाते समय रिक्शा चालक को पैसे नहीं मिले, तो उसने शव को नाले में फेंक दिया। वीरेंद्र के लिए यह दृश्य झकझोर देने वाला था।उन्होंने प्रशासन से अनुमति ली और उस शव का पूरे हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। यही वह पल था, जब उन्होंने तय किया कि अब कोई लावारिस यूं नहीं जाएगा।

72 घंटे इंतजार, फिर खुद बनते हैं परिजन

वीरेंद्र बताते हैं कि हर लावारिस शव को पहले 72 घंटे तक मोर्चरी में रखा जाता है, ताकि कोई परिजन आकर पहचान कर सके। अगर कोई नहीं आता, तो वह खुद आगे बढ़ते हैं और श्मशान घाट में रजिस्ट्रेशन के बाद पुलिस और सहयोगियों की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार कर देते है।




जब पैसे नहीं मिलते, तब भी नहीं रुकती सेवा
वीरेंद्र बताते है कि लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए पुलिस की ओर से कभी 1000 तो कभी 1500 रुपये मिलते हैं। कई बार तकनीकी कारणों से यह राशि नहीं मिल पाती। ऐसे में वीरेंद्र व उनके साथी और जानने वाले आपसी सहयोग से पूरा खर्च उठाते हैं। बताते है कि हिंदू बिरादरी के शवों के अंतिम संस्कार पर करीब चार व मुस्लिम बिरादरी के शवों के अंतिम संस्कार पर करीब आठ हजार रुपये का व्यय आता है।





डोम राजा के बिना अधूरी है यह सेवा

वीरेंद्र इस सेवा का श्रेय अकेले नहीं लेते। वह कहते हैं कि श्मशान घाट के डोम राजा का सहयोग न मिले तो यह काम संभव नहीं। कई बार डोम राजा निशुल्क लकड़ी और संसाधन उपलब्ध कराते हैं। यही कारण है कि जहां भी वीरेंद्र को सम्मान मिलता है, वे डोम राजा को साथ ले जाना नहीं भूलते।






समाज ने पहचाना, सत्ता ने किया सम्मान
वीरेंद्र सिंह की निस्वार्थ सेवा को समाज ने सिर आंखों पर बैठाया है। इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सम्मानित किया, जबकि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत सहित कई राष्ट्रीय हस्तियों ने सराहना की थी, लेकिन वीरेंद्र के लिए सबसे बड़ा सम्मान वही है जब एक लावारिस इंसान को सम्मान के साथ अंतिम विदाई मिलती है।
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