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धनुष टूटते ही श्रीराम की हुईं जानकी
ब्यूरो/अमर उजाला/गाजीपुर
Updated Sun, 11 Oct 2015 10:52 PM IST
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नगर के हरिशंकरी स्थित रामचबूतरा पर आयोजित रामलीला में शुक्रवार को राजापुर (चित्रकूट) के कलाकारों ने धनुष यज्ञ, सीता स्वयंवर और राम विवाह आदि का मंचन किया।
इस दौरान भगवान राम ने जैसे ही धनुष तोड़ा, जानकी ने उनके गले में वरमाला डाल दी। मौजूद लोग जय श्रीराम का जयघोष करने लगे। लोगों ने राम और सीता पर फूलों की वर्षा कर अपनी खुशी जाहिर की।
सीता स्वयंवर में बड़े-बड़े योद्धाओं के साथ महर्षि विश्वामित्र भी अपने दोनों शिष्य राम और लक्ष्मण के साथ पधारे थे। धनुष तोड़ने में राजाओं के विफल होने पर राजा जनक ने राजाओं को धिक्कारा कि क्या कोई वीर नहीं है जो धनुष तोड़ सके।
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राजा जनक की कठोर वाणी सुनकर लक्ष्मण ने कहा कि महाराज आपको ऐसी कटु वाणी बोलने में शर्म नहीं आती है। यहां अयोध्या नरेश राजा दशरथ के सुपुत्र एवं हमारे बड़े भ्राता श्रीराम भी आपकी सभा में विराजमान हैं।
तब महर्षि विश्वामित्र ने शुभ मुहूर्त देखकर अपने शिष्य राम को इशारा किया। इस पर भगवान राम अपने सिंहासन से उठकर धनुष के पास पहुंचे और उसे प्रणाम किया। चाप चढ़ाते ही धनुष दो टुकड़ों में हो गया।
धुनष टूटते ही भगवान श्री राम का जयघोष होने लगा। फूलों की वर्षा होने लगी। खुशी का माहौल उस समय शांत हो गया, जब श्री महेंद्र गिरी पर्वत से परशुराम क्रोधित होकर राजा जनक की सभा में पहुंच गए।
उन्हें देख सभा में मौजूद सभी राजाओं के होश उड़ गए। इसके बाद परशुराम और लक्ष्मण संवाद हुआ। इस मौके पर सरदार बलवंत सिंह, अध्यक्ष दीनानाथ गुप्ता, कोषाध्यक्ष अभय कुमार अग्रवाल, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी बच्चा, उपमंत्री लव कुमार त्रिवेदी, मैनेजर जेमिनी दत्त त्रिवेदी, सहायक मैनेजर शिवपूजन तिवारी, सरदार दर्शन सिंह, आदि मौजूद थे।
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इस दौरान भगवान राम ने जैसे ही धनुष तोड़ा, जानकी ने उनके गले में वरमाला डाल दी। मौजूद लोग जय श्रीराम का जयघोष करने लगे। लोगों ने राम और सीता पर फूलों की वर्षा कर अपनी खुशी जाहिर की।
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सीता स्वयंवर में बड़े-बड़े योद्धाओं के साथ महर्षि विश्वामित्र भी अपने दोनों शिष्य राम और लक्ष्मण के साथ पधारे थे। धनुष तोड़ने में राजाओं के विफल होने पर राजा जनक ने राजाओं को धिक्कारा कि क्या कोई वीर नहीं है जो धनुष तोड़ सके।
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राजा जनक की कठोर वाणी सुनकर लक्ष्मण ने कहा कि महाराज आपको ऐसी कटु वाणी बोलने में शर्म नहीं आती है। यहां अयोध्या नरेश राजा दशरथ के सुपुत्र एवं हमारे बड़े भ्राता श्रीराम भी आपकी सभा में विराजमान हैं।
तब महर्षि विश्वामित्र ने शुभ मुहूर्त देखकर अपने शिष्य राम को इशारा किया। इस पर भगवान राम अपने सिंहासन से उठकर धनुष के पास पहुंचे और उसे प्रणाम किया। चाप चढ़ाते ही धनुष दो टुकड़ों में हो गया।
धुनष टूटते ही भगवान श्री राम का जयघोष होने लगा। फूलों की वर्षा होने लगी। खुशी का माहौल उस समय शांत हो गया, जब श्री महेंद्र गिरी पर्वत से परशुराम क्रोधित होकर राजा जनक की सभा में पहुंच गए।
उन्हें देख सभा में मौजूद सभी राजाओं के होश उड़ गए। इसके बाद परशुराम और लक्ष्मण संवाद हुआ। इस मौके पर सरदार बलवंत सिंह, अध्यक्ष दीनानाथ गुप्ता, कोषाध्यक्ष अभय कुमार अग्रवाल, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी बच्चा, उपमंत्री लव कुमार त्रिवेदी, मैनेजर जेमिनी दत्त त्रिवेदी, सहायक मैनेजर शिवपूजन तिवारी, सरदार दर्शन सिंह, आदि मौजूद थे।